हिंदू समाज के नित्य कर्मकांड में पर्यावरण का महत्व


 वैदिक मन्त्रों में पर्यावरण 

भारतीय वैदिक गड़ना अनुसार वेद एक अरब छानबे करोड़ आठ लाख वर्ष पुराना है और उस समय से हिंदू समाज में पर्यावरण हेतु वैदिक मन्त्रों के द्वारा सारे मानव समाज को जागृत करने का काम हमारे वैदिक मन्त्रों द्वारा किया गया है। दुर्भाग्य है कि देश बटवारे के पश्चात् जिसके हाथ में अंग्रेजो ने सत्ता सौपी वे अंग्रेजीयत को ही गुलाम मानसिकता से ग्रसित होने के कारण भारतीयता को उपेक्षित किया। इस कारण पूरी की पूरी शिक्षा भारतीय न होकर पश्चिम से प्रभावित रही उससे भी दुर्भाग्य यह है कि वर्तमान जो सरकार है वह अपने को हिंदूवादी बताती है लेकिन जो कार्य शिक्षा जगत में करना चाहिए था नहीं कर सकी।

वैदिक मंगलाचरण 

मा. अटल बिहारी जी का शासन था जिसमें मानव संसाधन मंत्री डॉ मुरली मनोहर जोशी जी थे उनको भारत सरकार की ओर से पर्यावरण की अमेरिका में भेजा गया था, उन्होंने बैठक के समापन सत्र में कहा कि हमारे यहाँ लाखों वर्षो यानी वैदिक काल से पर्यावरण की सतर्कता हेतु प्रति दिन होने वाले कर्मकांड में शामिल किया गया है यदि सारा विश्व इसका अवलोकन करे तो पर्यावरण ki समस्या का हल निकल सकता है। और जिस वैदिक मंत्र का प्रयोग कर सारे विश्व को आश्चर्य कर दिया था। आज मैं अपने इस लेख में उल्लेख कर रहा हूँ। आइये हम वेदों में पर्यावरण को देखते हैं कि किस प्रकार सनातन समाज में प्रतिदिन, प्रति पूजा में कर्मकांड़ो में उपयोग किया जाता है। जो जो हमारे कल्याण की बातें की गई हैं वह मेरे लिये न होकर हमारे यानी समाज के लिये कही गयी हैं यानी समाज का कल्याण तभी होने वाला है जब पर्यावरण ठीक रहने वाला यानी प्रकृति हमारे साथ हो।


ओउम धौ:   शांतिरान्तरिक्ष  शांति :     पृथिवी शांतिराप :    शांतिरोषधय:  शांति :। 

वनस्पतय: शांतिर्विश्: देवा : शांतिरब्रह्मा शांति :  सर्वँशांति : शांतिरेव शांति : सा मा शांतिरेधि।।

द्युलोक शांति हो ; अंतरिक्ष शांत हो, पृथ्वी शांत हो, जल शांत हो, औषधिया शांत हो, वनस्पतियाँ शांत हो, समस्त देवता शांत हों, ब्रह्म शांत हों, सब कुछ शांत हो, शांति - ही - शांति हो, और मेरी वह शांति निरंतर बनी रहे।   (यजुर्वेद 36/17)


शं  नो  अग्निज्योर्तिरनिको   अस्तु शं नो  मित्रावरुणावश्वीना  शम,।

शं  न :  शुक्रितां सुकृतानी  संतु  शं न    इषिरो  अभि  वातु  वातः ।।

ज्योति ही जिसका मुख है,  वह अग्नि हमारे लिए कल्याणकारक हो;  मित्र वरुण और अश्वनीकुमार हमारे लिए कल्याणप्रद  हों ;  पुण्यशाली व्यक्तियों के कर्म हमारे लिए सुख प्रदान करने वाले हों तथा वायु भी हमें शांति प्रदान करने के लिए वहें।    ( ऋग्वेद  7/ 35/ 4 )


शं   नो   द्यावापृथिवी   पूर्वहुतौ   शमतंरिक्षँ   दृशये   नो   अस्तु।

शं    न   ओषधिवर्निंनो   भवन्तु  शं  नो  रजस्पतिरस्तु  जिष्णु : ।।

द्युलोक और पृथ्वी हमारे लिए सुखकारक हों, अंतरिक्ष हमारी दृष्टि के लिए कल्याण प्रद हों, औषधियां एवं वृक्ष हमारे लिए कल्याणकारक हों तथा लोकपति इंद्र भी हमें शांति प्रदान करें।   ( ऋग्वेद  7/  35/ 5 )


शं   न :   सूर्य    उरुचक्षा    उदेतु   शं    नश्चतस्त्र:    प्रदिशो    भवन्तु।

शं  नः  पर्वता   ध्रुवयो  भवन्तु  शं  नः  सिंधव:  शमु   संत्वप   संत्वाप:।।

विस्तृत तेज से युक्त सूर्य हम सबका  कल्याण करता हुआ उदित हों। चारों दिशाएं  हमारा  कल्याण  करने  वाली  हों। अटल पर्वत हम सबके लिए कल्याण  कारक  हो।  नदियाँ हमारा हित करने  वाली हों और उनका जल भी हमारे लिए कल्याणप्रद हो।    ( ऋग्वेद 7/ 35/ 8 ) 


शं  नो   अदितिर्भावतु   व्रतेभि :  शं   नो   भवन्तु   मरूत:   स्वर्का : ।

शं  नो  विष्णु :  शमु   पूषा   नो  अस्तु  शं  नो  भवित्र  शम्वस्तु  वायु :।।

अदिति हमारे लिए कल्याणप्रद हों, मारुदगण  हमारा कल्याण करने वाले हों। विष्णु और पुष्टिदायक देव हमारा कल्याण करें तथा जल एवं वायु भी हमारे लिए शांति प्रदान करने वाले हों।   (ऋग्वेद  7/ 35/  9)


शं  नो  देव:   सविता   त्रायमाण:  शं  नो  भवन्तूषसो   विभाती:।

शं  न:  पर्जन्यो  भवतु   प्रजाभ्य:  शं  न:  क्षेत्रस्य  पतिरस्तु शम्भु:।।

रक्षा करने वाले सविता हमारा कल्याण करें। सुशोभित होती हुई उषा देवी हमें सुख प्रदान करें। वृष्टि करने वाले पर्जन्यदेव  हमारी प्रजाओं के लिये कल्याणकारक हों और क्षेत्रपति शम्भू भी हम सबको शांति प्रदान करें।    (ऋग्वेद  7/ 35/  10 ) 

इस प्रकार लाखो करोडो वर्षो से वैदिक मंत्रो द्वारा दैनिक कर्मकांडो को माध्यम बनाकर मानव जगत के कल्याण हेतु इश्वर ने हमें नित्य के कर्मकांडो से जागरूकता हेतु बाध्य करने का कम किया , हमें इश्वर का प्रकृतिं का धन्यवाद करना चाहिए ।।

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