कौन था नचिकेता ?
नचिकेता ऋषि वाज्रश्रवा के पुत्र थे यह कठोउपनिषद की कथा है इनके पिता श्री बड़े ही दानी प्रबृति के थे। वे अन्न, गऊ दान कर यशस्वी हो रहे थे, देश के चारो कोने-कोने में बड़ा ही प्रचार था गऊ और अन्न दान में मिलने वाला है बड़ी संख्या में लोग आये थे। "विश्वजीत" नामक यज्ञ में उन्होंने अपनी सारी धन-संपत्ति दान कर दी नचिकेता को ध्यान में आया कि मेरे पिताजी तो बूढी गायों को भी दक्षिणा में दे रहे हैं जो किसी काम की नहीं हैं। मेरे पिता को उचित फल नहीं मिलेगा, पिता श्री को तो आनंद लोक तो मिल ही नहीं सकता इन्हे अधम लोक मिलेगा। बालक बड़ा ही ब्यथित हुआ बार-बार पिताजी को उनकी गलतियों की तरफ ध्यान दिलाने जिससे कोई अनिष्ट न हो, के पश्चात् जब उसे सफलता नहीं मिली तो उसने अपने पिता से विनय पूर्बक कहा कि हे पिताश्री मै भी आपका ही धन हूँ आप मुझे किसे दान दे रहे हैं। नचिकेता ने तीन बार आग्रह किया पहले तो ऋषि ने ध्यान नहीं दिया लेकिन जब बालक का आग्रह बना रहा तो उन्होंने नाराज होकर कहा, जा तुझे मै सूर्य पुत्र यमराज को दान देता हूँ यानी मृत्यु को वरण कर! वास्तविकता यह है कि उन्होंने अपने पुत्र को यमराज के शिष्य बनने के लिए भेजा। ऐसा लगता है कि वाजश्रवा एक उपाधि है जैसे "जनक"! वाजश्रवा धन - सम्पन राजा थे अथवा ऋषि जो भी रहे हों जो इतना दान करता हो वह उन्होंने अपनी सारी संपत्ति दान करने के बाद हो सकता है कि बूढी गाएं ही बची हो इसलिये किसी ऋषि ने कोई एतराज नहीं किया। नचिकेता तो अभी दश वर्ष से भी कम आयु का बालक है हो सकता है यह उसके समझ में नहीं आया हो।हमें यह बात ध्यान में रखना है की भारतीय मेधा कितनी सतर्क है उसे अपने पिता जी की ही गलतियाँ स्वीकार नहीं और अपने बाप के खिलाफ बिद्रोह कर सकता है और किया भी । इतना ही नहीं वह अपने युग का महान पित्र भक्त भी था आखिर वह ऋषि पुत्र है उसे तो अपने काम करना ही है अपने पूज्य पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर उनका भी उद्धार करना है। ऋषि की बात प्रेम से आत्मसात कर वही शरीर को छोड़ मृत्यु स्वीकार कर यम-लोक चल दिया।
और पहुंचे यमराज के पास
कहते है कि उसी समय आकाशवाणी हुई नचिकेता तू अभी इसी वक्त यमराज के यहाँ चला जा और वह पंहुचा, उसने यमराज का दरवाजा खट-खटाया वे बाहर थे प्रहरी ने बताया कि यमराज तीन दिन बाद लौटेगे तो वह बालक धैर्य पूर्वक भूखा-प्यासा तीन दिन तक उनके दरवाजे पर बैठा है। जब मंत्रियो ने उससे भोजन के लिए पूछा तो उसनें कहा जब तक यमराज नहीं आते मैं कुछ नहीं खाऊंगा। यमराज ने आते ही पूछा यह कौन सा अतिथि हैं पता चला की वे तो मृत्यु को वरण करने आये ऋषि कुमार नचिकेता हैं। यमराज ने कहा कि अभी तुम्हारा समय नहीं हुआ है तुम वापस जाओ बालक, पिता ने विद्वान पुत्र को मौत के मुह में धकेल दिया लेकिन धर्मराज को ये स्वीकार नहीं--! नचिकेता वापस जाने को तैयार नहीं जब यमराज को पता चला कि वह ब्राह्मण कुमार तीन-दिन भूखा प्यासा यहाँ इंतजार कर रहा है तो फिर वे एक दम पसीज गए बोले तुम तीन दिन भूखे -प्यासे रहे हो उसके बदले तीन वर माग लो, 'तस्मात् प्रति त्रीन वरान वृणीष्व' उस मेधावी नचिकेता ने उमकी एक न सुनी उसने मृत्यु के रहस्यों को जानने का आग्रह करता रहा यमराज प्रसंद होकर कोई तीन वर मागने को कहा क्योंकि यह बालक तीन दिन उनके दरवाजे पर बिना अन्न-जल के रहा आज हमें सोचना है की भारतीय मेधा कैसी थी? जो यमराज को भी नतमस्तक कर दर किनार कर नचिकेता लौटे तो देखा की बृद्ध तपस्वीयों का समुदाय उनके स्वागत के लिए खड़ा है। आज भारत के नचिकेताओं को जागने की आवस्यकता है भारत में न तो मेधा की कमी है, न तो धन की, न ही ज्ञान की, इसलिए तभी भारत विश्व गुरु बन सकेगा जब हिन्दू युवकों की जिज्ञासा नचिकेता के सामान होगी। जिस कठोपनिषद के कारण हम नचिकेता को याद करते हैं स्वेतकेतु और वाजश्रवा दोनों उद्दालक ऋषि के पुत्र होने के नाते नचिकेता उद्दालक अरुनि के पौत्र हुए। .
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