महर्षि नारद ब्रह्मजी के मानस पुत्र
महर्षि नारद ब्रम्हा जी के मानस पुत्रों में से एक थे, जब हम मानसपुत्र की बात करते हैं तो कुछ आधुनिक विद्वानों का मत है कि ये कैसे संभव है कि बिना योनि के संतान हो सकती है। लेकिन आज उत्तरी और दक्षिणी ध्रुब में हिम मानव पाये जाते हैं जो बिना योनि के उत्पन्न होते हैं इसकी पुष्टि वैज्ञानिकों ने की है। दूसरा मानस पुत्र का एक अर्थ यह होता है जैसे किसी के विचारों से ओत -प्रोत होकर उसके अनुयायी वन जाये यह भी मानस पुत्र हो जाता है जैसे विश्वामित्र ने अजीतगर्त के पुत्र सुन:शेप को राजा हरिश्चन्द्र के जलोधर रोग होने पर यज्ञ किया और वह बालक सुन:शेप मंत्र दृष्टा हो गया फिर विश्वामित्र ने उसे अपना पुत्र स्वीकार कर लिया। महर्षि नारद को देवर्षि, ब्रम्हानंद, वीणाधरआदि नामों से जाना जाता है इनका निवास ब्रह्मनिवास माना जाता है। ये भगवान विष्णु के परम भक्त थे इसलिए नारायण -नारायण का जाप किया करते थे, इन्हे हिन्दुओं का देवता, देवर्षि और मुनी भी कहा जाता है । वैसे इन्हे मुख्यरूप से समाचारों का देवता माना जाता है।
वामपंथी विमर्श
भारतीय वांगमय को विकृत करने हिंदू धर्म ग्रंथों में क्षेपक डालने का काम इन वामपंथियों ने किया लेकिन वास्तविकता यह है कि वामपंथियो के पूर्वज बौद्धिष्ठ ही थे। क्योंकि बौद्ध का जो प्रथम राजा था जिसका नाम अशोक वर्धन था उसनें केवल विकृत ही नहीं किया बल्कि हिंदू धर्म ग्रंथों वेद, उपनिषद, ब्राह्मण ग्रंथो, रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों को खोज -खोज कर जलवाया इतना ही नहीं तो हमारे धार्मिक स्थलों को जैसे अयोध्या, मथुरा काशी जैसे तीर्थो के मंदिरों को तोड़वाया भी । वामपंथियो ने केवल धर्मग्रंथो को ही विकृत करने का प्रयास ही नहीं किया बल्कि भारतीय इतिहास को भी विकृत किया। उन्हें कभी चन्द्रगुप्त मौर्य की वीरता, चाणक्य की कुशल रणनीति, कुशल राजनीति दिखाई नहीं देती, उन्हें सम्राट पुष्यमित्र शुंग, सम्राट बिक्रमादित्य, हमचंद्र बिक्रमादित्य, वाप्पा रावल, राणा कुम्भा, राणा सांगा, महाराणा हम्मीर, महाराणा प्रताप, लछित वर्फूकन और क्षत्रपति शिवाजी महराज इत्यादि दिखाई नहीं देते इन्होने भारतीय इतिहास को विकृत कर मुगलों को विजेता तथा विदेशी आक्रमणकारियों का महिमा मण्डल कर भारतीयों के अंदर हीन भावना पैदा करने का प्रयास किया। इसी प्रकार हमारे ऋषियों, महर्षियों और साधू -संतों के वारे में गलत विमर्स गढ़ने का काम किया जैसे नारद के बारे में गलत भ्रान्ति पैदा करने का काम किया गांव -गांव में प्रचलित है कि नारद चुगलखोर थे और कहावतें बनाई गई कि किसी चुगली करने वाले को नारद बता दिया गया। कहते हैं कि क्या नारद वन गया -? लेकिन वामपंथियों को यह नहीं पता कि भारतीय इतिहास गांव -गांव में किस्सा कहानियों के माध्यम से परोसा जाता है और पीढ़ी दर पीढ़ी दिया जाता है जो आज भी जारी है, आज भी महर्षि नारद को हम देवार्षि ही कहते हैं हम अपने महापुरुषों को ससम्मान याद करते हैं और उनका जन्म जयंती मनाते रहते हैं।
देवर्षि नारद जयंती
नारद जयंती नारद मुनी के प्रकटउत्सव के रूप में जेष्ठ मास में कृष्ण पक्ष की द्वीतिया, कुछ पंचाग के अनुसार प्रतिप्रदा को मनाई जाती है 2026 को यह जयंती 3 मई को मनाई जायेगी। महर्षि नारद ब्रम्हा जी के मानसपुत्र माने जाते हैं और ऐसी मान्यता है कि वै धरती के प्रथम पत्रकार थे। जो नारायण -नारायण का जाप करते हुए सूचनाये प्रसारित करते थे। वै ज्ञान, भक्ति, संगीत और संवाद के देवता माने जाते हैं, उन्हें ऋषिराज भी कहा जाता है। नारद ने एक लोक से दूसरे लोक को सन्देश पहुंचाकर पत्रकारिता का प्रारम्भ किया इसलिये उन्हें प्रथम पत्रकार कहा गया है। देवताओं के ऋषि होने के कारण उन्हें देवर्षि भी कहा जाता है, वे धर्म के प्रसार और लोक कल्याण के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहते थे। उन्हें त्रिकालदर्शी यानी भूत, भविष्य और वर्तमान का ज्ञान रखने वाला माना जाता है, ऐसी मान्यता है कि वीणा का अविष्कार करने वाला नारद जी ही थे।
भारतीय ग्रंथों में नारद
विभिन्न धर्मग्रंथो में नारद जी का उल्लेख इस प्रकार आता है। "अथर्ववेद" के अनुसार नारद नाम के एक ऋषि हुए हैं। "एतरेय ब्राह्मण" के अनुसार हरिश्चन्द्र के पुरोहित साहदेव्य के शिक्षक तथा आंगवष्टय एवं युद्धश्रोष्टि को अभिशप्त करने वाले भी नारद जी थे। मैत्रायणी संहिता में नारद नाम के एक आचार्य हुए हैं। "सांबिधान ब्राह्मण" में बृहस्पति के शिष्य के रूप में नारद का वर्णन मिलता है। "छाँदोग्यउपनिषद" में नारद का नाम सनतकुंमारों के साथ लिखा गया है। महाभारत में मोक्ष धर्म के नारायणी आख्यान में नारद की उत्तरदेशीय यात्रा का विवरण मिलता है, इसके अनुसार उन्होंने नर -नारायण ऋषियों की तपश्चर्या देखकर उनसे प्रश्न किया और बाद में उन्होंने नारद को पांचरात्र धर्म का श्रावण कराया। "नारद पंचरात्र" के नाम से एक प्रसिद्ध वैष्णव ग्रन्थ भी है जिसमे दस महाविद्याओं की कथा विस्तार से कही गई है। इस कथा के अनुसार हरि भजन ही मुक्ति का मुख्य कारण माना गया है। "नारद पुराण" नामक एक ग्रन्थ मिलता है, इस ग्रन्थ के पूर्व खंड में 125 अध्याय और उत्तरखंड में 182 अध्याय है। कुछ स्मृतियों में नारद का नाम सर्वप्रथम स्मृतिकार के रूप में माना गया है।
"महाभारत" में सभापर्व के पांचवे अध्याय में नारद जी के व्यक्तित्व का परिचय इस प्रकार दिया गया है, देवर्षि नारद वेद और उपनिषदों के मर्मज्ञ, देवताओं के पूज्य, इतिहास के विशेषज्ञ, पूर्व कल्पों (अतीत ) की बातों को जानने वाले, न्याय और धर्म के तत्वज्ञ, शिक्षा व्याकरण, आयुर्वेद, ज्योतिष के प्रकांड विद्वान, संगीत विशारत, प्रभावशाली वक्ता, मेधावी, नीतिज्ञ, कबि, महापंडित, बृहस्पति जैसे विद्वानों की शांकओ का समाधान करबे वाले, देवताओं, दैत्यो के वैराग्य का उपदेशक, कर्तव्य -अकर्त्तव्य में भेद करने में दक्ष, समस्त शास्त्रों में प्रवीण, सदगुणों के भंडार, सदाचार के आधार, आनंद के सागर, परम तेजस्वी, सभी विद्याओं में निपुण, सबके हितकारी और सर्वत्र गति वाले हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि देवर्षि नारद भक्ति के साथ -साथ ज्योतिष के भी प्रधान आचार्य हैं। आज कल धार्मिक चलचित्रों और धारावाहिकों पर वामपंथी विमर्श प्रभावी है, इसीलिए इन सभी में नारद जी का चरित्र हनन हो रहा है। नारद जी के पात्र जिस प्रकार प्रस्तुत किये जा रहे हैं उसमें आम व्यक्ति में उनका छबि लड़ाई -झगड़ा कराने वाले विदूषक की बनाने का प्रयास किया जा रहा है। यह उनके प्रकांड पंडित्या एवं विराट व्यक्तित्व के प्रति सरासर अन्याय है, नारद जी का उपहास उड़ाने वाले सनातन धर्म का जाने -अनजाने अपमान कर रहे हैं।

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