वैदिक मंत्रदृष्टा महर्षि अत्रि

 
मंत्रदृष्टा ऋषि अत्रि 

महर्षि अत्रि वैदिक काल मे सप्त ऋषियों में से एक थे, वे ब्रम्हा जी के मानस पुत्रों में से एक हैं। वे ऋग्वेद के पांचवे मण्डल के मंत्रदृष्टा ऋषि हैं और उनकी धर्म पत्नी सती अनुसूया वैदिक काल की प्रतिष्ठित नारी व विख्यात पतिब्रता नारी थीं। अत्रि ऋषि का सृष्टि निर्माण में अद्भुत योगदान है, आयुर्वेद के अनेक ऋचाओं को दिया। उनका विवाह कर्दम ऋषि की पुत्री अनुसूया से हुआ था और मान्यता यह है की ऋषि अत्रि ने ब्रह्मा, विष्णु और शंकर जी की कठोर तपस्या के परिणाम स्वरुप तीनो देव इनके पुत्र के रूप में आये उनके तीन पुत्र दत्तत्रेय (विष्णु का अंश ), दुर्बसा (भगवान शिव ) और चंद्रदेव (ब्रम्हाजी ) के अंश माने जाते हैं। 

ब्रम्हा जी के मानस पुत्र 

ऋषि अत्रि भगवान ब्रह्म जी के मानस पुत्र थे किब्दन्ति है कि वे ब्रह्म जी के नेत्र से पैदा हुए थे, यह समझने की आवस्यकता है कि नेत्र से कोई कैसे पैदा हो सकता है इसका अर्थ यह है कि वे ब्रह्म जी की दृष्टि हैं और उन्हें ब्रह्म जी का मानस पुत्र माना जाता है, सृष्टि निर्माण में जिन ऋषियों का योगदान है वे सभी ब्रम्हा जी के मानस पुत्र माने जाते हैं। मान्यता है कि उन्होंने ऋग्वेद में कई स्थानों पर उल्लेख पाया जाता है, ऋषि अत्रि अग्नि, वरुण, इंद्र और अन्य वैदिक देवताओं के ऋचाओं के मंत्र दृष्टा थे। चित्रकूट में अत्रि ऋषि का आश्रम था जो आज भी सती अनुसूया के नाम से जाना जाता है, यहीं पर वनवास के समय भगवान श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण जी रुके थे। और माता अनुसूया ने यहीं पर भगवती सीता जी को उपदेश दिया था। 

वैदिक ज्ञान परंपरा 

ऋग्वेद के अनुसार महर्षि अत्रि को सबसे पहले ग्रहण सम्वन्धी ज्ञान प्राप्त हुआ था, उन्हें कृषि हेतु विकास हेतु भी ज्ञान अर्जित किया था। उन्होंने अत्रि संहिता, अत्रि स्मृति जैसे ग्रंथों की रचना की जो आज भी मौजूद पाये जाते हैं, अत्रि संहिता में नौ अध्याय और चार सौ श्लोक पाये जाते हैं साथ में लधवगि स्मृति, बहदागेय स्मृति ग्रंथों की जानकारी भी मिलती है। वस्तुशास्त्र पर भी एक ग्रन्थ की रचना की थीं, अत्रि संहिता एक प्रसिद्ध ग्रन्थ है, महर्षि अत्रि ने अत्रि संहिता में बहुत ऐसे विषयों पर विचार किया है जो मनुष्य के सामाजिक एवं आत्मिक जीवन को प्रभावित करता है। अत्रि ऋषि ने चिकित्सा, ज्योतिष पर भी कार्य किया। महर्षि अत्रि को तपस्या, ज्ञान और दयालुता की प्रतिमूर्ति माना जाता है जो सती अनुसूया के साथ आज भी पूजनीय हैं। महर्षि को त्याग, तपस्या और संतोष से युक्त ऋषि माना जाता है। महर्षि अत्रि को मंत्र दृष्टा के साथ उनके भेद को जानने वाला भी माना जाता है। अपनी त्रिकाल दृष्टि से उन्होंने धार्मिक ग्रंथों की रचना की, साथ ही इनकी कथाओं द्वारा चरित्र का सुन्दर वर्णन किया गया है। महर्षि अत्रि का बौद्धिक, मानसिक ज्ञान कठोर तपस्या, उचित आचरण द्वारा व्यवहार एवं मन्त्रशक्ति के ज्ञाता के रूप में सदैव स्मरण किया जाता रहेगा। 

भारतीय अर्थव्यवस्था ऋषि परंपरा की देन 

जो भी वैदिक ऋषि महर्षि और मंत्रदृष्टा हैं सभी शोधकर्ता व वैज्ञानिक ही हैं, उन्हें धर्म से इसलिये जोड़ा गया जिससे सनातन धर्म, समाज की श्रद्धा उनके प्रति वनी रहे। उसी का परिणाम है कि लाखों, करोड़ों वर्षो से सनातन समाज की आस्था अपने ऋषियों, महर्षियों के प्रति बनी हुई है। समाज अपने घरों में इन महापुरुषों के चित्र लगाकर पूजा अर्चना करता रहता है और उसी आधार पर विचार कर अपने जीवन को त्यागमय, तपोमय बनाकर सुखी रहता है भारत में ऋषियों की दी हुई व्यवस्था ऐसी है क़ि देश प्रेम हमारे रगों में रहता है इतना ही नहीं यदि सारा विश्व भारत को प्रतिवन्धित कर दे तो भी हमारे गाओं पर कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं है। प्रत्येक गांव आत्म निर्भर रहता है नमक छोड़कर सभी खाद्य सामग्री, तेल इत्यादि सबकुछ प्रत्येक गांव में उपलब्ध रहता है, खेती किसान करता है लेकिन उन सभी का हिस्सा उसमें रहता है नाउ, धोबी, कँहार, पुरोहित व अन्य सभी को अपना हिस्सा मिलता है यह है प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था। भारतीय अर्थ व्यवस्था एक दूसरे की पूरक है जिसे हम आज की सहकारिता कह सकते हैं और यह व्यवस्था हमारे ऋषियों मुनियों की देन है जो लाखों करोणो वर्षो से भारत को संचालित कर रही है।

भारतीय गांव 

ऋषियों ने जो गावों की कल्पना किया उसे साकार भी किया, उन्होंने एक ही गांव में किसानो के साथ जिन्हे हम आज की भाषा में पर्जा बोलते हैं जैसे पुरोहित, नाउ, धोबी, कँहार, बढ़ई, लोहार इत्यादि जो समाज की पूरक ही नहीं समाज के पोषक भी थीं किसान अपनी उपज का एक हिस्सा इनको देता था और वे वड़े अधिकार के साथ खलिहान से ही लें जाते थे, जो परंपरा आज भी चरितार्थ हो रही है। कोई बेरोजगार नहीं रहता था कोई सरकारी ऑफिस में बेरोजगारी का आवेदन नहीं देता था सभी सुखी जीवन व्यतीत करते थे। एक बार किसान के घर में अनाज भले ही कम पड़ जाता लेकिन किसी भी पर्जा के यहाँ कोई कमी नहीं रहती थी, ऐसी व्यवस्था हमारे पूर्वजों ने हमारे ऋषियों ने हमें दिया था जो आज भी प्रासंगिक है।


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