गुरु गोविन्द सिंह --- देश व धर्म हेतु शिष्यों सहित पिता, पुत्र के भी बलिदान हेतु प्रेरित किया--!


शुक्रवार, 18 जून 2010

योद्धा और सन्यासी गुरु गोविंद सिंह--!
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भारत वर्ष में संघर्ष क़ा काल चल रहा था मुगलों क़ा अधिपत्य था भारत माता, गौ माता त्राहि-त्राहि कर रही थी हिन्दुओ को बलात मुसलमान  बनाया जा रहा था कश्मीर व अन्य स्थानों से तमाम साधू, संत व ब्रहमण आये थे धर्म सभा लगी थी, गुरु तेगबहादुर ने सभा में कहा कि हमारा देश व धर्म किसी बड़े महापुरुष क़ा बलिदान चाहता है!
पीछे से दस वर्षः क़ा एक बालक उठा--- पिता जी--!
इस धर्म सभा में आपसे बड़ा महापुरुष कौन है---?
इस सभा में तो सबसे बड़े तो आप ही है इस नाते सबसे पहले आपका ही बलिदान होना चाहिए--! सभा मे सन्नाटा छा गया गुरु तेगबहादुर को समझने मे देर न लगी आखिर यह तो गुरु पुत्र है-! यही बालक धर्म की रक्षा करेगा, आखिर वे गुरु पुत्र ही थे उन्ही को यह गुरु गद्दी सम्हालनी थी-! अपने सिर की पगड़ी बच्चे क़े ऊपर रखते हुए बलिदान क़े लिए प्रस्थान कर दिया क्रूर औरंगजेब ने छल पूर्बक गुरु तेगबहादुर को दिल्ली बुलाया और निर्दयता पूर्बक हत्या कर दी, यही बालक आगे गुरु गोविन्द सिंह क़े नाम से प्रसिद्द हुआ। 
संगठित शक्ति----!
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पिता क़े बलिदान क़ा बहुत गहरा प्रभाव पड़ा उन्होंने देखा कि औरंगजेब क़े अत्याचार से हिन्दू धर्म की रक्षा केवल संगठित सैनिक शक्ति ही कर सकती है, सम्पूर्ण भारत में गुरु नानक से लेकर तेगबहादुर तक -- भ्रमण कर हजारो मठो की स्थापना की थी जैसा हम जानते है कि हमारे संतो ने राष्ट्रीयता को ध्यान में रखकर आध्यात्मिकता क़ा संचार किया, अकेले बिहार में ३०० मठ से अधिक थे जिन्हें ''उदासी मठ' के नाम से आज भी जाना जाता है, गुरुगोविन्द सिंह ने समय क़े अनुसार सभी मठो को खालसा में परिवर्तन कर एक सैनिक शक्ति खड़ी की..
जन विस्वास करौ तुरुक्का !
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अमोघ निशाना मारते थे उनका बाण अचूक था वे महाबीर थे और दो लम्बी तलवारे बाधते थे प्रथम आनंदपुर साहब, चकोर और नाहन में सैनिक छावनी स्थापना की औरंगजेब ने सरहिंद, लाहौर क़े सूबेदारों को युद्ध हेतु भेजा गुरुदेव क़े दो बालक बंदी बना लिए गए, इस्लाम क़े मुहब्बत व प्रेम क़ा सन्देश देने वालो ने दोनों पुत्रो को मस्जिद क़े दिवार में जिन्दा चुनवा दिया गुरु गोविन्द सिंह लड़ते-लड़ते दमदमा में दसवां ग्रन्थ निर्मित किया, महान क्रन्तिकारी बन्दा को धर्म की रक्षा हेतु तैयार कर दक्षिण में गोदावरी क़े तट पर साधना में लग गए आश्रम में दो पठानों ने आश्रय मागा उन्हें निराश्रित जानकर आश्रय दिया, उनको भोजन कराया स्वयं बिश्राम पर गए थे कि उन तुर्कों ने धोके से उनके पेट में कटार मार दी वे स्वर्ग सिधार गए, [ वाहे गुरु की फतह और सत श्री अकाल ] क़े युद्ध घोष देश, धर्म की रक्षा क़े लिए गुरुदेव क़े शिष्यों ने गुंजित किये और हिंदवी साम्राज्य के निर्माण की नीव रखी, मरते समय उनकी अमरवाणी अकस्मात् निकली---------!
             ''जन विस्वास करऊ तुरुक्का''------!
 हम हिन्दू कैसे है की अपने महापुरुषों की बात नहीं मानते इसलिये बारम्बार धोखा खाते रहते है बिधर्मी हमें बेवकूफ समझ कर इस्लाम को प्रेम-मुहब्बत का धर्म बताता रहता है। 
आज़ादी हेतु बलिदान पर बलिदान
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पृथ्बीराज चौहान से लेकर हिन्दू कुल सूर्य राणाप्रताप, शिवाजी महराज पूरी सिक्ख परंपरा आजाद हिंद फ़ौज से लेकर भगत सिंह तक की बलिदानी परंपरा -- लाखो बलिदानियों ने अपनी आहुति दी तब देश आजाद हुआ, केवल १८५७ से १८६० क़े बीच में उत्तर प्रदेश व बिहार  में बीस लाख लोगो को अंग्रेजो ने मारा जितने पढ़े लिखे लोग थे सभी को समाप्त कर दिया देश बिभाजन क़े समय लगभग 10 लाख लोग मारे गए-! आज़ादी ऐसे नहीं मिली-! मै गाधीजी की आलोचना नहीं करता चाहता लेकिन जो गीत गाया जाता है कि --
''साबरमती क़े संत तुने कर दिया कमाल देदी आज़ादी हमें खड्ग बिना ढाल''----!
 ये गीत उन सभी क्रांतिकारियों क़ा अपमान करती है जिंहोने भारतीय आज़ादी और स्वाभिमान हेतु अपने को बलिदान कर दिया, हमने सैकड़ो वर्ष संघर्ष व लाखो, करोडो बलिदान क़े बाद आज़ादी प्राप्त की है यह आज़ादी किसी की कृपा पर नहीं है। 
सम्पूर्ण आहुति---!
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 गुरु गोविन्द सिंह अकेले नहीं बलिदान हुए अपने पिता, बच्चो और शिष्यों सहित स्वयं को बलिदान करके एक अद्भुत उदहारण प्रस्तुत किया जो हमारे लिए हमेसा प्रेरणा दायक रहेगा, ऐसे थे हमारे गुरु गोविन्द सिंह, जब पंजाब में गुरु क़े शिष्यों क़े विजय पर्व क़ा तीन सौवा वर्ष मनाया जा रहा हो तो गुरु गोविन्द सिंह को बिना याद किये यह विजय उत्सव पूरा नहीं हो सकता इसलिए हमने संक्षेप में याद दिलाने क़ा प्रयत्न किया। 
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