कश्मीर में भारतीय नेतृत्व को कड़ा रुख अपनाना पड़ेगा ,बार्ता में जम्बू,लद्दाख और कश्मीरी पंडितो को भी सामिल किया जाय.. सरकार क़ा रुख देश को सोचने हेतु बाध्य कर रहा है ,देश क़ा विस्वास उठ रहा है.


शनिवार, 18 सितंबर 2010

          कश्मीर की समस्या समाधान क्या है ? सरकार असमंजस में ही नहीं अनिर्णय की स्थित में नज़र आती है और अधिक स्वायत्तता देना,१९५२ की स्थिति बहाल करना एक देश में दो बिधान-दो प्रधान स्वीकार करना या सेना को मिले अधिकारों में कटौती करना या आतंकबादियो को सत्ता सौपना आखिर समाधान क्या है ---? यदि एक गाव से जिले क़ा नुकसान होता है तो उसकी परवाह नहीं करना यदि एक प्रान्त में कोई जिला प्रान्त हित में समाप्त करना हो तो करना चाहिए, देश क़े सामने कड़ी चुनौती है उसे स्वीकार करना चाहिए कश्मीरी नहीं है ये इस्लामिक आतंकबादी है जो भारत क़े अस्तित्व को चुनौती देते नज़र आ रहे है. ऐसा लागता है की हम नेहरु की सोच की तरफ बढते जा रहे है, जिस विचार ने आज तक समस्या को नासूर बना दिया है १९४७ - १५ अगस्त को देश आजाद हुआ दो रियासतों की प्रकृति एक प्रकार थी हैदराबाद में राजा मुसलमान- जनता हिन्दू थी ठीक इसके उलट कश्मीर में राजा हिन्दू जनता मुसलमान थी दोनों क़े अलग-अलग परिणाम आए हैदराबाद ने भारत में बिलय को स्वीकार नहीं किया तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल ने सेना क़े बल पर बिलय कराया, दूसरी तरफ कश्मीर में राजा ने बिलय किया जानता क़े साथ तुष्टिकरण निति क़े करण पंडित नेहरु ने राजा से अलग शेख अब्दुल्ला को नेता मानकर देश बिभाजन जैसी ही धारा ३७० वहा लागू कर दिया.
         जब हम समस्या की तरफ ध्यान देगे तो समस्या में पंडित नेहरु ही दिखाई देगे अगस्त ४७ में जब कश्मीर क़ा भारत में बिलय नहीं हुआ करण था - कश्मीर महाराजा हिन्दू थे हिन्दू शासक से मुक्ति हेतु एक गुंडा शेख अब्दुल्ला ने १९३२ मुस्लिम कान्फ्रेंश की स्थापना की उस समय अब्दुल्ला ने जिन्ना क़े नेतृत्व को स्वीकार नहीं किया नेहरु जी हमेसा महाराजा से इर्षा रखते और अब्दुल्ला को समर्थन देने क़े करण राजा क़ा मन भी अच्छा नहीं था .सितम्बर ४७ - कश्मीर में संघ क़ा अच्छा कार्य है सरदार पटेल की सलाह पर संघ क़े सरसंघ चालाक प.पू.श्री गुरु जी को राजा हरी सिंह ने मिलकर बिलय की बात करनी पड़ी राजा ने राष्ट्र हित को देखते हुए कश्मीर क़े प्रधान न्यायाधीश और प्रधानमंत्री मेहरचंद महाजन को पत्र लिख कर नेहरू जी से बार्ता हेतु दिल्ली भेजा जब मेहरचंद महाजन नेहरु जी से मिलने पहुचे बात-बात में नेहरु जी ने कश्मीर क़े प्रधानमंत्री को अपमानित किया कहा की कश्मीर क़े आप या महाराजा कौन होते है वहा क़े नेता तो शेख अब्दुल्ला है बिना किसी माग क़े नेहरु ने कश्मीर की स्वयत्ता ३७० की बात करनी शुरू कर दी मेहरचंद महाजन ने इसका कड़ा प्रतीबाद किया और अपमानित होकर बिलय पत्र देकर चले गए, बार्ता  क़े समय शेख अब्दुल्ला पीछे वेडरूम में बैठा था सब बात सुन रहा था महाजन क़े जाने क़े पश्चात् उसने नेहरु जी से कहा की यह अपने अच्छा नहीं किया मेहरचंद जी क़ा कश्मीर में बड़ा ही सम्मान है बहुत बड़े और अच्छे ब्यक्ति है शेख अब्दुल्ला ने भी धारा ३७० की माग नहीं किया था लेकिन नेहरु जी ने यह समस्या भारत को बिना मागे ही दे दिया .
             कश्मीर क़ा पाकिस्तान में बिलय को जिन्ना उतावले थे बिना देर किये ही आज़ादी क़े दो महीने आठ दिन बीते ही थे की कबायली रूप में पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर पर हमला करदिया पाकिस्तानी सेना स्थानीय जानता क़े साथ अत्याचार कारते हुए महिलाओ की शील भंग करते हुए आगे बढ रही थी की तब-तक कश्मीर क़ा बिलय पत्र भारत को मिल चुका था, २७ अक्टूबर १९४७ को भारतीय सेना श्रीनगर पहुच कर आक्रमण कारियों को पीछे ही नहीं उन्हें पाकिस्तान की तरफ धकेलना शुरू किया ही था की नेहरु जी ने एकतरफा युद्ध बिराम की घोषणा कर दिया और कश्मीर क़ा एक भाग जिसे हम गुलाम कश्मीर कहते है वह पाकिस्तान क़े पास चला  गया, यदि अन्य रियासतों की भाति कश्मीर क़े भी बिलय क़ा प्रश्न हल करने कार्य पटेल क़े पास होता तो शायद इतिहास कुछ और होता यदि पंडित नेहरु क़े विचार से समस्या क़ा हम चाहते है तो कश्मीर हमारे पास नहीं रहेगा आज एक शसक्त नेतृत्वा की आवस्यकता है जो आतंकबादियो को उचित जबाब दे सके यह कार्य मनमोहन सिंह क़े बस क़ा नहीं है उन्हें देश हित में स्थिफा दे देना चाहिए नहीं तो देश भक्तो को कोई उपाय सोचकर नेतृत्व पर बिचार करना चाहिए कम से कम देश क़े साथ गद्दारी करने वाले को मौत की सजा तो होनी ही चाहिए कश्मीरी आतंकबादियो को मुर्गमुसल्लम क़े स्थान पर उन्हें फासी की सजा दी जानी चाहिए .
            सेकुलर क़े नाम पर देश द्रोह हो रहा है बामपंथी तरह-तरह क़े बयान देकर अलगाव बादियो क़ा बचाव कर रहे है यह केवल कहने से काम नहीं चलेगा की कश्मीर भारत क़ा अभिन्न अंग है धारा ३७० को तत्काल प्रभाव से हटा कर पूरा कश्मीर सेना क़े हवाले कर देना चाहिए जिसको पाकिस्तान से बड़ा प्रेम है जाना है उन्हें रोकना नहीं वे पाकिस्तान जा सकते है लेकिन भारत को अब हिन्दू समाज भारत  बनाये रखना चाहता है जिसको भी भारत क़े बिचार, चिंतन, संस्कृति अच्छी नहीं लगती वे भारत छोड़कर कही भी जा सकते है मुसलमान एक बार पाकिस्तान क़े रूप में देश क़ा बिभाजन करा चुके है अब देश एक भी इंच जमीन देने की स्थिति में नहीं है चर्च क़े ईशारे पर सोनिया और उनके गुलाम -मनमोहन, चितंबरम इत्यादि चर्च की योजना को लागू करना यानी भारत क़े टुकड़े करना अब हिन्दुओ को स्वीकार नहीं. हमें अपने इतिहास से सबक लेने की आवस्यकता है, जब भी कश्मीर पर बार्ता होती है केवल एक वर्ग को ही बुलाया जाता है जैसे कश्मीर में और कोई नहीं जम्बू व लद्दाख या कश्मीरी पंडितो को हमेसा बार्ता से अलग रखना भेद-भाव को ही दर्शाता है इसलिए प्रधान मंत्री की तमाम कोसिस आधी-अधूरी रह जाती है  .
        राहुल गाधी क़ा बयान बहुत ही आपत्तिजनक है ऊमर हो या मुफ्ती किसी की भी नियत ठीक नहीं है क्या बार्ता में जम्बू व लद्दाख क़े लोगो को सामिल किया जा रहा है नहीं तो क्यों ? क्या कश्मीर केवल मुसलमानों क़ा ही है यदि ऐसा बिचार करते है तो जम्बू,कश्मीर और लद्दाख को अलग -अलग कर दिया जाय तो लद्दाख व जम्बू से  धारा ३७० हट जाएगी यहाँ कोई समस्या भी नहीं रहेगी रहा कश्मीर क़ा प्रश्न तो आज भी वह सेना क़े नाते ही भारत में है कल भी वह सेना क़े सहारे भारत में रहेगा जब तक भारत की सेना मजबूती से खड़ी है तब तक ही कश्मीर हमारे पास रहेगा राहुल को भारत क़े बारे में कोई जानकारी नहीं भारत केवल राजनैतिक भारत नहीं है और राहुल को भारतीयता से कोई लेना-देना नहीं, जरुरत भी नहीं- नेहरु ने समस्या को जन्म दिया राहुल से क्यों उम्मीद करना ? .
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