गुजरात पर मानवाधिकार वादी व केंद्र सरकार क़ा कुरूप चेहरा------------


गुरुवार, 16 सितंबर 2010

       जिस दिन गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में हिंदू-दहन हुआ उसी दिन से तीस्ता जावेद सीतलवाड़ अपने बयानों और कारनामों से सुर्खियों में रही हैं। उन्होंने उसी 27 फरवरी, 2002 को वाशिगटन पोस्ट को बयान दिया, 'हमें उकसावे को नहीं भूलना चाहिए'। यानी अयोध्या की यात्रा करके उन हिंदुओं ने मुसलमानों को उत्तेजित किया, जिसका फल था गोधरा। जब प्रतिक्रियात्मक दंगे शुरू हुए तब से सारी चर्चा दंगों पर केंद्रित हो गई, गोधरा को साफ भुला दिया गया। तीस्ता के उस विषैले बयान को भी जो दंगे भड़कने का एक कारण हो सकता है। नि:संदेह, गोधरा को अभी तक न्याय नहीं मिला। अभी-अभी तीस्ता के पूर्व सहयोगी रईस खान ने सुप्रीम कोर्ट के विशेष जांच दल से निवेदन किया है कि उसे दंगों पर झूठी गवाहियां दिलाने संबंधी तीस्ता के कारनामों पर गवाही का मौका दिया जाए। गवाहों और दंगा-पीड़ितों द्वारा भी मनगढंत गवाहियों की बात कोई पहली बार सामने नहीं आई। तीस्ता द्वारा कोरे हलफनामे जमा करवाने, गवाहों को धमकाने, गवाहों को पुरस्कृत करने, यहां तक कि सरकारी वकील को धमकाने जैसे तथ्य भी न्यायालय तथा मीडिया के सामने आ चुके हैं। सरकारी वकील को धमकाने की बात पिछले महीने स्वयं विशेष जांच दल ने कही है। कम से कम दो बार न्यायालयों ने भी इसका संज्ञान लिया। एक बार गुजरात उच्च न्यायालय तथा दूसरी बार सर्वोच्च न्यायालय ने, किंतु आश्चर्य है कि झूठी गवाहियां दिलाने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। गुजरात दंगों का यह पहलू भी न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है। दो वर्ष पहले भी विशेष जांच दल ने अपनी रिपोर्ट में तीस्ता को हत्या और उत्पीड़न की झूठी कहानियां गढ़ने, झूठे गवाहों की फौज तैयार करने, अदालतों में गलत दस्तावेज जमा करवाने और पुलिस पर मिथ्या आरोप लगाने का दोषी बताया था। जैसे वीभत्स झूठ तीस्ता ने प्रचारित किए उनका उल्लेख भी सिहरा देने वाला है, ऐसा करने वालों में तीस्ता अकेली नहीं हैं। गुजरात दंगों पर झूठे प्रचार कर लाशों की राजनीति करने वाले और न्याय-प्रक्रिया को अगवा करने वाले कई लोग तथा संगठन सक्रिय रहे हैं, किंतु बार-बार ऐसे समाचार आने पर भी उनकी भूमिका की जांच नहीं की जा रही है! जबकि हर किसी के बयान पर नरेंद्र मोदी को लपेटने की सदैव कोशिश होती है। दूसरी ओर उसी व्यक्ति तथा अन्य लोगों के हलफनामे के बावजूद तीस्ता जैसे लोगों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। 
    इस दोहरेपन का न्याय कब होगा? पिछले आठ वर्ष का अनुभव दिखाता है कि गुजरात के साथ न्याय नहीं हो रहा। मानवाधिकार उद्योग आरंभ से ही मोदी के पीछे पड़ा है। अरुंधती राय द्वारा काग्रेस नेता अहसान जाफरी की बेटी के दुष्कर्म -हत्या की लोमहर्षक झूठी कथा प्रकाशित करना, जाहिरा शेख का बार-बार गवाही-पलटना, मानवाधिकार आयोग द्वारा नियम-संयम भुलाकर गुजरात दंगों पर स्वयं को केंद्रित कर लेना, लालू प्रसाद यादव के जेबी आयोग द्वारा गोधरा को सपाट दुर्घटना बताना आदि उसी अन्याय की कड़ियां हैं। तीस्ता के पूर्व-सहयोगी रईस खान द्वारा तीस्ता के भय से पुलिस सुरक्षा की मांग उसी की नवीनतम कड़ी है। ये सभी उपेक्षित कड़ियां दिखाती हैं कि गुजरात सरकार पर लगाए गए आरोप अतिरंजित, झूठे या राजनीति प्रेरित थे। दुर्भाग्य यह कि स्वयं मानवाधिकार आयोग ने भी निष्पक्षता नहीं दिखाई है। जिस तरह वह बार-बार बयान बदलने वाली जाहिरा की बातों पर स्वयं सक्रिय हुआ उसी तरह वह रईस खान की बातों का संज्ञान क्यों नहीं ले रहा है? जाहिरा शेख और रईस खान में भेदभाव करने का आधार क्या है? जबकि आयोग ने तब उन पन्नों को ध्यान से देखा भी नहीं था जिन पर जाहिरा के दस्तखत तक न थे! उन कागजों को तीस्ता ने जमा किया था। उसी को आधार बनाकर संपूर्ण गुजरात न्यायपालिका पर कालिख पोती गई कि वह दंगों की निष्पक्ष सुनवाई नहीं कर सकता, अत: मुकदमों को राज्य से बाहर ले जाया जाए। यानी, मानवाधिकार आयोग और कतिपय न्यायपालक मनमाने तौर पर एक गवाह को सही और दूसरे को गलत मान कर चल रहे हैं। इतना ही नहीं, एक ही गवाह के एक बयान को गलत और दूसरे को सही मान लेते हैं। इस दोरंगी दृष्टि का अन्याय कब दूर होगा? जाहिरा की मां और ननद ने भी अलग-अलग कहा था कि तीस्ता धमकियां देने वाली'गुंडी' है और जाहिरा ने पैसे लेकर बयान बदला है। जाहिरा के वकील ने भी इसकी पुष्टि की थी। इन सच्चाइयों की अनदेखी करने से न्याय की स्थिति हास्यास्पद हो जाएगी। एक बार स्वयं सर्वोच्च न्यायालय 'अपने को विचित्र स्थिति' में पा चुका है कि जाहिरा के नाम पर प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों में जाहिरा के दस्तखत कहीं नहीं थे। तीस्ता की इन्हीं कारगुजारियों के लिए उन्हें तरह-तरह के देशी-विदेशी पुरस्कार मिलते रहे हैं। क्या ये सभी पुरस्कार गोधरा काड के 59 मृतक हिंदुओं का खुला अपमान नहीं, जिन्हें तीस्ता मारे जाने लायक ही समझती थीं? यह भी विचित्र है कि जाहिरा शेख को झूठे बयान देने के लिए सजा दी गई, जिसे असल में धन और धमकी जैसे हथकंडों से तीस्ता ने दिलवाया था। तीस्ता ने स्वयं एक विदेशी समिति 'यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजस फ्रीडम' के सामने मनमानी गवाही दी है। तब इन सारी मनमानी गवाहियों की असल सूत्रधार, न्यायपालिका को भ्रमित करने और भारत को बदनाम करने वाली हस्ती को कोई सजा क्यों नहीं दी जा सकी है? ऐसे लोगों को सजा मिलनी चाहिए ताकि आगे दंगों पर राजनीति करने वालों को चेतावनी मिले।
 
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