धर्म विशेष

देश हित में JNU (देशद्रोह व वामपंथ ) जैसी संस्थाएं बंद करनी चाहिए----!

 जेएनयू जैसी शिक्षण संस्थाएं वंद करने का समय आ गया है-?
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 "यथा नामे तथा गुणें" वाली कहावत चरितार्थ होती दिखाई देती है जो संस्थान जवाहर लाल नेहरू के नाम होगी उसकी परिणीति भी वैसी ही होगी जैसे 'प. जवाहरलाल नेहरू' कैसे थे! वे 'काले अंग्रेज़' थे, वे संयोग वस भारतीय थे उनके अंदर भारतीयता का कोई गुण नहीं था, देश बिभाजन करा देश को धोखा देकर प्रधानमंत्री बने, जब वे प्रधानमंत्री हुए तो उन्होंने भारत के स्वाभिमान से जुडी हुई सारी की सारी शिक्षा समाप्त कर दी जिससे भारतीय स्वाभिमान ही समाप्त हो जाय बच्चों को जिनसे प्रेरणा मिल सके वे सब समाप्त कर दिया जिस कारण देश भक्ति जैसा सब कुछ गायब, भारतीय स्वाभिमान के प्रतिक 'पृथ्बीराज चौहान, महाराणा प्रताप, शिवाजी महाराज, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, स्वामी दयानन्द सरस्वती, शंकराचार्य और चाणक्य चन्द्रगुप्त जैसे को पाठ्यक्रम से हटा दिया जाना इनके स्थान पर राजाराम मोहन राय, अकबर, औरंगजेब और नेहरू जैसे को पाठ्यक्रम मे सामिल करना क्या दर्शाता है --?

न्यायाधीश की टिप्पड़ी---!
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JNU की हालत से परेशान दिल्ली हाईकोर्ट की माननीय न्यायाधीश ''प्रतिभा रानी'' ने टिप्पड़ी की है कि "जब भी शरीर में संक्रमण फैलता है पहले मुंह के रास्ते दवा देकर उसे रोकने का प्रयास किया जाता है, कई बार सर्जरी करना पड़ता है लेकिन अगर संक्रमण इतना फ़ैल जाय कि मांस सड़ने लगे तो अंग को काटना ही मात्र एक उपाय है" हमें न्यायाधीश कि चेतवानी को ठीक प्रकार से समझनी चाहिए कि यदि हम JNU को सही दिशा में नहीं ल सकते तो उसका क्या करना! क्या शिक्षा और अभिब्यक्ति के नाम पर हम राजधानी में देशद्रोही मदरसा खड़ा करने की छूट देना चाहते हैं नहीं--! यह संभव नहीं है भारत की जनता को यह स्वीकार नहीं समय रहते इसका इलाज होना चाहिए !

देशद्रोह का मार्ग---!
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इन वामपंथियों ने बिहार के एक गरीब परिवार के बेटे को जिसे पढाई पर ध्यान देना चाहिए था जो अपने माता- पिता का सहारा बन सकता था उसे 'सीताराम येचुरी' जैसे नेताओं ने "चढ़ जा बेटा सूली पर भगवन भला करेगा ", JNU के माहौल को गलत दिशा में धकेल दिया जेएनयू एक मार्क्सवादी मदरसा बनकर रह गया है, जरुरत है कि समय रहते इस संक्रमण को रोक दिया जाय, इसे सड़ने से बचा लिया जाय, अभिब्यक्ति और वामपंथ के नाम पर यहाँ आये दिन देशद्रोही बे रोकटोक गतिविधियाँ चला रहे हैं इसे रोकने का कोई प्रयास नहीं किया गया, देशद्रोह फैशन बन गया जो यहाँ देश भक्ति की बात करे उसका मजाक उड़ाया जाता है इस कारन यहाँ के अपरिपक्व क्षात्र लाल श्याही लगा कर शहीद बनने कि कोशिश कर रहे हैं, ये वामपंथी किस स्वतंत्रता की बात करते है क्या वे रसिया में ऐसा कर सकते है-! क्या चीन में अभिब्यक्ति कि स्वतंत्रता है-! रुश, चीन, नेपाल सहित वामपंथी देशों में दश करोड़ लोगो की हत्या करके सत्ता पर काबिज हैं वे किस मुंह से लोकतंत्र और अभिब्यक्ति की बात करते है -?

राष्ट्रवादियो को रोकने का प्रयत्न 
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अगर आज़ादी चाहिए तो वहां सुब्रमण्यम स्वामी और बाबा रामदेव को जाने की आज़ादी क्यों न हो--? jnu कोई भारतीय राजधानी के अंदर पूर्ण स्वतंत्र गणराज्य तो नहीं जहाँ केवल वही प्रबेश पाएं जिसे हिन्दू शब्द से चिढ हो औेर अति वामपंथी विचार धारा से जुड़े हों मार्क्सवादी विचार में इसका वामपन्थी करण हो चूका है, अब इस संसथान के भारतीय कारन की आवस्यकता है ऐसी विचारधारा क्यों वहां प्रबल हो गयी कि हिन्दू बिरोधी या भारत बिरोधी होकर ही आप प्रगतिशील कहलाएं --? अभिब्यक्ति की आज़ादी लोकतंत्र एक आवस्यक गुण है, लेकिन इसकी कुछ सीमाएं हैं, देश बिरोधी नारे अभिब्यक्ति की आज़ादी का हिस्सा नहीं हो सकती ।

प्रासांगिकता समाप्त--!
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जेएनयूं अपनी स्थापना के समय से वामपंथी विचार धारा का गढ़ रहा है अब यह भारत ही नहीं सारी दुनिया में अपनी प्रासंगिकता खो चूका है, अब इस विश्व विद्यालय से प्रशिक्षित क्षात्र अति वामपंथी बनकर बिहार, झारखण्ड, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के जंगलों में हिंसा हत्या कर रहे हैं यही इनकी उपयोगिता है ये प्रगतिशीलता के नाम पर ब्यभिचार करना इसी को आज़ादी कहते हैं कैसे हैं इनके माता- पिता जो अपने बच्चों को इस jnu में भेजते हैं । 

योजना वद्ध षड़यंत्र--!
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जेएनयूं में लगे पोस्टरों पर इस विश्व विद्यालय कि प्रतिष्ठा के लिए चिंतित प्रोफेसरों और खुद को उत्कृष्ट बताने वालों का मौन सुनाने लायक है, पता नहीं कौन जे एन यूं में देशबिरोधि नारे लगाए और किसने अफजल को शहीद बनने वाला पोस्टर लगाए लेकिन ऐसे ही पोस्टर में कहा गया है " अफजल तुम्हारे अरमानों को हम मंजिल तक पहुंचाएंगे", कुछ लोगों को यह लगता है कि ऐसे- वैसे पर्चे पर कोई ध्यान देने की जरुरत नहीं है, उन्हें रहमत अली से परिचित होना चाहिए, कैम्ब्रिज में ३-हैमबस्टर्न रॉड के एक घर में रहमत अली ने २६ जनवरी १९३३ को पहली बार एक परचा बनाया था जिसमे लिखा था कि पाकिस्तान नाम का अलग देश क्यों, कैसा बनना चाहिए, यह बताने कि जरुरत नहीं कि १९४७ आते-आते क्या हुआ ? जिन्हे यह लगता है कि ऐसे- वैसे नारे तो बस नारे ही होते हैं वे शायद जान- बूझकर आँख बंद किये हैं अथवा यादास्त कमजोर पड़ गयी है उसे ठीक करने की आवस्यकता है। 

समयानुकूल कार्य करने चाहिए 
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भारतीय राजनीति और राष्ट्रियता के प्रेरणा पुंज आर्य चाणक्य का कहना था कि यदि एक गाँव के कारण एक जनपद बर्बाद होता है तो उस गाँव को समाप्त कर देना चाहिए, उसी प्रकार यदि एक जनपद के कारण कोई प्रदेश का संस्कार नष्ट होता है तो उस जनपद पर विचार करना चाहिए आज समय की अवस्यकता है कि भारत मे बहुत सी शिक्षण संस्थाएं हैं यदि उनमे से कोई देशद्रोही, आतंकवादी और अलगाववादी की नर्सरी बनाता है तो समय रहते उस पर विचार करना चाहिए और कड़ाई पूर्वक उसे बंद कर देना चाहिए इसी मे देश हित है----!                  

1 टिप्पणी

बेनामी ने कहा…

गंगोत्री से यदि जल नही आयेगा तो नहर व वर्षा के पानी से गंगा जी नही बहेंगी उसी प्रकार जेएनयू मे भारतीय थीम के बिपरीत पाठ्यक्रमों से क्या अपेक्षा कर सकते है इसलिये भारतीय संस्थानों मे भारतीयता आवश्यक है नही तो राष्ट्र हित मे बन्द करना उचित रहेगा।