धर्म विशेष

जेएनयू वामपंथ (आतंकवाद) का मदरसा मात्र अथवा शिक्षा का केंद्र ---!

          
            आज एक नया नारा लेकर वामपंथी मैदान में आये हैं जैसे जब दीपक को बुझाना होता है तो वह भभकता है नारा है अथवा कार्यक्रम कहिये
''मै JNU बोल रहा हूँ'"-------!
JNU क्या बोल रहा है-- 
तेरे कातिल जिन्दा हैं अफजल हम शर्मिंदा हैं !
तेरे कातिल जिन्दा हैं याकूब हम शर्मिंदा हैं--!
भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जंग रहेगी --!
हमें चाहिए आज़ादी- कश्मीर की आज़ादी तक जंग जारी रहेगी 
हमें चाहिए आज़ादी -भारत की बर्बादी तक जंग जारी रहेगी 
भारत तेरे टुकड़े होंगे -इंसा अल्ला -इसा अल्ला---! वास्तविक jnu यही है जो नासमझ हैं वे इसे शिक्षा मंदिर भी कह सकते हैं लेकिन कोई भी विवि देशद्रोही कृत्य पर उतर जाय तो आप क्या कहेंगे ?
            वास्तविकता यह है जहां सारे विश्व मे वामपंथ मृत्यु साइया पर पड़ा हुआ है वहीं भारत की राजधानी के एक विवि. जेएनयू जो भारत के अच्छे विश्व विद्यालय मे से एक है लेकिन इस जेएनयू मे हमेसा राष्ट्र विरोधी गति-विधियों का केंद्र चर्चा मे रहता है जेएनयू शिक्षालय न होकर बामपंथालय बनकर रह गया यह प्रतिष्ठित विश्व विद्यालय देश के लिए कोई महत्व पूर्ण उपलब्धि न दे सका, यह नहीं कहा जा सकता की कोई राजनेता, वैज्ञानिक अथवा और किसी क्षेत्र कोई उपलब्धि कुछ पता नहीं हाँ जेएनयू का योगदान है जहां हमेशा संदेह के घेरे मे रहे वामपंथ जो इस समय अपनी प्रासंगिकता खो चुका है वह जेएनयू को अपना ट्रेनिंग सेंटर बनाया हुआ है यहाँ से प्रशिक्षित माओवादी मध्य प्रदेश, छत्तिस गढ़, बिहार, आंध्रा व नार्थईस्ट मे माओवादी आतंकीवादी देश भर मे फैले हुए हैं जिंनका काम लेवी वसूलना, हत्या- हिंसा और किसी भी सरकार को अस्थिर करन तथा सेकुलर पत्रकार जो दिन भर भारत को कोसने गाली देने, हिन्दू देवी देवताओं को गाली देने मे लगा देते हैं इसकी वास्तविकता यही है की डूबते हुए बामपंथ की प्रयोग शाला या मार्क्सवादी मदरसा के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं ।
          आज जेएनयू की बहस ने देश को दो विचार धारा मे बाँट दिया है एक राष्ट्रवाद तो दूसरा आतंकी याकूब मैनन, मकबूल बट, अफजल के पक्ष का आज सारी राजनैतिक पार्टियां दो खेमे है एक देश हित के लिए दूसरा देश द्रोह के लिए बटीं दिखाई देती हैं ऐसे ही पत्रकार समूह भी दिखाई दे रहे ये केवल दिल्ली मे हो रहा है ऐसा नहीं तो भारत के कोने कोने से अपनी-अपनी माँद से निकाल रहे हैं, ऊंची अच्छे शिक्षा के केंद्र हैं वहीं चुनौती है आज समय की अवस्यकता है की सरकार सभी शिक्षालयों की जांच करे, निर्दयता पूर्बक कठोर कार्यवाही होनी चाहिए और देश हित मे यदि ऐसे शिक्षा केंद्र को बंद करने से हिचकना नहीं चाहिए  . 
          क्या यह महज इत्तिफ़ाक़ महज है की हैदरावाद में रोहित बोमुला और उसके साथी और jnu में कन्हैया कुमार के साथियों को याकूब मेनन और मकबूल बट और अफजल जैसे आतंकवादी के प्रति इतनी सहानुभूति है की वे इनकी वारसी ऐसे मानते हैं जैसे वे स्वतंत्रता सेनानी हों यह इत्तिफ़ाक़ नहीं हो सकता इसके पीछे गहरी सोची समझी साजिस है यह दलितों अथवा मुसलमानों के अधिकारों की लड़ाई नहीं है यह देश तोड़ने का अभियान है , राजनितिक दलों, बुद्धिजीवीयों और आम लोगो को सोचना चाहिए किक्या अफजल और याकूब मेनन हमारे युवाओं के आदर्श बनेगे ? जिन लोगों को लग रहा है कि ऐसे क्षात्रों का समर्थन करके वे संघ परिवार के खिलाफ अपनी जंग जीत जायेंगे वे मुगालते में हैं देश बिरोधियों का साथ देकर आप क्या करना चाहते हैं--? इन देशद्रोहियों को ध्यान देना होगा अब देश जग रहा है सरकार नहीं जनता इसका जबाब देगी जनता के पैसे पर पलने वाले देशद्रोहियों की पहचान हो गयी है अभी तक की सरकारें इनके कुकृत्यों पर पर्दा डाले हुई थी जनता उन्हें भी माफ़ नहीं करेगी , भारतीय जनता अब मन बना चुकी है वह किसी भी प्रकार के आतंकवाद को बर्दास्त नहीं करेगी चाहे वह इस्लामिक हो अथवा मार्क्सवादी---! 

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