हिन्दू क़ा राजनीतिकरण और राजनीती क़ा हिन्दू करण होना चाहिए ----- इसी में भारत और हिन्दुओ दोनों हित है .

        
       वीर सावरकर ने लगभग ८० वर्ष पूर्ब कहा था कि हिन्दू समाज को हिन्दू राजनैतिक दृष्कोद से सोचने की जरुरत है हिन्दू क़ा राजनीति कारण और राजनीती क़ा हिन्दू कारण जब तक यह नहीं होगा तब तक हिन्दू और भारत दोनों की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं हो सकती, लगता है भारतीय जानता पार्टी भी उस आवश्यकता को पूरी नहीं कर पा रही है उसने मुस्लिम तुष्टिकरण निति अपना कर हिन्दुओ क़ा विस्वास लगभग खो दिया है इसलिए आज भारत को हिन्दू दृष्टि से राजनितिक दिशा में बढ़ने की आवस्यकता है, मैंने इसमे प्रख्यात पत्रकार राष्ट्रवादी विचारक "शंकर शरण" क़े लेख को आधार बनाने क़ा प्रयत्न किया है । 
          पश्चिम बंगाल के छोटे से शहर "देगागा" में इस वर्ष "दुर्गा पूजा" नहीं मनाई गई, क्योंकि तृणमूल काग्रेस से जुड़े एक दबंग मुस्लिम नेता ने हिंदू आबादी पर सुनियोजित हिंसा की, इस पर सत्ताधारी लोग और मीडिया, दोनों लगभग मौन रहे। स्थानीय हिंदुओं को भय है कि उन पर हमले करके आतंकित कर उन्हें वहां से खदेड़ भगाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। असम और बंगाल में कई स्थानों पर यह पहले ही हो चुका है, इसलिए इस जनसाख्यिकी आक्रमण को पहचानने में वे भूल नहीं कर सकते, बिहार में अनेक स्थानों ढाका, चकिया, दरभंगा, बेतिया में परंपरा गत निकलने वाले महाबीरी झंडो पर हमले हुए सैकड़ो हिन्दुओ की गरफ्तारी हुई उन्ही क़े जुलुस पर मुसलमानों ने हमला किया था उन्ही को गिरफ्तार किया गया इतना ही नहीं भा.ज.पा. ने अपने लोगो को हिन्दुओ को मदद करने से राका, वस्तुत: ऐसी घटनाओं पर राजनीतिक मौन ही इसके वास्तविक चरित्र का सबसे बड़ा प्रमाण है।
         क्या किसी शहर में मुस्लिमों द्वारा किसी बात पर विरोध-स्वरूप ईद न मनाना भारतीय मीडिया के लिए उपेक्षणीय घटना हो सकती थी। चुनी हुई चुप्पी और चुना हुआ शोर-शराबा अब तुरंत बता देता है कि किसी साप्रदायिक हिंसा का चरित्र क्या है। पीड़ित कौन है, उत्पीड़क कौन। जब भी हिंदू जनता हिंसा और अतिक्रमण का शिकार होती है, राजनीतिक वर्ग और अंग्रेजी मीडिया मानो किसी दुरभिसंधि के अंतर्गत मौन हो जाता है, यह आसानी से इसलिए संभव होता है, क्योंकि भारत में कोई संगठित हिंदू राजनीतिक समूह नहीं है। हिंदू भावनाएं, दुख या चाह को व्यक्त करने वाला कोई घोषित या अघोषित राजनैतिक संगठन नहीं है।
         कुछ लोग भाजपा को हिंदू राजनीति से जोड़ते हैं, किंतु इस पर हिंदुत्व थोपा हुआ है। स्वयं भाजपा ने कभी हिंदू चिंता को अपने एजेंडा घोषित नहीं किया। इसने पिछला लोकसभा चुनाव भी विकास और मजबूती के नारे पर ही लड़ा था। गुजरात, मध्य प्रदेश या बिहार में भी वह हिंदू चिंता नहीं की नरेन्द्र मोदी क़ा भी भा.ज.पा. ने खुलकर साथ नहीं दिया ,केवल अपनी सेकुलर छबि को बचाने क़े लिए, उसके  समर्थक भाजपा पर भटकने का आरोप इसलिए लगाते हैं, क्योंकि हिंदू चिंता को उठाने वाला कोई दल न होने के कारण वे भाजपा पर ही अपनी आशाएं लगा बैठते हैं, भाजपा इन आशाओं का विरोध नहीं करती, पर उसने कभी इन आशाओं को पूरा करने का वचन भी नहीं दिया। राम मंदिर बनाने की बात या धारा 370 हटाने की आवश्यकता बताना-हिंदू राजनीति नहीं है, अयोध्या में ताला खुलवाकर पूजा की शुरुआत तो राजीव गांधी ने ही की थी, इसी प्रकार धारा 370 के अस्थायी होने की बात तो संविधान में काग्रेस ने ही लिखी थी।
        अत: इक्का-दुक्का भाजपा नेताओं द्वारा कभी-कधार कुछ कहना हिंदू राजनीति नहीं है। यह कभी-कभार हिंदू भावनाओं को उभारती या उपयोग करती है, पर यह नीति भारत में प्रचलित हिंदू-विरोधी सेक्युलरवाद से पार नहीं पा सकती। उसी तरह वह हिंदुत्व भी अकर्मण्य है जिसमें खुल कर सामने आने का साहस नहीं, जो हर हाल में सही बात कहने की दृढ़ता न रखता हो, वह भी व्यर्थ हिंदुत्व ही है जो केवल सत्ता पाने अथवा पहले सत्ता में आने के लिए हिंदू भावनाओं का उपयोग करने का प्रयास करता हो। यह सब छद्म हिंदुत्व है जो यहां प्रचलित सेक्युलरवाद से हारता रहा है, हारता रहेगा,क्यों की उसका भाव सात्विक नहीं है, उपर्युक्त भाव और रूप किसी दल या नेता की विशेषताएं नहीं हैं। यह विभिन्न संगठनों और विभिन्न नेताओं-कार्यकर्ताओं की विशेषताएं हैं। यह अपने स्वभाव से ही इतना दुर्बल है कि शिकायतें करने और दूसरों पर निर्भर रहने के सिवा कुछ नहीं कर सकता, इसीलिए छद्म हिंदुत्व, शिकायती हिंदुत्व और हिंदू राजनीति के अभाव में वस्तुत: कोई भेद नहीं है। अत: इस गंभीर सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए कि जिस तरह मुस्लिम राजनीति एक स्थापित शक्ति है, उसी तरह किसी हिंदू राजनीति का अस्तित्व ही नहीं है। हिंदू भावनाओं वाले कुछ नेता-कार्यकर्ता अनेक दलों में हैं, पर हिंदू भावना एक बात है और हिंदू राजनीति को स्वर देना बिलकुल दूसरी बात है इसका मतलब यह नहीं कि किसी और बिचार को प्रचार -प्रसार क़ा अधिकार न हो. 











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