जाग रे नचिकेता जाग -------------!


गुरुवार, 9 मई 2013

       नचिकेता ऋषि वाज्रश्रवा के पुत्र थे यह कठोउपनिषद की कथा है इनके पिताश्री बड़े ही दानी प्रबृति के थे वे अन्न, गऊ दान कर यशस्वी हो रहे थे, देश के चारो कोने-कोने में बड़ा ही प्रचार था गऊ और अन्न दान में मिलने वाला है बड़ी संख्या में लोग आये थे, विश्वजीत नमक यज्ञ में उन्होंने अपनी सारी धन-संपत्ति दान कर दी नचिकेता को ध्यान में आया कि मेरे पिताजी तो बूढी गायों को भी दक्षिणा में दे रहे हैं जो किसी काम की नहीं हैं, मेरे पिता को उचित फल नहीं मिलेगा बालक बड़ा ही ब्यथित हुआ बार-बार पिताजी को उनकी गलतियों की तरफ ध्यान दिलाने जिससे कोई अनिष्ट न हो, के पश्चात् जब उसे सफलता नहीं मिली तो उसने अपने पिता से विनय पूर्बक कहा कि हे पिताश्री मै भी आपका ही धन हूँ आप मुझे किसे दान दे रहे हैं, नचिकेता ने तीन बार आग्रह किया पहले तो ऋषि ने ध्यान नहीं दिया लेकिन जब बालक का आग्रह बना रहा तो उन्होंने नाराज होकर कहा, जा तुझे मै यमराज को दान देता हूँ यानी मृत्यु को वरण कर! हमें यह बात ध्यान में रखना है की भारतीय मेधा कितनी सतर्क है उसे अपने पिता जी की ही गलतियाँ स्वीकार नहीं और अपने बाप के खिलाफ बिद्रोह किया, इतना ही नहीं वह अपने युग का महान पित्र भक्त भी था आखिर वह ऋषि पुत्र है उसे तो अपने काम करना ही है अपने पूज्य पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर उनका भी उद्धार करना है, ऋषि की बात प्रेम से आत्मसात कर वही शरीर को छोड़ मृत्यु स्वीकार कर यम-लोक चल दिया.
         उसने यमराज का दरवाजा खट-खटाया वे बाहर थे प्रहरी ने बताया की तीन दिन बाद लौटेगे वह बालक धैर्य पुर्बक भूखा-प्यासा तीन दिन तक उनके दरवाजे पर बैठा है, यमराज ने आते ही पूछा या कौन अतिथि हैं पता चला की वे तो मृत्यु को वरण करने आये ऋषि कुमार नचिकेता हैं यमराज कहा की अभी तुम्हारा समय नहीं हुआ है तुम वापस जाओ बालक, पिता ने विद्वान पुत्र को मौत के मुह में धकेल दिया लेकिन धर्मराज को ये स्वीकार नहीं--! नचिकेता वापस जाने को तैयार नहीं जब यमराज को पता चला की वह ब्राह्मण कुमार तीन-दिन भूखा प्यासा यहाँ इंतजार कर रहा है तो फिर वे एक दम पसीज गए बोले तुम तीन दिन भूखे -प्यासे रहे हो उसके बदले तीन वर माग लो, 'तस्मात् प्रति त्रीन वरान वृणीष्व' उस मेधावी नचिकेता ने उमकी एक न सुनी उसने मृत्यु के रहस्यों को जानने का आग्रह करता रहा यमराज प्रसंद होकर कोई तीन वर मागने को कहा क्यों की यह बालक तीन दिन उनके दरवाजे पर बिना अन्न-जल के रहा आज हमें सोचना है की भारतीय मेधा कैसी थी जो यमराज को भी नतमस्तक कर दे रही है और मजबूर हैं यमराज वह सब बताने को जो नचिकेता जानना चाहता है,
यमराज तथास्तु कहा----------!
 १- नचिकेता ने कहा की हे मृत्यु के देवता मै जब घर वापस जाऊ तो मेरे पिता नाराज न हों शांति संकल्पित, प्रसंद्चित और क्रोध रहित हो जाय, जब मै लौटकर जाऊ तो मुझे पहचानकर प्रसन्नता पूर्बक मुझसे बात-चित करें पित्र भक्त नचिकेता ने प्रथम वर मागा.
 २-  नचिकेता ने अग्नि के स्वरुप के बारे में जानकारी हेतु पूछा, हे धर्मराज मैंने जाना है की स्वर्ग लोक में कोई दुखी नहीं रहता, कोई रोगी नहीं, बुढ़ापा नहीं, किसी को मृत्यु का भय नहीं, इस कारण जिस कर्म करने के पश्चात् स्वर्ग की प्राप्ति होती है वह पद्धति मुझे बताईये.धर्मराज ने बताया की स्वर्ग प्राप्त करने के लिए यज्ञ करना पड़ता है यज्ञ का अर्थ कर्म, त्याग परोपकार से है धर्मराज ने जिन छोटी-छोटी बातो को बिस्तर से बताया हू-बहू नचिकेता ने याद कर लिया मेधावी नचिकेता ने सब धर्मराज को सुना दिया उसकी स्मरण शक्ति से प्रभावित धर्मराज प्रसंन्द होकर कहा तुम्हारा नाम "नचिकेता यज्ञ" के नाते जाना जायेगा, तुम एक अतिरिक्त वर माग सकते हो.
३- शास्त्र कहते है की मृत्यु के पश्चात् शरीर का अस्तित्व समाप्त हो जाता है आत्मा रहती है वास्तव में मनुष्य मरता नहीं अमर है कुछ का कहना है की मृत्युके पश्चात् मनुष्य का सब-कुछ समाप्त हो जाता है उसका कोई अस्तित्व नहीं रहता, वह आत्मतत्व मै आपको मुख से सुनना चाहता हूँ.
     यमराज ने बड़ी ही कोसिस की नचिकेता यह वर न मागे वे नहीं जानते थे कि वाजश्रवा का यह जिद्दी पुत्र इस वर का अधिकारी है भी या नहीं इसके बदले वे बहुत सा लालच, धन-दौलत देने का प्रलोभन दिया उसपर कोई प्रभाव नहीं हुआ, और अंत में वे बहुत प्रभावित होकर नचिकेता के वैराग्य की प्रसंशा करते हुए कहा आप तो बड़े ही भाग्यशाली है आप श्रेय चाहते है तथा विद्या के अधिकारी हैं, शोकादि क्लेशो को पार कर परमानन्द की प्राप्ति न तो वेद के प्रवचन से, न विशाल बुद्धि से, न जन्म भर शास्त्रों के श्रवण से, वह उन्हीं को प्राप्त होता है जिनकी वाशानाएं शांति हो चुकी हैं, कामनाएं समाप्त हो चुकी हैं, जिनका अंतःकरण पवित्र है और उसे पाने के लिए ब्याकुल हो जाते हैं, आत्मज्ञान प्राप्त कर लेने के पश्चात् नचिकेता लौटे तो देखा की बृद्ध तपस्वीयों का समुदाय उनके स्वागत के लिए खड़ा है, आज भारत के नचिकेताओं को जागने की आवस्यकता है भारत में न तो मेधा की कमी है, न तो धन की, न ही ज्ञान की, इसलिए तभी भारत विश्व गुरु बन सकेगा जब हिन्दू युवकों की जिज्ञासा नचिकेता के सामान होगी, जिस कठोपनिषद के कारन हम नचिकेता को याद करते हैं स्वेतकेतु और वाजश्रवा दोनों उद्दालक ऋषि के पुत्र होने के नाते नचिकेता उद्दालक अरुनि के पौत्र हुए.. 
       इस कारण आज हे भारत तेरा ही आवाहन---- जाग रे नचिकेता जाग---!         
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