भगवान परसुराम -------पृथ्वी के उद्धारक न कि क्षत्रिय संहारक -------!

      
ब्रिटिश व बामपंथियों का भ्रमजाल--!
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भगवान परसुराम का जन्म (वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीय) अक्षय तृतीया (१३मई) के दिन हुआ था वे भगवान विष्णु के २४वे अवतार माने जाते है कुछ लोग उन्हे भगवान शंकर का भी अवतार मानते हैं उनके विषय मे बड़ी ही गलत भ्रान्ति ब्याप्त है  कि वे क्षत्रियों के संहारक थे--! कहते हैं कि उन्होने २१वार धरती क्षत्रियों से विहीन कर दिया था यदि यह सत्य है तो भारत मे सर्बाधिक जनसंख्या वाला यह जागृत स्वाभिमानी समाज आज स्वाभिमान के साथ जीवित ही नही है बल्कि भारतीय राजनीति मे अपना अस्तित्व बनाए हुए है भारत मे सबसे अग्रगड़ी है, इसका अर्थ यह है कि हमारे इस महापुरुष को बदनाम कर आपस मे मत भिन्नता पैदा करने का काम परकिय शासन मे किया गया और हमने बिना अपने पुर्बजों को पढे, समझे ही इन बातों को स्वीकार का लिया वास्तविकता यह है की त्रेता युग में भगवान श्रीराम के पहले दक्षिण के हैय-हैय वंशीय क्षत्रिय राजवंश की निरंकुशता के खिलाफ उत्तर पूर्व के राजाओं का संयुक्त प्रयास जिसके नेतृत्व करता (योजक) परसुराम थे, ब्रिटिश व बामपंथी इतिहासकारों ने सुनियोजित तरीके से समाज को विभाजित करने हेतु यह असफल प्रयास किया।

अर्जुन सहस्त्रबाहु का संहार--!
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''भगवान परसुराम'' के पिता ''ऋषि जमदग्नि'' और माता ''रेणुका'' थी जो 'इक्ष्वाकु वंश' की पुत्री थीं उनकी तपस्थली नर्मदा तट था कर्म क्षेत्र पूरा भारतवर्ष था 'हयहय वंश' के क्षत्रियों मे श्रेष्ठ ''सहस्त्रबाहु'' 'महिस्मतीपुर' का राजा बड़ा ही आततायी प्रजा पालक न होकर निरंकुश, अत्याचारी तथा बिधर्मी था पश्चिम भारत मे हयहय बंश का ही प्रभाव था 'परसुराम' ने ''भगवान शंकर'' की तपश्या कर ''परसु'' नाम का अस्त्र प्राप्त किया तब से उनका नाम 'परसुराम' हो गया पहले इनका नाम राम था 'महिष्मतीपुर' का राजा 'सहस्त्रबाहु'' ''भगवान दत्तात्रेय'' की तपस्या कर अजेय बना हुआ था परसुराम ने उसके संहार हेतु ''भगवान विष्णु'' की तपस्या की और वरदान प्राप्तकर 'कीर्तिवीर्य अर्जुन सहस्त्रबाहु' पर आक्रमण किया परसुराम को 2० बार भागना पड़ा २१वी बार उन्होंने सहस्त्रबाहु को मार गिराया इस प्रकार उन्होंने २१ बार क्षत्रियों का संहार किया यह वर्णन अतिशयोक्ति ही नहीं समाज का विभाजन करने वाला है,  उन्होंने पूरे देश का प्रवास कर राजाओ को संगठित किया 'अयोध्या' 'राजबंश' के नेतृत्व मे यह न्यायोचित युद्ध लड़ा यह संहार ब्रह्मण ऋषि परसुराम द्वारा नहीं उनके जनकल्याण कार्यों मे सहयोगी राजाओ के नेतृत्व मे युद्ध हुआ और न्याय पक्ष विजयी हुआ यह बात ठीक है कि पश्चिम के राज़ा कमजोर नहीं थे, यह युद्ध कई बार हुआ इस प्रकार महान पराक्रमी विश्व विजेता 'सहस्त्रबाहु' का संहार 'भगवान विष्णु' द्वारा दी हुई शक्ति से हुआ, जिसकी योजना परसुराम जी द्वारा बनाई गयी थी, आखिर वे हमारे महापुरुष थे वे गलत कर ही नहीं सकते उन्होंने समता मूलक समाज के निर्माण हेतु यह काम किया होगा न कि कोई बदला लेने के लिए समदृष्टि रखने वाला जिसने अपने गुरुकुल में बिना किसी भेद के शिष्य रखा हो जिसके गुरुकुल में महाभारत के 'युगपुरुष भीष्म' जैसे शिष्य रहे हों फिर आप कैसे यह आरोप लगा सकते है कि परसुराम क्षत्रियों के संहारक हैं, वे ब्रह्मण अथवा भूमिहार नहीं थे उन्हें किसी जाती में बाधना उनपर अत्याचार करना है.

अधर्म के प्रतिक -----!
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वे जब जनकपुर भगवान श्रीराम जी के स्वयंबर में आते हैं शिव धनुष को टूटा देख दुखी हो क्रोध वश लक्षमण से संबाद होता है लेकिन भगवान श्रीराम की मर्यादा देखिये उन्होंने भगवान परसुराम का सम्मान ही किया और कहते हैं की इस धनुष को तोड़ने वाला कोई गैर नहीं आपका दास ही होगा, परसुराम जी ने २१ बार अत्याचारी, बिधर्मी राजाओं का संहार किया वे अत्याचार बिरोध के प्रतीक बन गए, परसुराम 'सप्त चिरंजीवियों' में से एक हैं-- ''अस्वस्थामा बलिर्ब्यासो हनुमानश्च विभीषण, कृपा परसुरामश्च सप्तैताम चिरंजीवीनः'' वे अमर हैं, चिरंजीवी हैं आज भी हमारे बीच में हैं हम उनका स्मरण तो निर्छल भाव से करें, उनका अवतरण एक विशेष कार्य के कारन हुआ था वह भगवान श्रीराम दर्शन के साथ पूर्ण हुआ और वे वर्तमान झारखण्ड के ''टांगीनाथ'' में तपस्या हेतु चले गए.
         अक्षय तृतीया के उनके जन्मदिन अवसर पर हिन्दू समाज को आधुनिक परसुराम की प्रतीक्षा में हार्दिक बधाई---------!     

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