धर्म विशेष

हमारे वैदिक ऋषि अगस्त भारतीय मूल्यों के प्रेरणा श्रोत ---।

         
               मै आपको ले चलता हूँ सैकड़ों, हजारों नहीं लाखों वर्ष पूर्व जब सम्पूर्ण जगत विशेषकर पश्चिम मे लोग नंगे ही नहीं रहा करते थे बल्कि असभ्य भी थे जिन्हे भोजन बनाना व क्या खाद्य है अथवा क्या अखाद्य है पता नहीं था उस समय भारत वर्ष जिसे हम आर्यावर्त कहते हैं महान संस्कृति का निर्माण हो रहा था जिसे हम सप्त सिंधु कहते थे वास्तव मे वही आर्यावर्त था जहां वेदानुकुल गुरुकुल बनाने की बाढ़ सी थी जहां शस्त्र और शास्त्र दोनों की शिक्ष दी जाती थी यह वह काल था यदि ये कहा जाय कि मैत्रावरुण पुत्र आर्यावर्त (सप्त सिंधु) के प्रथा ऋषि थे तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी भरत, त्रित्सु और भृगु जैसी प्रतिष्ठित वंशो को शिक्षित करने शस्त्र -शास्त्र सिखाने का कार्य यानी आर्यों को सुसंस्कृति बनाने योद्धा बनाने का, उत्तर-दक्षिण को जोड़ने का कार्य उन्होंने किया वे आदि आचार्य थे यदि कहा जाय तो आर्यावर्त के प्रथम गुरुकुल का श्रेय उन्ही को जाता है, जब वेदों की ऋचाएं ऋषि विस्वामित्र, अगस्त और वशिष्ठ के कंठों के द्वारा अवतरित होती थी कहते है उन्हे मंत्र दर्शन होते थे, ऋषि अगस्त की प्रतिमूर्ति हैं विस्वामित्र, वे राज़ा थे गुरुकुल मे पढ़ते हुए उन्हें मंत्र दर्शन हुए वेद का प्रथम मंत्र जिसे हम गायत्री मंत्र कहते हैं प्रकटीकरण ऋषि विस्वामित्र के कंठ द्वारा हुआ वे उस मंत्र के रचनाकार माने जाते हैं विश्वामित्र वेदमन्त्र के प्रथम द्रष्टा थे।
           ऋषि अगस्त उस समय के महान रचनाकार आर्यों के उद्धारक देवदर्शन करने वाले और सम्पूर्ण आर्यावर्त को सुसंस्कृति, सुरक्षित और समृद्धि के रक्षक थे वे राजा नहीं थे बल्कि राजाओं के नेतृत्वकर्ता थे राजा शासक था लेकिन संचालन ऋषियों के हाथ मे था, ऋषि अगस्त आर्यों को सुद्ध रक्त रखना चाहते थे सप्त सिंधु (भारतवर्ष) मे दो प्रकार की संस्कृतियाँ विकसित हो रही थीं आर्य और असुर (दस्यु) दोनों मे संघर्ष था वे दोनों गलत फहमी के शिकार थे असुरों मे प्रचार था कि ऋषि अगस्त पानी के स्थान पर असुरों का रक्त ही पीते हैं आर्यों को लगता था कि दास दस्युराज शंबर आर्यों का भुना हुआ मांस खाते हैं दोनों मे कितना संघर्ष था हम समझ सकते हैं जहां दासराज के पास किलों कि संख्या अधिक थी वे समृद्ध भी थे वहीं आर्य राजा सुसंकृत सभ्य और सौम्य थे, विश्वरथ भरतों (आर्यों) के राजकुमार थे जो उस समय का सबसे प्रतिष्ठित राजवंश था आर्यावर्त के कई राजकुमार वहाँ (ऋषि अगस्त के गुरुकुल)शिक्षा ग्रहण करते थे सप्त सिंधु मे आर्यों का ही साम्राज्य रहे इसकी चिंता अगस्त को हमेसा रहती वही दासराज अपने राज्य विस्तार मे लगा रहता उसके पास 90 किले पत्थर के थे वे सम्पन्न भी थे। 
            एक दिन असुरराज शम्बर अपने कुछ सैनिको के साथ ऋषि अगस्त के गुरुकुल से राजकुमार विश्वरथ व उसके साथियों का अपहरण कर अपने किले मे ले गया यह समाचार आग के समान फैल गया विश्वरथ बचपन से ही आध्यात्मिक थे उन्हे देव दर्शन व देव-आज्ञा होती थी उन्हे कई दिन बंदी बनाकर दासराज ने रखा विश्वरथ अपने कुशल ब्यवहार से सबको प्रभावित कर लिया दस्युराजकुमरी विश्वरथ से प्रेम करने लगी वह उनके बिना नहीं रह सकती थी लेकिन वह कुरूप और काली थी विश्वरथ दासों को भी सम्मान कि दृष्टि से देखते थे वे उन्हे भी आर्य बनाना चाहते थे पहले तो अगस्त इससे सहमत नहीं थे बहुत से तर्क व जिद के पश्चात वे सहमत हुए लेकिन उनसे वशिष्ठ सहमत नहीं थे वे और विश्वरथ नदी के दो पाट थे आर्य राजकुमार व संस्कृति के रक्षार्थ आर्य राजा सुदास ने ऋषि अगस्त के नेतृत्व मे असुरों पर आक्रमण कर दिया विश्वरथ से प्रेम के कारण दास राजकुमारी ने अपने पिता को पराजित करने मे सहयोग किया, पूरा दास राज्य पराजित हो आर्य साम्राज्य के रूप मे परिणित हुआ राजा शंबर के सभी 90 किले जीत लिया। 
         ऋषि विश्वामित्र उन्हे गायत्री मंत्र द्वारा शुद्धकर आर्य बनाना चाहते थे वहीं वशिष्ठ आर्य रक्त के शुद्धि के पक्षधर थे, लेकिन गोरे काले का भेद समाप्त नहीं हुआ वशिष्ठ जहां अनुवांशिक मे विस्वास करते थे वहीं विश्वरथ संस्कार मे विस्वास रखते थे सभी को आर्य बनाने मे विसवास था दोनों मे मत- भेद चरम पर था लेकिन अगस्त जो वशिष्ठ के बड़े भाई थे विश्वरथ से सहमत थे विश्वरथ को देव आज्ञा देवदर्शन और मंत्र दर्शन होने लगे उन्होने राजपाट छोड़ ऋषि बनकर वे विश्व के मित्र बने इस कारण वे विश्वामित्र हो गए 'कृंवंतों विश्वमर्यम' का उद्घोष किया, गायत्री मंत्र के दर्शन किए।और सभी आर्य हों यह कार्य विश्वामित्र ने शुरू किया वे गौरवर्ण आर्यों को ही नाही काले वर्ण के दासों को भी आर्य बनाने मे विस्वास, हमारे ऋषि- महर्षि प्रत्यक्ष युद्ध मे भाग लेकर राजाओ के प्रेरणा श्रोत बनते थे जब-तक हमारे ऋषि-महर्षि समाज व राज्य का नेतृत्व करते थे तब-तक भारत सुखी सम्पन्न था आर्यावर्त अखंड था जबसे हमारे संत- महंत केवल पुजा-पाठ और मोक्ष हेतु आध्यात्मिक हो गए भारत,भारत नहीं रहा, क्या हमारे संत ऋषि अगस्त व विश्वामित्र की भूमिका निभायेंगे-? आज वशिष्ठ की नहीं विश्वामित्र की अवस्यकता है जो सभी को अपनी संस्कृत मे समाहित कर ले, क्योकि शुद्धि का प्रथम मंत्र विश्वामित्र ने दिया सभी को आर्य बनाने मे उनका विस्वास था । 
           ऋषि अगस्त उत्तर से दक्षिण जोड़कर सभी को आर्य संस्कृति मे दीक्षित करना सभी को सुशिक्षित बनाना यानि सभी को श्रेष्ठ बनाना इसी लक्ष्य को लेकर दक्षिण गए पूरे देश को एक करने का प्रयास किया वे बिंध्याचल पार कर सुदूर दक्षिण समुद्र तक इस संस्कृति का विस्तार किया इसलिए कहा जाता है की सारे समुद्र का पानी वे पी गए थे जब वे दक्षिण जाने लगे तो बिंध्याचल पर्वत उन्हे लेटकर प्रणाम किया उन्होने आसिर्वाद दिया की जब-तक मै नहीं लौटता तुम ऐसे ही पड़े रहो तबसे बिंध्याचल पर्वत वैसे ही है।     

1 टिप्पणी

बेनामी ने कहा…

ऋषि अगस्त जहां वशिष्ठ के रक्त शुद्धि के समर्थक हैं वहीं वे विश्वामित्र के कृवंतों विश्वमार्यम को प्रोत्साहित करते हैं अवस्यकता है तो युद्ध कर राजा संबर को समाप्त करते हैं ।
जानकारी भरा वैदिक कथा उच्चकोटी की है ।