शुद्धी- घर वापसी और योद्धा सन्यासी स्वामी श्रद्धानंद -!

नास्तिक से आस्तिक

 ''स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती'' बचपन का नाम ''मुंशीराम'' था, अपने युग के महान संत थे विद्यार्थी जीवन में वे नास्तिक थे, उनके पिता कोतवाल थे इनकी नास्तिकता से बड़े ही चिंतित रहते थे बरेली में एक बार 'महर्षि दयानंद सरस्वती' का आगमन हुआ उनके पिता जी उन्हें आग्रहपूर्वक स्वामी जी के कार्यक्रम में ले गए, दयानंद जी का प्रवचन सुनने के पश्चात् उन्हें [मुंशीराम] लगा वेद, शास्त्रों के बिरुद्ध, विचार का कोई आधार नहीं है, सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर तो उनका (स्वामी जी का) पूरा जीवन ही बदल गया. वे महान क्रन्तिकारी संत स्वामी श्रद्धानंद हो गए, महर्षि दयानंद जी के उत्तराधिकारी होने के साथ-साथ उन्होंने गुरुकुल कांगड़ी तथा अनेक शिक्षण संस्थाओ को खड़ा किया आर्य समाज के कार्य को राष्ट्रीय स्वरुप देते हुए देश आज़ादी में हजारो नव जवानों को झोक दिया, आर्य समाज की प्रेरणा से श्यामजी कृष्ण वर्मा, लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, बिपिनचंद पाल, रामप्रसाद बिस्मिल, भगत सिंह जैसे क्रन्तिकारी तैयार हुए, उन्होंने अपने गुरु द्वारा शुरू किये गए मानवता के मिशन को दुनिया एक पवित्र रास्ते पर चले इस संकल्प को आगे बढाने का प्रयत्न किया, महात्मा गाँधी उनसे मिलने  हरिद्वार गुरुकुल में आये और कई बार उनके कार्यो की प्रसंसा करते, पहली बार श्रद्धानंद जी ने ही उन्हें महात्मा की उपाधि दी यानी महात्मा कहकर संबोधित किया तभी से गाधी जी को महात्मा गाधी कहा जाने लगा ।

और उनका बलिदान

धर्म, शिक्षा और आज़ादी उनका मिशन था दलितोत्थान, बिधवाओ का कल्याण और राष्ट्रीय चेतना की मशाल बन कर सामने आये उन्होंने अपने बिछुड़े हुए जो किन्ही कारन जोर-जबरदस्ती- बलात मुसलमान अथवा ईसाई बनाये गए थे उन्हें पुनः हिन्हू धर्म में वापस लाने का कार्य किया राजस्थान में एक लाख पच्चीस हज़ार मलकाना इस्लामिक राजपूतो की हिन्दू धर्म में वापसी तथा उत्तर प्रदेश के करीब ८९ गावो के हजारो लोगो को स्वधर्म में घर वापसी का क्रन्तिकारी कार्य किया इससे आक्रान्ता इस्लाम के अनुयायियो की धरती खिसकने लगी वे अपनी असलियत पर आकर बौखला गए, उन्होंने (स्वामी जी) राष्ट्र के मुख्यधारा को समझ कर ही ये परावर्तन का कार्य शुरू किया था इन्ही कारणों से उन्हें कांग्रेस छोड़नी पड़ी थी, राष्ट्रीय एकता को मजबूत करते हुए देश को आजाद कराने हेतु संघर्ष करते कई बार जेल भी गए, हम सभी को पता है ही कि प्रत्येक मुसलमान धर्मान्तरण को बढ़ावा देता है यानी इस्लाम का सर्वश्रेष्ठ कार्य समझता है, लेकिन जब श्रद्धानंद जी ने परावर्तन करना शुरू किया तो यह मुल्ला- मौलबियो को बर्दास्त नहीं हुआ, एक मुसलमान के द्वारा स्वामी जी की २३दिसम्बर १९२६ को चादनी चौक की 'रघुमल कोठी' में गोली मारकर हत्या कर दी, उस समय उनकी उम्र ७०साल की थी उस पर भी उन्होंने उदारता पूर्वक शांति की अपील की, दुर्भाग्य है कि महात्मा गाँधी ने उस हत्यारे को फांसी से बचाने की अपील की और कहा कि उसका अपराध नहीं उसकी मानसिकता का दोस है, जब कि इन्ही महात्मा गाधी ने भगत सिंह के बचाव में कोई अपील नहीं की थी, हमें इस दिन को भूलना नहीं चाहिए उस महान क्रन्तिकारी संत के बिछुड़े हुए कार्य को पूरा करना ही उनके प्रति श्रद्धांजलि होगी आइये हम सभी उनके आदर्शो पर चले जिससे उनकी आत्मा को शांति मिले ''महर्षि दयानंद'' द्वारा जलाया गया दीपक जिसे स्वामी जी ने प्रकाशित किया आज हमारा कार्य ही उनकी आत्मा को शांति प्रदान कर सकता है..।      

घर वापसी

 सनातन हिन्दू धर्म मे शुद्धि कोई नयी बात नहीं है ''कृंणवन्तो विश्वमार्यम'' सम्पूर्ण जगत को आर्य बनायेगे, वैदिक काल मे जब "शंभर राज" ने विश्वामित्र का अपहरण किया था "ऋषि अगस्त" ने युद्ध द्वारा "संभर राज" को पराजित कर "विश्वामित्र" को छुड़ा लिया विश्वामित्र ने उसी समय से समाज मे आई विकृति को समाप्त करने हेतु शुद्धि आंदोलन शुरू के परिणाम स्वरूप वे राज-पाट छोड़ सन्यासी हो गए, उन्होने केवल वनबासियों की शुद्धी ही नहीं तो "राजा हरिश्चंद्र" के यज्ञ मे "सुनःशेप" के अन्तर्मन मे प्रवेश कर वरुण मंत्र (ऋचा) उसके मुख से निकलवा उसे महान "मंत्रद्रष्टा" बना दिया।

आदि जगद्गुरु शंकराचार्य

भारत मे समाप्त होते हुए वैदिक धर्म को आदि जगद्गुरू शंकराचार्य शास्त्रार्थ कर पुनर्वैदिक धर्म (राष्ट्रधर्म) मे वापसी की, लेकिन यहाँ तलवार के बल नहीं बल्कि वाद-बिवाद को महत्व दिया जिससे भारत मे विचार को स्वतन्त्रता मिली जहां मनुष्य को परिपूर्ण मानव बनने का अवसर मिला इसी कारण जब विबेकानंद अमेरिका गए तो एक अमेरिकन सांसद ने 'विश्वधर्म सम्मेलन आयोजन समिति' के संयोजक से कहा ''सम्पूर्ण अमेरिका के विद्वानों को एक पलड़े पर दूसरे पर स्वामी विबेकानंद को रख दिया जाए तो भी भारतीय स्वामी का पलड़ा टस से मस नहीं होगा'' यानी जहां विश्व मे खोजने पर महापुरुष मिलते हैं वहीं भारत मे विचार की स्वतन्त्रता होने के कारण महापुरुषों की शृंखला खड़ी है ।

मध्यकाल में देवल ऋषि से स्वामी रामानंद

इस्लाम के उदय के पश्चात जहां विश्व के अनेक देश इस्लाम के शिकार हुए, जहां-जहां इस्लाम गया वहाँ की संस्कृत-सभ्यता समाप्त हो गयी, वहीं 1200 वर्षों की गुलामी के पश्चात भी हिन्दू समाज बचा ही नहीं रहा बल्कि संघर्ष कर अपने को स्थापित करने मे सफल रहा, मुहम्मदबिन कासिम का 712 इशवी सन मे सिंध पर हमला "महाराजा दहिर" की छल पूर्ण पराजय ! ये कोई केवल लुटेरे ही नहीं बल्कि तीन वर्ष के शासन मे 40000 हज़ार हिन्दू महिलाओं, बच्चों को अरब की बाज़ारों मे गुलाम बना बेचा-! मूलतन मे 6000 लोगो को मुसलमान बनाया, (अलबिलादुरी, फ़ुतूह-उल-बुल्डान पेज 120 ) हजारों हिन्दुओ का बलात तलवार के बल धर्मांतरण किया लेकिन उसके जाते ही अरब शक्ति का पतन सीघ्र हुआ, हिन्दू समाज की ताकतवर जातीय ब्यावस्था ने पुनः "शुद्धिकर" मतांतरित लोगो को हिन्दू समाज मे सामिल कर लिया, आक्रमणकारी आते रहे हिन्दू समाज इस्लाम का मानस समझ नहीं सका तलवार के बल मुसलमान बनाया जाता रहा हिन्दू समाज के रक्षक साधू- संत सामने आए वहीं सिंध मे "देवल ऋषि" ने "देवल स्मृति" लिख पुनः शुद्धि का रास्ता खोल दिया, कहा कि केवल तुलसी दल मुख मे डाल, गंगा स्नान मात्र से मनुष्य शुद्ध हो जाता है इस कारण सभी बिधर्मी हुए हिन्दू गंगा स्नान कर यदि वे चाहे तो बिहार, बंगाल अथवा कोकड़ चले जाय यानी वहीं बस जाय (देवल स्मृति)। फिर क्या था संतों कि शृंखला चल पड़ी कोई "रामानन्द स्वामी" होगे द्वादस भगवत शिष्यों द्वारा दक्षिण के भक्ति मार्ग को उत्तर भारत मे आंदोलित कर दिया अयोध्या मे "राज़ा हरीसिंह" के नेतृत्व मे 34 हज़ार राजपूतों की सुद्धी की।

घर वापसी कर उत्तर देना शुरू

मुस्लिम इतिहासकर मालावार तट पर बसे मुसलमानों की संख्या व उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाते हैं लेकिन हिंदुओं के उन प्रयत्नों को छुपा जाते हैं जिनमे हिन्दू नव धर्मांतरित मुसलमानों को पुनः हिन्दू बना लेते थे, "सुलेमान सौदागर" नवी शताब्दी मे भारत आया वह लिखता है, ''मुझे पश्चिमी तट पर कोई मुसलमान अथवा अरब नहीं मिला, (सुलेमान सौदागर द्वारा लिखित लेख का अनुवाद महेश प्रसाद पेश्त 84) ''1030 ई॰ मे महमूद गजनवी की मृत्यु और (1191-92ई॰) मुहम्मद गोरी के आक्रमण के मध्य लगभग 150 वर्ष के काल खंड मे पुनः धर्मांतरण के बहुत से अवसर आए जिसमे बड़ी संख्या मे पुनः धर्मांतरण हुआ अर्थात मुसलमान से हिन्दू बनाए गए'' आदिब, पेज 337 पर लिखता है सिंध मे राजपूत कभी हिन्दू सा मुसलमान बना लिए जाते थे पुनः वे सब हिन्दू हो जाते थे, अशरफ अपनी 'लाइफ एण्ड कंडीशन आफ द पीपिल आफ हिन्दुस्तान' मे पेज 195 पर लिखते हैं, ''उच्च वर्ग के धर्मांतरित हिन्दू कभी-कभी वापस हिन्दू हो जाते थे और अपने पूर्व स्तर को प्राप्त कर लेते थे''।      

सर्वश्रेष्ठ सनातन संस्कृति

एक पागल इस्लामी शासक "मुहम्मद तुगलग" ने देखा कि सैकड़ों वर्ष तक इस्लामिक शासन होने व बलात इस्लामिकरण के बावजूद मुसलमानों की संख्या बढ़ती क्यों नहीं ? पता लगा कि जिन हिंदुओं को वे मुसलमान बनाते हैं उन्हे हिन्दू समाज की जातीय ब्यवस्था, पंचायत तथा साधू-संत मिलकर पुनः शुद्धि कर हिन्दू धर्म मे सामिल कर लेते हैं, मु॰ तुगलक ने एक फरमान जारी किया कि कोई भी हिन्दू -मुसलमान तो बन सकता है लेकिन कोई भी मुसलमान -हिन्दू नहीं बन सकता, बनने और बनाने वाले दोनों को फांसी की सजा होगी, उसके पश्चात मुगल 'शाहजहाँ' ने फरमान जारी किया कोई भी मुसलमान बनता है तो उसे सजाये मौत होगी समाज भय-भीत होने लगा, उसी समय से मुसलमानों का हिन्दू बनाना बंद हो गया, लेकिन साधू-संत सतर्क थे उन्होने मुसलमानों को "मलेक्ष" व "अछूत" घोषित किया कोई भी हिन्दू उनके यहाँ पानी -पीना तो दूर मुसलमानों का छुवा भी पानी नहीं पीना, कितना उत्कृष्ट समाज "मुगलों" के यहाँ नौकरी तो करता था पर घर से खाना खाकर जाना लौट कर घरपर ही भोजन करना, अपना ही पानी -पीना ऐसा पराजित समाज (हिन्दू) जो अपने को श्रेष्ठ समझता रहा आज भी वह श्रेष्ठ है ऐसा हमारा हिन्दू मानस हमारे संतों ने बनाया, "अलवेरूनी" पेज 22 पर लिखता है ''हिन्दू ऐसा विस्वास रखता है विश्व मे "भारत" जैसा महान कोई देश नहीं, उनके जैसा राष्ट्र नहीं, "सनातन धर्म" जैसा श्रेष्ठधर्म कोई धर्म नहीं, उनके जैसा ज्ञान-विज्ञान दुनिया मे कहीं नहीं, यहाँ के जैसे राजा, महाराजा और चक्रवर्ती सम्राट, ऋषियों महर्षियों द्वारा निर्मित "वैदिक संस्कृति" विश्व मे कहीं नहीं हैं ऐसे लोगो का धर्मांतरण आसान नहीं है''।  

हिन्द की चादर

 मुगल काल मे काशी का कोई मंदिर नहीं बचा जिसे तोड़ा नहीं गया हो "अयोध्या, मथुरा और काशी" जो हिन्दू समाज के श्रद्धा के केंद्र थे उन्हे समाप्त करने का प्रयास किया गया "काशी विश्वनाथ मंदिर" के शिवलिंग को जब तोड़ने औरंगजेब की सेना पाहुची वहाँ के पुजारियों ने उसे बचाने के लिए शिवलिंग लेकर भागे मुगल सैनिक ने एक को तलवार के काटा तो दूसरे ने ले लिया दूसरा काटा गया तो तीसरे ने ले लिया इस प्रकार हिन्दू समाज हुत्तात्मा बन अपने देवी-देवताओं के मूर्तियों की रक्षा कारता रहा, क्या हम उस बलिदान को भुला सकते हैं ! एक हाथ मे कुरान दूसरे मे तलवार लेकर हिंदुओं का बलात धर्मांतरण किया, आज के छः सौ वर्ष पूर्व कश्मीर घाटी मे केवल हिन्दू थे तलवार के बल मुगलों ने उनका धर्मांतरण किया "गुरु तेगबहादुर" का बलिदान इसका साक्षी है वे हिन्दू समाज के धर्म रक्षक थे उन्हे आज सम्पूर्ण समाज 'हिन्द की चादर' के नाम से जनता है।

स्वामी श्रद्धानंद का सुद्धि आंदोलन

 ब्रिटिश काल मे यदि यह कहा जाय कि 1200 वर्ष वाद भारत की आज़ादी का अकेला श्रेय दिया जाय तो वे केवल और केवल "महर्षि दयानन्द सरस्वती" ही होगे, "स्वामी दयानन्द सरस्वती" ने अपने ही जीवन काल मे राजस्थान के "व्यावर क्षेत्र" मे प्रथम "सुद्धी" कि थी बस क्या था अब तो सुद्धी का रास्ता खुल ही गया "स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती" ने तो मानो "शुद्धी आंदोलन" ही खड़ा कर दिया उन्होने "आर्य समाज" द्वारा "सुद्धी सभा" का गठन किया, केवल 'उत्तर प्रदेश' मे मेरठ से लेकर गाजियावाद तक उन्होने 111 गावों के मुसलमानों की सुद्धीकी स्वामी जी उन्हे उनके पूर्वजों की गौरवपूर्ण गाथा सुना धर्म की श्रेष्ठता बता सबको सुद्ध कर लेते थे, स्वामीजी ने राजस्थान के "मलकाना राजपूत" जो मुसलमान हुआ था 'इकट्ठे डेढ़ लाख मलकाना मुस्लिम राजपूतों की शुद्धी कर वैदिक धर्म की दीक्षा दी', इसी कारण 23 दिसंबर 1926 को मुहम्मद रसीद नाम के मुसलमान ने बीमार और चारपाई पर पड़े स्वामी जी को गोली मारकर हत्या कर दी, गुरु घासीदास, दादू, संतजीवन दास, बाबा रामदेव जैसे बहुत सारे संतों ने ब्रिटिश काल मे धर्मांतरित समाज को पुनः हिन्दू समाज मे मिला लिया।

आजादी के बाद जागृत हुआ हिन्दू

 देश आज़ादी के पश्चात हमारे समाज के बड़े लोगो ने एक बार फिर अपने बिछड़े हुए समाज को पुनः हिन्दू समाज मे सामील करने का प्रयास किया 1950 का दसक राजस्थान के महाराणा, महाराजा जोधपुर, राजा सिरोही तथा अन्य राजाओं के साथ बैठक कर जो सम्राट पृथ्बिराज चौहान की सेना के लोगों को बलात मुसलमान बनाया गया था उन्हे वापस लाया जाय हजारों राजपूत और पठान इकट्ठा हुए संयोग से महाराजा जोधपुर का निधन हो जाने के कारण शुद्धी नहीं हो सकी, इसी प्रकार गुजरात मे "नरेंद्र सिंह" (तत्कालीन कृषि मंत्री) उ प्र मे राजा सिंगारामवू श्रीपाल सिंह, अमेठी के "राजा रणञ्जय सिंह" ने एक बैठक की जिसमे मुसलिम और हिन्दू राजपूत इकट्ठा हुए रोटी-बेटी को लेकर बात नहीं बनी, बिहार के अरवल जिला के पीरु-बन्तारा के भूमिहार लोग मुसलमान हुआ रामानुज परंपरा के "संत बसुदेवाचार्य" के नेतृत्व मे प्रयास हुआ प॰ चंपारण मे गद्दी मुसलमान जो 'अहीर' जाती से है पचास के दसक मे उनके वापसी का प्रयास हुआ यानी हिन्दू समाज का मानस हमेसा बिछड़े हुए बंधुओ को वापस लाने का था, लेकिन दुर्भाग्य बस नेहरू की सेकुलर नीति जो हिन्दू समाज के लिए आत्मघाती सिद्धि हुई।

स्वामी श्रद्धानंद की विरासत धर्मजागरण

घर वापसी के लिए धर्म जागरण ने कोई नया काम नहीं शुरू किया आदि जगद्गुरू शंकरचार्य, रामानुजाचार्य, स्वामी रामानन्द, स्वामी दयानन्द सरस्वती, स्वामी विबेकानंद और स्वामी श्रद्धानंद जैसे महापुरुषों की विराशत स्वीकार कर मानव धर्म और राष्ट्र रक्षा हेतु घर वापसी हमारा कर्तब्य---! हमारे पूर्वज जो बिछुड़ गए किन्हीं कारणो से बिधर्मी हो गए उन्हे अपने पूर्वजों का स्मरण कर घरवापसी करके अपने कर्तब्य का निर्वहन करना मात्र है सेकुलर के नामपर ईसाई और इस्लामी ताकतों को धर्मांतरण करने को अनदेखी करना और हिन्दू धर्म छोड़ने वाले लोग या उनकी संतति फिर से अपने मूल धर्म मे वापस आए तो बवाल मचाना यह सेकुलरों द्वारा देशद्रोही कृत्य के अतिरिक्त कुछ भी नहीं ।