सत्यकाम जाबाल

 

ये कथा वैदिक अथवा ---?

सत्यकाम जाबाल के बारे में जानना हो तो हमें छाँदोग्योउपनिषद के चौथे अध्याय के चौथे खंड का अध्ययन करना पड़ेगा, हलाकि उसके दार्शनिक विचारों का विवेचन इसी अध्याय के अगले खंड में भी है। सत्यकाम जाबाल गुरुकुल जाने लायक हुआ तो उसको महर्षि गौतम के यहाँ जाकर पढ़ने की इक्षा हुई. वहाँ जाने पर ऋषि पूछेंगे कि तुम्हारा गोत्र क्या है? तो मैं क्या उत्तर दूंगा? सत्यकाम अपनी माँ के पास गया और पूछा, "सत्यकामोह जबालो जबलां मातरमामत्रयाँचके ब्रम्हश्चर्य भवति विवत्स्यामि, कि गोत्रोहमस्मिति?" माँ मैं गुरु के पास जाकर ब्राम्हचारी के रूप मैं रहना चाहता हूँ बताओ मेरा गोत्र क्या है ?
सत्यकाम जाबाल की कथा वैदिक कालीन बताई जाती है, कुछ भाष्यकार महाभारत के पाश्चात्य मानते हैं, कुछ तो उपनिषद कालीन भी बताते हैं। लेकिन यदि वैदिक कालीन हैं तो उस समय तो "चतुर्वेरणम् मयासृष्ठा गुण कर्म विभाग :" तो ये भेद-भाव संभव नहीं! यदि महाभारत कालीन माना जाय तो उस समय वेदव्यास के जन्म को छिपाया नहीं गया कि वे परासर ऋषि और सत्यवती थे, इतना ही नहीं कुंती के विवाह के पहले कर्ण नामक जो पुत्र पैदा हुआ उसे सूर्य पुत्र माना गया। विवाह के बाद उनके तीनो पुत्र युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन क्रमशः धर्मराज, वायुदे, इंद्र के पुत्र माने गए और माद्री के दोनों पुत्र नकुल, सहदेव अश्वनी कुमारों के आशीर्वाद माने गए। इन संतानो के बारे में सभी को पता है इसलिए यह घटना भी उस काल की नहीं हो सकती। और ये वैदिक ऋषि है तो यह भी हो सकता है कि गौतम ऋषि वंश, पीठ की परंपरा से सम्वन्धित हो, कुछ भी हो सकता है। लेकिन यह कथा सत्य की विजय तथा कुरीतियों के खंडन पर आधारित है और ऋषि यह कहते हैं कि यह स्पष्ट सत्य बोलना तो ब्राह्मण ही है और गुरुकुल में प्रवेश दे देते हैं। और यह घटना वैदिक काल की ओर लौटने का आह्वान करती है, जहां जिस काल में कोई भेद-भाव नहीं था, कोई ऊंचा-नीचा नहीं था, सभी को समान दृष्टि से देखा जाता था।

सत्यकाम जाबाल 

सत्यकाम जाबाल गौतम ऋषि के शिष्य थे, उनकी माता का नाम जाबाला था, जिनकी कथा "छाँदोग्या उपनिषद" में है। सत्यकाम जब गुरु के यहाँ गये तो नियमानुसार ऋषि ने उनसे उनका गोत्र पूछा। सत्यकाम ने ऋषि गौतम से कहा कि मुझे अपने की जानकारी नहीं है, मेरी माँ का नाम जाबाला है और मेरा नाम सत्यकाम है। मेरी माँ अविवाहित थी, और घर में नित्य अतिथियों के आधिक्या से माँ को बहुत काम "सेवा" करना पड़ता था। जिससे उन्हें अपने पिता के गोत्र के बारे में कुछ नहीं पता। गौतम ऋषि ने इस बालक की सत्य बात से प्रभावित होकर उसे ब्राह्मण स्वीकार कर लिया और कहा इतना सत्य तों केवल ब्राह्मण बालक ही बोल सकता है, इसलिये ऋषि ने उसे ऋषि ने अपना शिष्य स्वीकार कर लिया ।

सत्यकाम जाबाल वैदिक काल के एक महान ब्रम्हाज्ञानी ऋषि थे जिनका उल्लेख छाँदोग्य उपनिषद में मिलता है उनकी कथा सत्य और धर्म का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। ऋषि ने उस बालक की परीक्षा हेतु 400 कमजोर गाये सौंपी और कहा जब ये एक हजार हो जायँ तब आश्रम पर लौटना। सत्यकाम ने निष्ठा पूर्वक गायों की सेवा की जंगल में उनके सत्य मार्ग से प्रसन्न होकर प्रकृति ने उन्हें स्वयं ब्राम्हज्ञान का उपदेश दिया। जब वे एक हजार गायों के साथ लौटे तो उनके चेहरे पर अद्भुत तेज दिखाई दे रहा था। ऋषि गौतम ने उनकी सत्यप्रियता और ज्ञान देखकर उन्हें आश्रम के गुरुकुल का आचार्य नियुक्त कर दिया।

सत्य का संघर्ष 

हिंदू सनातन धर्म नित्य नूतन हमेसा के लिए रहता है इसमें कोई एक किताब नहीं समाज सुधार की पुरानी परंपरा कायम है। इसलिए किसी दुर्गुण की संभावना न के बराबर रहती है यही वैदिक सनातन धर्म की विशेषता है। अब सत्यकाम आश्रम में प्रवेश के लिए गया था की जब सभी विद्यार्थियों की परीक्षा शुरू हुई तो उसमें एक आचार्य कुल, गोत्र और परंपरा की बात करने लगे। सत्यकाम तों सत्य का ही आधार लिये हुए था उसनें अपनी माँ से सत्य बोलना ही सीखा था उसकी माँ जाबाला कहती थी सत्य परेशान हो सकता है लेकिन सत्य कभी पराजित नहीं हो सकता। आचार्य ने गंभीर आवाज में कहा "माननीय बुजुर्गो" आज हम केवल यज्ञ करने नहीं बल्कि अपने वंश और रीति रिवाजों की परंपरा की रक्षा करने के लिए इकठ्ठा हुए हैं। यह बालक सत्यकाम महर्षि गौतम के चरणों में शिक्षा ग्रहण करने की इक्षा रखता है, लेकिन हमारे सामने एक बिचलित करने वाली समस्या है, इसके पिता का कोई पता नहीं है। क्या हम धर्म के संरक्षक होकर एक ऐसे बालक को अपने गुरुकुल में प्रबस दे सकते हैं जिसका जन्म एक ज्ञात ब्राह्मण पिता के पवित्र मिलन से बाहर हो ?

इसके पश्चात् एक दूसरे आचार्य ने गंभीर स्वर में बोला, वे बुद्धिमान थे और अपने ज्ञान को व्यावहारिक धरातल पर प्रकट किया करते थे, उन्होंने संतुलित स्वर में कहा, हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि सच्चा ज्ञान पर प्रत्येक उस बालक का जन्मसिद्ध अधिकार होना चाहिए जो निष्कपट है। वेद स्वयं उस पवित्रता का गान करते हैं जो जन्म के संयोग से नहीं बल्कि मन और आत्मा के परिस्कार से उत्पन्न होती है। यदि बालक का ह्रदय खुला है और उसका चरित्र सत्य में निहित हो तो क्या हमें उसके जन्म की परिस्थितियों से ऊपर उठने का अवसर नहीं देना चाहिए ? 

महर्षि गौतम की वैदिक आवाज गूंजी 

फिर इस तर्क -वितर्क के बीच महर्षि गौतम की आवाज शांत लेकिन दृढ़ स्वर में गुंजी, मैं आपसे विनती करता हूँ, केवल कानो से नहीं, बल्कि ह्रदय और उस ज्ञान से सुने जो सच्ची अंतरदृष्टि से आता है। क्या. ब्राह्मणत्व जन्म के संयोग से स्थापित होता है ? या सत्य और धार्मिकता के आत्मशातिकरण से ? इस बालक ने अपनी उत्पत्ति के बारे मे बिना किसी हिचकिचाहट या छल के निर्भीक ईमानदारी से बताया है। यही उसका ब्राह्मणत्व है, एक अज्ञात पिता की छाया मे नहीं, बल्कि उसके अडिग सत्य के प्रकाश में। ऋषि गौतम ने आगे कहा, वेद हमें सिखाते हैं कि सत्य ही सर्वोच्च धर्म है, जो जन्म और अनुष्ठान से परे है। यदि हम उसके जन्म के कारण रोकते हैं तो क्या हम उसके ज्ञान के सार के साथ विश्वासघात नहीं कर रहे हैं जिसे हम सुरक्षित रखना चाहते हैं ? मैं घोषणा करता हूँ कि सत्यकाम हम सबमे से किसी भी जनेऊ धारी ब्राह्मण से कम नहीं है, उसका स्थान हमारे बीच है बाहर नहीं ¡

और अंत मैं जाबाला स्वयं खड़ी हुई, उसकी गरिमा ने सभा को मौन कर दिया, मैं आप सभी को याद रखने के लिए कहती हूँ बच्चे की उत्पत्ति रक्त से नहीं, बल्कि सत्य से होती है। मैंने अस्वीकार करने का दंश झेला है, लेकिन आज मैं यहाँ एक ऐसी माँ के रूप में खड़ी हूँ जो सुविधा से ऊपर सत्य को सम्मान देती है। मेरा बेटा न केवल मेरे शरीर का बल्कि मेरी सत्यनिष्ठा और साहस का उत्तराधिकारी है। जाबाला के शब्दों ने सभी के ऊपर जादुई प्रभाव डाला, कठोर चेहरे नरम होने लगे। एक लम्बे सन्नाटे के बाद महर्षि गौतम ने अपना निर्णय सुनाया, "सत्यकाम गुरुकुल में प्रवेश करेगा किसी की कृपा के कारण नहीं बल्कि अपनी योग्यता, अपने सत्य और समर्पण की योग्यता के कारण।" सत्यकाम ने अपनी माँ के सत्य की आवाज सुनी और उसे ह्रदय में महसूस किया, उसके भीतर एक नई समझ विकसित हुई, सत्य का उत्तराधिकारी होने का अर्थ है बहुदारी से चलना, भले ही लोग विरोध करें। इस प्रकार एक मौन क्रांति की शुरुआत हुई, तलवार व क्रोध से नहीं बल्कि साहस, ईमानदारी और माँ के अटूट प्रेम से, जाबाला पुत्र सत्यकाम ने उन प्राचीन सभाओं में पहचान और सत्य के अर्थ को फिर महर्षि मनु और वैदिक परंपराओं की ओर पुनः ला कर खड़ा कर दिया। 

और आश्रम में प्रवेश 

सत्यकाम ने एक बार फिर ऋषि की आँखों में देखा और ईमानदारी से बोला, मेरी माँ जाबाला मेरे पिता का नाम नहीं जानती, मेरे पास बताने के लिए कोई ज्ञात वंश नहीं है। गौतम ऋषि शांत स्वाभाव बनाए रखे उनकी आँखे सामाजिक रूढ़ियों से परे एक प्रज्ञा को प्रतिविम्बित कर रही थीं। गौतम ऋषि ने एक बार फिर शांत स्वाभाव से बोले तुम्हें स्वीकार किया जाता है क्योंकि  सत्य की लौ ही ब्राह्मण की सच्ची पहचान है। तुम उस मार्ग पर चलोगे जो तुम्हारे पूर्वजों द्वारा नहीं बल्कि तुम्हारे अपने ह्रदय के साहस और बुद्धि की स्पष्टता द्वारा बनाया गया है।

महर्षि गौतम ने सत्यकाम को गले लगाते हुए कहा "तुम यहाँ एक अनिश्चित कुल के बालक के रूप मे नहीं बल्कि सत्य के बालक के रूप में स्वीकार किये जाते हो।" यह स्वीकारोक्ति केवल सत्यकाम की जीत नहीं थी बल्कि  रूढ़िवादी विचारधारा पर 'नैतिक आदर्श' वैदिक परंपरा की जीत थी। हमारे शास्त्र कहते हैं कि ब्राह्मण का पैमाना केवल जन्म से नहीं, बल्कि उसका आचरण, सत्यवादिता और बोध है। हमें न्याय की बलि देकर परंपरा का अंधा रक्षक नहीं बनाना चाहिए।


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