जाग रे नचिकेता जाग --!

 जाग रे नचिकेता जाग 

कठोपनिषद में जो आख्यान है वह नचिकेता के माध्यम से विद्या के लिए है ज्ञान के लिए है, नचिकेता के बारे में जानने के लिए उनके पिता के माध्यम से भी विचारणीय है वे वाजश्रवा यानी वाज यानी अन्न और अन्न दान करने वाला यानी वाजश्रवा, उन्होंने सब कुछ दान कर डाला कहते है उनके एक पुत्र था जिसका नाम नचिकेता था। वाजश्रावा दान करते -करते सब कुछ दान दे दिया उसमें अंत में बूढी गायों को भी दान करने लगे। यह मेधावी नचिकेता को पिता के इस दान से लगा कि इससे तो पिता जी को यश न मिलकर पाप के भागी होंगे।इस प्रकार यज्ञ की पूर्णाहुति न होने के कारण पिता को प्राप्त होने वाला अनिष्ट फल मुझे जैसे पुत्र को आत्मबालिदान करके भी पिता को निवृत होना चाहिए। ऐसा मानकर नचिकेता पिता जी के समीप जाकर बोला हे पिता जी! आप हमें किसे दान कर रहे हैं -? इस प्रकार कहने पर ऋषि ने उसकी बात की उपेक्षा करते रहे। जब नचिकेता ने तीसरी बार यह बात दुहराई तो उसके पिता ऋषि झल्लाकर बोला जा मैं तुझे सूर्य पुत्र मृत्यु को दान करता हूँ।अब ऋषि बहुत दुखी हो विचार करने लगे कि यह मैंने क्या किया शोकाकुल हो गये और खेद पूर्वक कहा।अरे यह मैंने क्या किया -? लेकिन नचिकेता तो नचिकेता था वह पिता के वचन को खाली कैसे जाने दे सकता था उसनें पिता से कहा अब आप अपने वचन का पालन कीजिये अर्थात मुझे यमराज के पास भेजिए।

इस प्रकार पिता ने सत्यता की रक्षा के लिए नचिकेता यमराज के पास गया 

कठोपनिषद के अनुसार नचिकेता वाजश्रवा अथवा उद्दालक ऋषि के पुत्र थे। कठोपनिषद यह भी कहता है कि नचिकेता के पिता उद्दालक के पुत्र श्वेतकेतु थे इस हिसाब से उद्दालक ही श्वेतकेतु थे। ऐसा लगता है कि श्वेतकेतु और श्वेतकुतु भाई -भाई थे।ऐसा लगता है कि नचिकेता इसी वंश के थे लेकिन इसको लेकर विभिन्न प्रकार की भ्रान्तियाँ हैं उसमें हमें पड़ने की आवस्यकता नहीं है।

तीन रात्री भूखा प्यासा 

वह यमराज के घर पहुंचकर तीन रात्रि टीका रहा, क्योंकि यमराज उस समय बाहर गये हुए थे, प्रवास से लौटने पर अपनी भार्या और मंत्रियों से कहा, ब्राह्मण अतिथि के रूप मे साक्षात् वैश्वानर --अग्नि सा के समान दग्ध करता हुआ घरों में प्रवेश करता है। जिसके घर ब्राह्मण बिना भोजन के रहता है उस मँदमति पुरुष के आशा प्रतीक्षा जिसका कोई ज्ञान नहीं होता ऐसा माना जाता है। अब यमराज बोले, हे ब्राम्हण बालक अतिथि और नमस्कार करने योग्य तीन रात्रि तक बिना कुछ खाये मेरे घर में रहे हो अतः मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। मेरे घर पर बिना कुछ खाये अपने निवास किया है, अतः तुम मुझसे तीन वर मागने के अधिकारी हो गये हो। अपने अभिष्ट पदार्थ मांग लों ऐसा लगता है कि नचिकेता के सन्दर्भ मैं मृत्यु के देवता को कुछ गलत फहमी रही होगी वे किससे पाला पड़ रहा समझ नहीं पाये।

पहला वर 

हे मृत्यु -! जिससे मेरे पिता वाजश्रावा मेरे प्रति शांति संकल्प कि उनका मन मेरे प्रति शांत हो गया हो क्रोधरहित हों।यह अपने पिता की प्रसन्नता रूप प्रयोजन ही मैं आपसे तीनों वरो मैं पहला वर मांगता हूँ।

हे मृत्यु! क्योंकि आप ऐसे गुण वाले स्वर्गलोक की साधन भूमि अग्नि का चयन करने से स्वर्ग प्राप्त पुरुष अर्थात स्वर्ग ही जिसका लोक है ऐसे यजमान गण अमरता अर्थात देवभाव को प्राप्त हो जाते हैं इस अग्नि विज्ञान को मैं दूसरे वर के रूप में मांगता हूँ। यमराज बोले हे नचिकेता जिसके लिए तुमने प्रार्थना की है उस स्वर्ग प्राप्ति में स्वर्ग के साधन के रूप में अग्नि को तू एकाग्रचित होकर मेरे वचन से अच्छी तरह समझ ले उसे सम्यक प्रकार से जानने वाला उसका विशेषज्ञ मैं तेरे प्रति उसका वर्णन करता हूँ '' तू उसे समझ ले ये वाक्य शिष्य के बुद्धि को समाहित करने के लिए है। मेरे द्वारा कहें हुए उस इस अग्नि को बुद्धिमान पुरुषों की स्थित जान। 

अपने शिष्य की योग्यता देखकर प्रसन्न हुए यमराज प्रीति का अनुभव करते हुए नचिकेता से कहा ''अब मैं प्रसन्नता के कारण तुझे फिर से चौथा वर और देता हूँ, मेरे द्वारा कहा हुआ यह अग्नि तुझे नचिकेता के नाम से प्रसिद्ध होगा इसे स्वीकार कर अथवा कर्ममयी आनंदिता गति ग्रहण कर। तात्पर्य यह है कि इसके शिवा अनेक फाल का कारण होने से तू मुझसे कर्म विज्ञान को और भी स्वीकार कर।


नचिकेता ने यमराज को विवस कर दिया
 

अब नचिकेता ने मृत्यु देव को तीसरा वर देने के लिए विवेश कर दिया, हे नचिकेता,'' नचिकेता को ब्राम्हज्ञान यानी आत्मज्ञान प्रदान किया फिर नचिकेता ने उसी से प्रश्न निकाला, वह आत्मज्ञान क्या है? बताने की आवस्यकता तो वैसे नहीं थी पर जितनी जरुरत है उसे थोड़ा नये सन्दर्भ के साथ क्या कोई यमराज के महल तक जा सकता है? यमराज से किसी का संवाद हो सकता है ¡ एक तरफ नचिकेता मृत्यु को जितने के लिए मृत्यु के दरवाजे पर पहुंच जाते हैं, मृत्यु को जीतना है तो उसके आने का इंतजार नहीं किया जा सकता आपको अपने ही प्रयासों से उस पर हावी होना पड़ेगा और नचिकेता उसी के घर में जाकर जीता और जो तीन वर मांगे उसमें सबसे महत्वपूर्ण तीसरा वर था जिसे उन्होंने आत्मज्ञान के रूप में प्राप्त किया। इसका अर्थ यहीं है कि उन्हें आत्मज्ञान को जानना था उस परम सत्य को पहचानना था, तो पहले मृत्यु पर विजय प्राप्त करो, यानी उसे महत्वहीन मानो।

कठोउपनिषद का यह आख्यान नचिकेता को माध्यम बना भारतीय चेतना को जगाने का साधन है इसलिए उपनिषद ने भारतीय नचिकेता को जगाने का आह्वान किया है..।।

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