शबर राजा की पुत्री - राजकुमारी शबरी
सबरी के बारे में बहुत सारी भ्रान्तियाँ है कुछ मान्यता है कि सबरी भील जनजाति समुदाय की राजकुमारी थी। कुछ मान्यता ऐसी है कि सबर जनजाति जहाँ आज भी उस समुदाय में राजा है, ठीक है उनकी संख्या लगभग विलुप्त प्राय हो गई है उसके संरक्षण की आवस्यकता है। सबरी सबर जनजाति की राजकुमारी थी। यह जनजाति पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और कुछ बहुत कम संख्या में झारखण्ड में पायी जाती है। इन्हे कुछ पता नहीं है कि सबरी माता इन्हीं समुदाय की थी वैसे कोई महारुष किसी जाती का नहीं होता वह तो जातियों से ऊपर उठ चूका होता है। वह तो सनातन धर्म की धरोहर होता है जिस पर सारा समाज गर्व करता है। राजकुमारी सबरी का स्थान रामभक्तों में प्रमुख रूप से लिया जाता है, राजकुमारी सबरी बहुत खूब सूरत थीं। उनके पिताजी एक नगर के राजा थे राजकुमारी सबरी के लिए नगर की बालाएं प्रति दिन पुष्प चुनकर लाती थीं उनका राज्य में सभी बड़ा आदर करते थे। वनवास के समय राम -लक्ष्मण सबरी के आतिथ्य को स्वीकार किया था। और उनके द्वारा दिए हुए कन्दमूल फल प्रेम से स्वीकार किया था। भगवान ने सबरी से खुश होकर उन्हें "नवधा भक्ति" योग सिखाया और स्वर्ग की कामना किया।
गुरु के प्रति अटूट विस्वास
राजकुमारी सबरी का विवाह तयः हो गया, वह दिन भी निकट आ गया सबरी बचपन से ही अजीव सा आध्यात्मिक बातें करती रहती थी। उसे अपने विवाह में कोई रूचि नहीं थी वह तो आत्मा को जानना चाहती थी उसने विवाह मंडप से भागकर अपने गुरु के आश्रम में पहुंच गई। लाख समझाने के पश्चात् भी मानी नहीं अपने गुरु मतंग के आश्रम में रहने लगी। सबरी अपने गुरु मतंग ऋषि की निष्ठा पूर्वक सेवा करती रही। अपने गुरु पर उसे अटूट विश्वास था मतंग ऋषि बूढ़े हो चले थे वह दिन निकट आ गया जब उन्हें गोलोकवासी होना था। वे जानते थे कि कहीं ऐसा न हो कि सबरी भी समाधि ले-ले इसलिए उन्होंने उससे कहा तुम इसी आश्रम में रहोगी, उन्होंने सबरी को आशीर्वाद दिया प्रभु राम तुमसे मिलने इस कुटिया में आएंगे। इसी विश्वास के साथ सबरी ने सारा जीवन प्रभु की प्रतीक्षा में बिता दिया। नित्य दिन जंगल से फूल लाती इन्हीं फूलों से इस आश्रम को सजाना यहीं आश्रम में प्रभु श्री राम आएंगे और तुम्हें मुक्ति का मार्ग बताएंगे। अब सबरी का गुरु पर इतना विस्वास था कि वह जानती थी कि भगवान एक न एक दिन अवश्य ही आश्रम में पधारेंगे फिर क्या था वह नित्य प्रति फूल बिछाती और भगवान का इंतजार करती। यह क्रम वर्षो चला अब सबरी बूढी हो चली लेकिन अपने गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा व विस्वास वना रहा। और भगवान की प्रतीक्षा करती रही।
शबरी कौन थी-?
चुकि ये सबरी की कथा त्रेता युग की होने के कारण भ्रान्तियाँ होना स्वाभाविक है। सबरी भील जाति के एक कबीले के राजा की पुत्री थी जिसका नाम अज था पहले सबरी का नाम श्रमडा था इनकी माँ का नाम इंदुमती था। शबरी, शबर जनजाति की राजकुमारी थी ये हो सकता है कि "शबर जनजाति" भील जनजाति की कोई उपजाति रही हो। शबरी वचपन से ही पक्षियों से अद्भुत बातें किया करती थी जो सभी लोगों के लिए आश्चर्यजनक बातें थी, धीरे धीरे सबरी बड़ी हो गई लेकिन उसकी कुछ हरकते उसके माता -पिताजी के लिए आश्चर्यजनक व समझ से परे थीं। समय रहते उसके माता पिताजी ने किसी पुरोहित से उसके बारे में पूछा कि वह वैराग्य की बातें करती रहती है उस ब्राह्मण ने सलाह दिया की समय रहते उसका विवाह करदो।सबरी की माँ ने विवाह के लिए एक बाड़े में कुछ पशु -पक्षियों को इकठ्ठा कर दिए थे, जब सबरी की माँ ने सबरी के बाल काट रही थीं सबरी ने माँ से पूछा कि बाड़े में इतने सारे पशु-पक्षी क्यों इकठ्ठा किये गए हैं माँ ने उस समय बताया की तुम्हारे विवाह में इन्हे भोज दिया जायेगा। शबरी को यह बात न गवार गुजारी और उसनें विवाह करने से मना कर दिया और रात्री में उसनें सारे पशु- पक्षियों को बाडा खोलकर आज़ाद कर दिया। शबरी वहाँ से भाग निकली, भागते भागते वह श्रीमुख पर्वत पहुंच गई जहाँ दस हजार ऋषि रहते थे।
भगवान श्रीराम का आश्रम में आगमन
शबरी अपने गुरु मतंग की निष्ठा पूर्वक सेवा करती रही, जब गुरु के महाप्रयाण का समय आया तो उन्होंने शबरी को आशीर्वाद कि प्रभु स्वयं इस कुटिया में तुम्हारे पास आएंगे। इस विश्वास के सहारे सारा जीवन उसने उस आश्रम में बिता दिया। वह प्रत्येक दिन जंगल से फूल चुनकर लाती और रास्ते में बिछाती थी। आते जाते लोगों को मना करती कि इस फूल पर भगवान चलेंगे और सीता जी की खोज में भटकते हुए जब श्रीराम और लक्ष्मण दण्डकारन्य से गुजरे तो शबरी की कुटिया पर पहुंचे। शबरी अपने आराध्य को देखकर भावबिभोर हो गयी इस प्रकार एक दिन यह इंतजार समाप्त हुआ और उनको भगवान श्रीराम उसी आश्रम में मिले। बहुत सारे कथानको में यह किब्दन्ति है कि शबरी ने अपने झूठे बेर भगवान को खिलाये लेकिन मै इसे स्वीकार नहीं करता।

0 टिप्पणियाँ