सामाजिक समरसता के प्रतीक आदि जगदगुरु बल्लभाचार्य----.


शनिवार, 4 मई 2013

             वल्लभाचार्य का जन्म चंपारण में वैशाख कृष्णा एकादशी विक्रम सम्बत 1535 (1478) को हुआ जन्म के समय उनके पिता को लगा की बालक मृत है उसे वहीँ कपडे में लपेट बृक्ष के पत्तो के बिच रखकर चले गए जिस गाव में रुके थे अंधी-पानी आ गया बाद में दुसरे दिन उसी रास्ते आना पड़ा बच्चे की ममता ही खीच लायी देखा की शिशु एक अग्नि के गोले बीच खेल रहा है माँ ने शिशु को गोद में उठा लिया अग्नि देवता ने उनकी रक्षा की वे भगवान के अवतार ही थे यह प्रचार में आ गया, उनके पिता मूलतः आँध्रप्रदेश के रहने वाले थे काशी में आकर रहने लगे थे  उस समय अरबों का आक्रमण उत्तर भारत हो रहा था यदि यह कहा जाय की शासन मलेक्षो के हाथ में चला गया था, इस भय के कारन उनके पिता लक्षमण भट्ट पत्नी एल्लमगरू के साथ वापस दक्षिण जा रहे थे, छोटी आयु में ही वल्लभ को काशी में विद्याध्ययन हेतु गुरु के पास भेज दिया गया मेधावी वल्लभ ने १२ वर्ष में ही चारो वेदों, छ शास्त्रों, एवं अट्ठारह पुराणों का अध्ययन कर लिया उसी समय उनके पिता का स्वर्गवास हो गया, अध्ययन पूर्ण के पश्चात् वल्लभ कुछ समय वृन्दावन में रहकर तीर्थाटन को निकले, घूमते-घूमते वे दक्षिण के विशाल हिन्दू साम्राज्य -विजयनगर पहुचे,गुणों के पारखी वहां के तत्कालीन शासक कृष्णदेवराय ने उनका भब्य स्वागत किया वे ईशा के १५-१६वी शताब्दी के सर्बाधिक प्रसिद्द आचार्य थे.
        समृद्धशाली विजयनगर साम्राज्य में विद्वान पंडित शोभा पाते थे शास्त्रार्थ में उन्होंने सबको पीछे छोड़ दिया, विद्वत से प्रभावित हो कृष्णदेवराय ने वल्लभ को वैष्णवाचार्य की उपाधि से विभूषित किया, तभी से वे वल्लभाचार्य कहलाने लगे, उस समय भारत की तथा हिन्दू समाज की हालत अच्छी नहीं थी दिनों-दिन हिन्दू पददलित होता जा रहा था वे केवल मोक्ष ही नहीं तो समाज को समरसता के माध्यम समाज को बचने में लग गए उत्तर भारत की यात्रा प्रारंभ की बृन्दावन में उनकी भेट सूरदास से हुई उन्होंने सूरदास को कृष्ण लीला का दर्शन कराया और सूरदास उनके शिष्य बन गए वल्लभाचार्य ने सूरदास को गोवर्धन पर्वत पर श्रीनाथ मंदिर के हरिकीर्तन हेतु रखा, जहाँ सूरदास ने कृष्ण लीला पद्द रचे, मंदिर की पूजा अर्चना का विधि -विधान निश्चित कर यहीं पर श्री कृष्ण की नवधा भक्ति शुरू की, सूरदास के गुणों से हम वल्लभाचार्य का आकलन कर सकते हैं उन्होंने इस्लामिक सत्ता व बर्बर धर्मान्तरण के खिलाफ हिन्दू धर्म रक्षार्थ अलख जगाया और घर वापसी के सूत्र को मजबूती प्रदान की.
          उनका भक्ति मार्ग पुष्टिमार्ग तथा शिष्य पुष्टिमार्गी काहलये, उस समय समाज में छुवा-छुत एवं उच्च-नीच के भाव का खंडन कर उन्होंने सामाजिक समरसता का भाव बनाया शुद्धाद्वैत मत का प्रवर्तन कर बिना किसी भेद-भाव के सभी हिन्दुओ को उन्होंने भक्ति का अधिकारी घोषित कर दिया और सभी वर्गों से शिष्य बना उदहारण प्रस्तुत किया उन्होंने ब्रजभाषा को परिमार्जित कर अनुव्य, पूर्व मीमांशा और सुबोधिनी सहित छह ग्रंथो पर भाष्य किया, भारत की राजनैतिक स्थित देखते हुए उन्होंने आचार्य महाप्रभु की बैठक को संगठन माध्यम बना देश में चौरासी स्थानों पर महाप्रभु की बैठक स्थापित कर हजारों शिष्यों को लेकर अपने विचारों का प्रचार-प्रसार शुरू किया जो आज तक जारी है, सम्बत १५८७ अषाढ़ तृतीय को अलौकिक रूप से अपनी इहलीला समाप्त की      
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