वट -सावित्री पूजा और पर्यावरण --------!

नारीत्व के प्रतीक "वट-सावित्री" 

जेष्ठ कृष्ण अमावस्या तिथि को हिन्दू महिलाएं वट सावित्री का व्रत रखती हैं, विशेष कर मिथिला क्षेत्र मे इस पर्व को सुहागिन महिलाएँ अनिवार्य रुप मे मनाती है..मिथिला मे इसे "वरसाईत" पर्व के नाम से जाना जाता है, शास्त्रों के अनुसार इस दिन व्रत रखकर वट वृक्ष के नीचे सावित्री, सत्यवान और यमराज की पूजा करने से पति की आयु लंबी होती है और संतान सुख प्राप्त होता है, मान्यता है कि इसी दिन सावित्री ने यमराज के फंदे से अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा की थी।

महत्व 

इस व्रत में सबसे अधिक महत्व चने का है, बिना चने के प्रसाद के यह व्रत अधूरा माना जाता है,
(किसलिए चना है जरूरी?) सावित्री और सत्यवान की कथा में इस बात का उल्लेख मिलता है कि जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे तब सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चलने लगी, यमराज ने सावित्री को ऐसा करने से रोकने के लिए तीन वरदान दिये, एक वरदान में सावित्री ने मांगा कि वह सौ पुत्रों की माता बने, यमराज ने ऐसा ही होगा कह दिया। इसके बाद सावित्री ने यमराज से कहा कि मैं पतिव्रता स्त्री हूं और बिना पति के संतान कैसे संभव है, सावित्री की बात सुनकर यमराज को अपनी भूल समझ में आ गयी कि,वह गलती से सत्यवान के प्राण वापस करने का वरदान दे चुके हैं, इसके बाद यमराज ने चने के रूप में सत्यवान के प्राण सावित्री को सौंप दिये, सावित्री चने को लेकर सत्यवान के शव के पास आयी और चने को मुंह में रखकर सत्यवान के मुंह में फूंक दिया। इससे सत्यवान जीवित हो गया, इसलिए वट सावित्री व्रत में चने का प्रसाद चढ़ाने का नियम है।

"वट" (वर/वरगद) वृक्ष की पुजा क्यों- ?


जब सावित्री पति के प्राण को यमराज के फंसे से छुड़ाने के लिए यमराज के पीछे जा रही थी उस समय वट वृक्ष ने सत्यवान के शव की देख-रेख की थी, पति के प्राण लेकर वापस लौटने पर सावित्री ने वट वृक्ष का आभार व्यक्त करने के लिए उसकी परिक्रमा की इसलिए वट सावित्री व्रत में वृक्ष की परिक्रमा का भी नियम है।

ऐसे करें वट सावित्री व्रत और पूजन

सुहागन स्त्रियां वट सावित्री व्रत के दिन सोलह श्रृंगार करके सिंदूर, रोली, फूल, अक्षत, चना, फल और मिठाई से सावित्री, सत्यवान और यमराज की पूजा करें, वट वृक्ष की जड़ को दूध और जल से सींचें, इसके बाद कच्चे सूत को हल्दी में रंगकर वट वृक्ष में लपेटते हुए कम से कम तीन बार परिक्रमा करें, वट वृक्ष का पत्ता बालों में लगाएं, पूजा के बाद सावित्री और यमराज से पति की लंबी आयु एवं संतान हेतु प्रार्थना करें, व्रती को दिन में एक बार मीठा भोजना करना चाहिए, वट- सावित्री व्रत सौभाग्य को देने वाला और संतान की प्राप्ति में सहायता देने वाला व्रत माना गया है, हिन्दू संस्कृति में यह व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक बन चुका है, इस व्रत की तिथि को लेकर भिन्न मत हैं, स्कंद पुराण तथा भविष्योत्तर पुराण के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यह व्रत करने का विधान है, वहीं निर्णयामृत आदि के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या को व्रत करने की बात कही गई है।

 उद्देश्य

 तिथियों में भिन्नता होते हुए भी व्रत का उद्देश्य एक ही है  सौभाग्य की वृद्धि और पतिव्रत के संस्कारों को आत्मसात करना, कई व्रत विशेषज्ञ यह व्रत ज्येष्ठ मास की त्रयोदशी से अमावस्या तक तीन दिनों तक करने में भरोसा रखते हैं, इसी तरह शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी से पूर्णिमा तक भी यह व्रत किया जाता है, विष्णु उपासक इस व्रत को पूर्णिमा को करना ज्यादा हितकर मानते हैं, वट सावित्री व्रत में 'वट' और 'सावित्री' दोनों का विशिष्ट महत्व माना गया है, पीपल की तरह वट या बरगद के पेड़ का भी विशेष महत्व है, पाराशर मुनि के अनुसार- 'वट मूले तोपवासा' ऐसा कहा गया है, पुराणों में यह स्पष्ट किया गया है कि वट में ब्रह्मा, विष्णु व महेश तीनों का वास है। इसके नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा आदि सुनने से मनोकामना पूरी होती है, वट वृक्ष अपनी विशालता के लिए भी प्रसिद्ध है, संभव है वनगमन में ज्येष्ठ मास की तपती धूप से रक्षा के लिए भी वट के नीचे पूजा की जाती रही हो और बाद में यह धार्मिक परंपरा के रूपमें विकसित हो गई हो।

दार्शनिक दृष्टि

दार्शनिक दृष्टि से देखें तो वट वृक्ष दीर्घायु व अमरत्व-बोध के प्रतीक के नाते भी स्वीकार किया जाता है, वट वृक्ष ज्ञान व निर्वाण का भी प्रतीक है. भगवान बुद्ध को इसी वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। इसलिए वट वृक्ष को पति की दीर्घायु के लिए पूजना इस व्रत का अंग बना, महिलाएँ व्रत-पूजन कर कथा कर्म के साथ-साथ वट वृक्ष के आसपास सूत के धागे परिक्रमा के दौरान लपेटती हैं।

कथा

वट वृक्ष का पूजन और सावित्री-सत्यवान की कथा का स्मरण करने के विधान के कारण ही यह व्रत वट सावित्री के नाम से प्रसिद्ध हुआ, सावित्री हिन्दू संस्कृति में ऐतिहासिक चरित्र माना जाता है, सावित्री का अर्थ वेद माता गायत्री और सरस्वती भी होता है, सावित्री का जन्म भी विशिष्ट परिस्थितियों में हुआ था, कहते हैं कि भद्र देश के राजा अश्वपति के कोई संतान न थी, उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिए मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुतियाँ दीं, अठारह वर्षों तक यह क्रम जारी रहा। इसके बाद सावित्रीदेवी ने प्रकट होकर वर दिया कि 'राजन तुझे एक तेजस्वी कन्या पैदा होगी, ' सावित्रीदेवी की कृपा से जन्म लेने की वजह से कन्या का नाम सावित्री रखा गया, कन्या बड़ी होकर बेहद रूपवान थी, योग्य वर न मिलने की वजह से सावित्री के पिता दुःखी थे। उन्होंने कन्या को स्वयं वर तलाशने भेजा, सावित्री तपोवन में भटकने लगी, वहाँ साल्व देश के राजा द्युमत्सेन रहते थे क्योंकि उनका राज्य किसी ने छीन लिया था, उनके पुत्र सत्यवान को देखकर सावित्री ने पति के रूप में उनका वरण किया। कहते हैं कि साल्व देश पूर्वी राजस्थान या अलवर अंचल के इर्द-गिर्द था, सत्यवान अल्पायु थे, वे वेद ज्ञाता थे, नारद मुनि ने सावित्री से मिलकर सत्यवान से विवाह न करने की सलाह दी थी परंतु सावित्री ने सत्यवान से ही विवाह रचाया, पति की मृत्यु की तिथि में जब कुछ ही दिन शेष रह गए तब सावित्री ने घोर तपस्या की थी, जिसका फल उन्हें बाद में मिला था।

उद्देश्य

उपनिषदों मे व्रत व साहित्य में सावित्री की अविस्मरणीय साधना की गई है. सौभाय के लिए किया जाने वाले वट-सावित्री व्रत आदर्श नारीत्व के प्रतीक के नाते स्वीकार किया गया है, जेष्ठ माह की पूर्णिमा को वट सावित्री के पूजन का विधान है, इस दिन महिलाएँ दीर्घ सुखद वैवाहिक जीवन की कामना से वट वृक्ष की पूजा-अर्चना कर व्रत करती हैं. लोककथा है कि सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे पड़े अपने मृत पति सत्यवान को यमराज से जीत लिया था, सावित्री के दृढ़ निश्चय व संकल्प की याद में इस दिन महिलाएँ सुबह से स्नान कर नए वस्त्र पहनकर, सोलह श्रृंगार करती हैं। वट वृक्ष की पूजा करने के बाद ही वे जल ग्रहण करती हैं।

पूजन विधि : -

इस पूजन में स्त्रियाँ चौबीस बरगद फल (आटे या गुड़ के) और चौबीस पूरियाँ अपने आँचल में रखकर बारह पूरी व बारह बरगद वट वृक्ष में चढ़ा देती हैं। वृक्ष में एक लोटा जल चढ़ाकर हल्दी-रोली लगाकर फल-फूल, धूप-दीप से पूजन करती हैं, कच्चे सूत को हाथ में लेकर वे वृक्ष की बारह परिक्रमा करती हैं, हर परिक्रमा पर एक चना वृक्ष में चढ़ाती जाती हैं और सूत तने पर लपेटती जाती हैं, परिक्रमा पूरी होने के बाद सत्यवान व सावित्री की कथा सुनती हैं। फिर बारह तार (धागा) वाली एक माला को वृक्ष पर चढ़ाती हैं और एक को गले में डालती हैं, छः बार माला को वृक्ष से बदलती हैं, बाद में एक माला चढ़ी रहने देती हैं और एक पहन लेती हैं। जब पूजा समाप्त हो जाती है तब स्त्रियाँ ग्यारह चने व वृक्ष की बौड़ी/ वट शुंग (वृक्ष की लाल रंग की कली) तोड़कर जल से निगलती हैं, इस तरह व्रत समाप्त करती हैं, इसके पीछे यह कथा है कि सत्यवान जब तक मरणावस्था में थे तब तक सावित्री को अपनी कोई सुध नहीं थी लेकिन जैसे ही यमराज ने सत्यवान को प्राण दिए, उस समय सत्यवान को पानी पिलाकर सावित्री ने स्वयं वट वृक्ष की बौंडी खाकर पानी पिया था।

पर्यावरण की दृष्टि से 

इस पुजा के दौरान वट वृक्ष की रक्षा  के साख साथ एक नयाँ वट का वृक्षारोपन करने की भी परम्परा है, धरती पर हरे-भरे पेड़ रहें तभी तो स्त्री उनकी पूजा कर सकेगी।

चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से

Infertility के रोग मे आयुर्वेद के प्रमुख ग्रन्थ चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, अष्टांग संग्रह मे पुंसवन कर्म (पुत्र, पुत्री प्राप्ती के लिए एक प्रकार की चिकित्सा) मे वट शुंग (कली)को खाने की निर्देश किया गया है ।

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