समय-समय पर भारत माता अपनी बीर भुजाये प्रकट करती है

        एक समय था जब भारत माता ने महाराणा प्रताप व शिवाजी महराज को अपनी बीर भुजा बनाया तो कभी शंकराचार्य, रामानंदाचार्य कभी दक्षिण में स्वामी विद्यारण तो उत्तर में संत तुलसीदास पैदा होते है उसी प्रकार आज मै १९वी-२०वी शताब्दी क़ा वर्णन करने जा रहा हू, आर्य समाज जब हिंदुत्व की खड्गधार बांह बनकर खड़ा हुआ स्वामी दयानंद से लेकर इस समय तक  समाज ने सारे देश में वैदिक धर्म क़े प्रचार से औट डाला. आर्य समाज क़े प्रभाव में आकर बहुत से हिन्दुओ ने स्वामी दयानंद क़े उद्देश्यों को लेकर विद्यालय स्थापित किये, जिनमे वहा क़े स्नातक राष्ट्रबादी उद्देश्यों क़े मूर्तिमान रूप बनकर देश भक्ति जन्य हो क्रन्तिकारी निकले  जिन्होंने स्वतंत्रता हेतु हँसते-हँसते फासी क़े फंदे को चूमा .
    आर्यसमाज ने शुद्धि और संगठन क़ा भी प्रचार किया सन १९२१ में मोपला क़े मुसलमानों ने भयानक बिद्रोह किया उन्होंने हजारो हिन्दुओ क़ा केवल क़त्ल ही नहीं किया बल्कि हजारो को मुसलमान बना लिया ,आर्य समाज ने इस बिपत्ति में संकट क़े समय सीना तान कर हजारो हुए बिधर्मियो को पुनः हिन्दू धर्म में सामिल कर लिया ,इसी कांड क़े बाद आर्य समाज ने राजस्थान क़े मलकाना राजपूतो की शुद्धि आरंभ की जिससे मुस्लिम संप्रदाय में क्षोभ उत्पन्न हो गया वे आर्य समाज से शत्रुता मानने लगे ,किन्तु इसमें शत्रुता की कोई बात नहीं जब अन्य धर्मावलम्बियों को यह अधिकार है वे धर्मान्तरण करते है तो हिन्दुओ को क्यों नहीं की वे अपने बिछुड़े हुए बंधुओ को अपने हिन्दू धर्म वापस कर सके,आर्य समाज क़े इस शाहस से मुसलमान बहुत घबराये .
     आर्य-समाज ने अपने दुसरे शाहस क़ा परिचय दिया सन १९३७ में जब हैदराबाद निजाम ने यह फरमान जारी किया की राज्य में आर्य-समाज क़ा प्रचार नहीं होने दिया जायेगा आर्य समाजियों ने सत्याग्रह करके कोई बारह हज़ार आर्य समाजी सत्याग्रही जेल गए इशायियत और इस्लाम क़े आक्रमणों से हिंदुत्वा की रक्षा करने में जितनी मुसीबते आयी आर्य-समाज उसे झेलता रहा, सच पूछिये तो भारत में हिन्दुओ को जगाकर उन्हें प्रगतिशील करने क़ा श्रेया आर्य-समाज को ही है ,हिन्दुओ क़ा धर्म एक बार फिर जगमगा उठा आज हिन्दू अपने धर्म की निंदा सुनकर चुप नहीं रह सकता -जरुरत हुई तो धर्म-रक्षार्थ वह अपने प्राण भी दे सकता है .
    जहा देश आज़ादी पर हजारो आर्यसमाजियो ने अपना बलिदान दिया वही जब हैदराबाद नबाब ने १९४७ में आज़ादी क़े बाद मूर्ति पूजा पर प्रतिबन्ध लगा दिया तो हजारो आर्यसमाजियो ने दिल्ली से व अन्य स्थानों से घंटा,घरियरी व शंख लेकर हैदराबाद क़े लिए कुछ किया और केवल मूर्ति पूजा ही नहीं बहाल कराइ बल्कि हैदराबाद को भारत में  बिलय क़ा रास्ता साफ किया .

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