भारतीय स्वाभिमान के प्रतीक---- महाराणा प्रताप ----- !


सोमवार, 27 मई 2013

        
           
महान परंपरा का वाहक वंश----!
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एक समय ऐसा भी आया जब भारतीय सत्ता दो भागो में बट गयी इस्लामिक सत्ता जो अकबर के हाथ में थी दूसरी हिन्दू सत्ता जो महाराणा प्रताप द्वारा नियंत्रित थी, महाराजा दाहिर के पतन पश्चात् भारत इस्लामिक आततायियों के हमलों का शिकार होता रहा उदारमना हिन्दू इन धोखे- बाज इस्लामिक आतंकबादियों को पहचान नहीं सका उस समय 'बप्पा रावल' के नेतृत्व में 'हरित मुनी' ने एक लाख की सेना संगठित कर ईरान, अफगानिस्तान तक जीतकर भगवा झंडा फहराया जिसका केंद्र मेवाड़ यानी 'चित्तौड़' था, यह राजसत्ता 'हरित मुनी' के आशीर्वाद से प्राप्त होकर महाराणा प्रताप तक चली आती है इस राजवंश के संस्थापक बप्पा रावल थे जिसमे 'महाराणा सांगा', महाराणा कुंभा, महाराणा उदय सिंह और महाराणा प्रताप जैसे तेजस्वी राजपुरुष पैदा हुए जिन्होंने परकीय इस्लामिक सत्ता को हमेशा चुनौती ही नहीं दी बल्कि मेवाड़ को भारतीय हिन्दू सत्ता का केंद्र बनाऐ रखा, भारतीय सत्ता का केंद्र बनने हेतु अकबर ने बहुत से लड़ाकू जाती (क्षत्रिय) के साथ बिबाहयेत्तर सम्बन्ध स्थापित किये, लेकिन यह कहना गलत होगा की उन्हे बराबरी का हक़ दिया वास्तव में उसने इस लड़ाकू जाती का उपयोग कर मुर्ख ही बनाया उसने इनकी लड़कियों के साथ बिवाह तो किया लेकिन किसी भी मुग़ल लड़की की शादी किसी भी राजपूत के साथ नहीं किया, दूसरी तरफ स्वाभिमानी राजपूत राजा अपने संबंधों हेतु लिए अपनी लड़कियों का बिबाह महाराणा 'प्रताप' से करते रहे इस प्रकार जंगल में भटकने वाले राणा ने १८ बिबाह कर सम्बन्ध बनाये, याद रहे सिसौदिया वंश ने अपने खून की पवित्रता बनाये रखी अपने वंश की कोई भी पुत्री मुसलमानों के यहाँ नहीं दी..
भारतीय सत्ता का केंद्र चित्तौड़--!
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७१२ ईशा में इस्लामिक सत्ता स्थापित नहीं हो पाई संघर्ष पर संघर्ष चलता रहा महाराजा दाहिर अथवा पृथ्बीराज चौहान के पराजित होने के पश्चात् चित्तौड़ हिन्दू सत्ता का केंद्र बना रहा और हिन्दू स्वाभिमान की रक्षा करता रहा जिस परंपरा की नीव युग पुरुष बप्पा रावल ने कंधार, ईरान तक जीत कर भगवा झंडा फहराया था उसी परंपरा के उत्तराधिकारी स्वयं महाराणा प्रताप आगे आये, वास्तव में यह कहना की मानसिंह व अन्य राजा जिन्होंने अकबर से बिबाहयेत्तर सम्बन्ध बनाये वे राजा थे, यह ही गलत है अकबर अपने साथ इनकी लड़कियों के साथ बिबाह कर इन सभी को राजा की उपाधि दी, ये सामान्य जमींदार थे न की राजा अकबर इनको राणा के मुकाबले खड़ा करना चाहता था जो सम्भव नहीं हो सका, इस नाते महाराणा इन सबके साथ भोजन कैसे करते क्यों की महाराणा तो भारत व हिन्दू समाज के सिरमौर, हिन्दू समाज स्वाभिमान के स्वाभाविक उत्तराधिकारी थे, बप्पा रावल बंश परंपरा की महत्वाकांक्षा तो भारत वर्ष यानी 'आर्यावर्त' पर शासन करने की थी ही इस नाते यह राजवंश इस इस्लामिक सत्ता को उखाड़ फेकना चाहता था जिससे भारत का गौरव पुनः वापस लाया जा सके, महाराणा का संघर्ष केवल चित्तौड़ के लिए ही नहीं बल्कि पूरे भारतवर्ष व हिन्दू धर्म, हिन्दू समाज के लिए था वे सम्राट चन्द्रगुप्त मोर्य के कुशल उत्तराधिकारी थे। 
महाराणा और तुलसी--!
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एक बार महाराणा चित्रकूट श्रीराम की तपस्थली देखने गए वहां उनकी भेट संत तुलसीदास से हुई और उनसे कहा महाराज साधना-भजन, उपासना से क्या होगा यदि हिंदुत्व ही नहीं रहेगा ? तुलसीदास ने बिना उनकी ओर देखे ही बोले यदि इतना ही हिंदुत्व से प्रेम है तो महाराणा की सेना में क्यों नहीं भारती हो जाते-? मै तो राणा ही हूँ----! इतना कहना था कि तुलसीदास जी का जीवन ही बदल गया तुलसीदास ने भगवान राम के साथ संघर्ष किये बानर-भालुओं की सेना की तुलना राणा के सहयोगी कोल-भीलों से की, उन्होंने भगवन श्रीराम न कह- कर राजाराम कहा क्यों की कहीं हिन्दू जनता अकबर को अपना राजा न मान ले, एक प्रकार से रामचरित्र मानस महाराणा के प्रतिबिम्ब में लिखा गया (तुलसीदास ने श्रीराम के आलोक में महाराणा को देखा) एक महाकाब्य है जिसने मध्य -काल में हिन्दू समाज को बचाने का काम किया और महाराणा ने पुनः अपने सभी किलों को जीत कर अपने लक्ष्य प्राप्त किया।   
हल्दीघाटी ही नहीं सात युद्ध-----!
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हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध विश्व के अन्दर अनूठा युद्ध लड़ा गया यह केवल ५-६ घंटे अथवा एक दिन का नहीं था हल्दीघाटी के युद्ध में वहां के भीलों और राजपूतों ने अपने उष्ण खून से पूरी घाटी को लाल कर दिया, उस स्थान को देखने के पश्चात् यह अनुभव होता है की महाराणा ने यह स्थान क्यों चुना था--?  महाराणा ने मेवाड़ की गद्दी पर बैठते ही एक लिंग भगवान की सौगंध खायी थी, वे मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं करेंगे, अकबर को तुर्क ही कहेंगे बादशाह नहीं, हल्दीघाटी युद्ध में मरने वालों की संख्या १५००० थी राजपुतीं की सेना में २०००० और अकबर की सेना में ८०००० सैनिक थे इस्लामिक सेना के सेनापति मानसिंह घबड़ाकर बगल में ही छावनी बनायीं और उसकी काफी ऊची दिवार बनायीं की पता नहीं कहा से महाराणा के छापामार सैनिक हमला कर दे, अकबर को अजमेर में आना पड़ा इसका उत्तराधिकारी सलीम युद्ध हेतु आया राणा के घोड़े चेतक ने अपने मालिक की इक्षा को समझ जहागीर के हाथी के मस्तक पर पैर जमा दिए राणा ने भाले से वार किया महावत मारा गया हौदा मोटा होने के कारन 'जहागीर' बच कर निकल गया, महाराणा के घाटी में जाने के पश्चात्  अकबर ने हजारों निर्दोष किसानो की हत्याकी, धीरे- धीरे आमेर, योधपुर, मारवाड़ व अन्य राजाओं को ताकतवर बनाया और सभी को राजा की उपाधि देकर महाराणा के समक्ष खड़े करने का प्रयास किया, बीच का काल महाराणा उदय सिंह के समय मेवाड़ कमजोर नेत्रित्व का परिणाम जो हिन्दू सत्ता थी वह कमजोर हुई जिसके अन्दर काबुल, कंधार, अफगानिस्तान, कश्मीर, गुजरात, सिंध, पूरा का पूरा पश्चिम भारत सत्ता केंद्र के नाते महाराणा बप्पारावल से कुम्भा, सांगा और राणा तक सिसौदिया वंश का सबल हिन्दू नेतृत्व था कश्मीर से कन्याकुमारी तक हिन्दू अपना गौरव मानता था, शेष दिल्ली से पूर्व, दक्षिण भारत के कुछ हिस्से मे इस्लामिक सत्ता मुगलों के नेतृत्व में थी इस प्रकार पूरे भारतियों के हृदय पर सिसौदिया वंश राणाप्रताप की सत्ता स्वीकार थी महाराणा ने अपने जीते ५७ वर्ष की आयु में ही पूरा चित्तौड़ अपने कब्जे में ले लिया

       ------आज भी वहां की मिटटी से आवाज आती है ---
                       ''माई रे एह्ड़ा पूत जड़ जेहडा राणाप्रताप'' ----!          
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