धर्म विशेष

एक पराजित मुगल सुल्तान------!

ज्ञान विज्ञान की तपस्थली
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ऋषी मुनियों की तपस्थली भारत वर्ष, सम्पूर्ण देश को सिंचित करने वाली मोक्ष दायिनी नदियां जिन्हे प्रत्येक भारतीय मां के रूप में मानता है, जड़ी बूटियों को देने वाले औषधीय पर्वत जो भगवान शंकर के रूप में पूजित हैं, वन, जंगल और सभी वनस्पतियां जैसे पीपल, नीम, तुलसी सभी के अंदर क़ोई न कोई गुण मौजूद है, लेकिन देश व हिंदू समाज का दुर्भाग्य कैसा है कि जब देश परकियो के हाथों में था हम संघर्ष करते हुए अपनी संस्कृति और सभ्यता वचा कर रखी थी दुर्भाग्य कैसा है आज़ादी के 70 वर्षों बाद भी वामपंथियों का रोग देश को जकड़ लिया है जिन मुगलो का शासन केवल मात्र 200 वर्ग किमि रहा हो उन्हें भारत वर्ष का सम्राट बताया जा रहा है मुगलों ने केवल सत्ता समझौता के बल पर की हिंदू इस्लाम को समझ नहीं पाया वह यह समझता कि हमारे धर्म जैसा ही यह भी कोई धर्म है बाद जाना कि यह तो धर्म है ही नहीं यह तो सब केवल और केवल आतंकवादी हैं।
गद्दी पर बैठते ही पराजय
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औरंगजेब 1658 में मुगल सत्ता पर कब्जा किया उससे पहले शाहजहां ने कई बार ''चित्तौड़'' पर हमला किया कोई सफलता नहीं मिली पराजय ही पराजय थी, औरंगजेब जब सत्ता संघर्ष कर रहा था उसने ''राणा राजसिंह'' से सहायता मांगी थी लेकिन राणा ने सहायता देने को कौन कहे 'चित्तौड़' के जिन भागों पर मुगलों का कब्जा था हमला कर 'राणा' ने उसे अपने राज्य में मिला लिया, सुल्तान बननेके पश्चात औरंगजेब ने जैसे कुछ हुआ ही न हो ब्यवहार किया, सत्ता समझौते के तहत मुगल दरबार में राजा लोग उपस्थित होते थे एक दिन ''किशनगढ़ रुप्पनगढ़'' के ''राजा मानसिंह'' से औरंगजेब ने कहा कि सुना है कि तुम्हारी बहन बहुत सुंदर है उसका निकाह मेरे साथ होना चाहिए यह अप्रत्याशित बात सुनकर मानसिंह का चेहरा पिला पड़ गया, जब वह किशनगढ़ आया और ''महाराजा रूपसिंह'' अपने पिताश्री को बताया कि औरंगजेब ने ऐसा कहा है तो ''राजा रूपसिंह'' और ''राजकुमारी चारुमती'' के होश उड़ गया, क्योंकि तब तक इस्लाम को कुछ समझने लगे थे लोग किसी मुसलमान को लड़की देना अपमान समझने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था, ''राजकुमारी चारुमती'' ने मेवाङ के ''राणा राजसिंह'' को एक पत्र लिखा कि ''रुक्मिणी'' का बलात डोला लेने ''शिशुपाल'' आ रहा है मैं तो अपने कृष्ण को वर चुकी हूं 'महाराणा राजसिंह' पत्र पाते ही अपने सेनापति को पचास हजार की सेना लेकर औरंगजेब को रोकने के लिए भेजकर स्वयं किशनगंज की ओर चल पड़े उधर औरंगजेब की सारी सेना मारी गयी इधर ''महाराणा राजसिंह'' ने विधिवत बिबाह कर ''राजकुमारी चारुमती'' को मेवाङ लेकर आए।
पराजय पर पराजय
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औरंगजेब बहुत ही चिढ़ गया अपनी खीझ मिटाने के लिए उसने मेवाङ पर हमले की योजना बनायी अपने सम्पूर्ण सेना लेकर तीन भागों में बांटकर चित्तौड़ पर हमला बोल दिया एक तरफ अपने सेनापति एक स्वयं और अपने लड़के 'अकबर' को पचास हजार सेना लेकर ''उदयपुर'' पर धावा बोला महाराणा ने मुगलों को पहाड़ियों में घुसने दिया उलझाकर और चौतरफा हमला बोला औरंगजेब पराजित हुआ, ''अकबर'' पराजित ही नहीं हुआ बल्कि राणा ने गिरफ्तार कर लिया बाद में अपने शर्तो पर छोड़ा, औरंगजेब ने एक बार और चढ़ाई की 'राणा राजसिंह' ने ऐसी धूल चटाई की सारे खजाने, तोपखाने, हथियार और बेगमों को छोड़कर भागना पड़ा बाद में हिन्दू स्वाभिमानी महाराणा राजसिंह ने सभी स्त्रियों को वापस दिल्ली भेज दिया, औरंगजेब भगवान कृष्ण की मूर्ति को बृंदावन में तोडना चाहता था, वहाँ के पुजारियों ने देश के विभिन्न हिस्सों में उस मूर्ति की सुरक्षा की गुहार लगायी कोई तैयार नहीं हुआ राजस्थान का कोई राजा हिम्मत नहीं जुटा सका जब यह समाचार 'महाराणा राजसिंह' को मिला उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया सभी पुजारी डारे हुए थे महाराणा ने कहा जब तक हमारी एक लाख की सेना रहेगी तथा हमारे कुल में कोई जीवित रहेगा ''भगवान श्रीनाथजी'' को कोई छू तक नहीं सकता और ''श्रीनाथद्वारा'' में ''भगवान श्रीकृष्ण'' की मूर्ति की स्थापना की गई जिसे आज श्रीनाथजी के नाम से जाना जाता है औरंगजेब अपना सा मुख बनाकर रह गया और फिर चित्तौड़ की तरफ कभी मुख नहीं किया पराजय पर पराजय झेलते हुए दक्षिण की ओर रवाना हो गया।
पिता पुत्र और शिष्यों को बलिदान किया
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''गुरु गोविंद सिंह'' ने गुरूओं की बलिदानी परंपरा को जारी रखा कश्मीरी पंडितों की रक्षा हो चाहे भारत के अन्य क्षेत्रों के हिंदुओं की रक्षा का प्रश्न हो सभी जगह पर गुरु गोविंद सिंह संघर्ष करते दिखे धर्म रक्षा करते करते दो पुत्र ''जोरावर सिंह और फतेह सिंह'' दिवारों में चुनवाये गए वही चमकौर के युद्ध में शेष दो पुत्र काम आए, शिष्यों की ऐसी फौज खड़ी कर दी जिसने ''वीर बंदा वैरागी'' के नेतृत्व में औरंगजेब के परखच्चे उड़ा दिया वैरागी को देखते ही मुगलों की सेनाये भागने लगती एक बार बैरागी को पकड़कर हाथी पर ला रहे थे कि जकड़ी हुई जंजीर को तोड़ डाला फिर क्या था मुगल सेना भागने लगी औरंगजेब उत्तर से प्रत्येक स्थान से पराजित हो ठिकाने तलासने लगा फिर दक्षिण दिशा की ओर चल दिया!
शिवाजी महाराज से छल कपट युद्ध
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औरंगजेब ने दक्षिण में उदित होते ''हिन्दूपद पादशाही'' को बर्दाश्त नहीं कर सका वैसे दक्षिण में कई रियासतें स्वतंत्र रूप से शासन कर रही थीं उसने कई मुस्लिम सेनापतियों को शिवाजीको परास्त करने के लिए भेजा सभी या तो मारे गए अथवा पराजित होकर लौटे पूना के लालकोठी सैनिक छावनी पर हमला कर एक ही वॉर में शाहिस्ताखान का काम तमाम कर देते लेकिन उसका हाथ कट गया और चिल्लाते हुए भाग गया दुबारा नहीं लौटा, दूसरी बार अफजल खान को ''क्षत्रपति शिवाजी'' को पकड़ने लिए गया, शिवजी महराज ने अपने कुटिनित से उसके विशाल सैन्य शिविर में घुसकर उसकी हत्या कर दी, यह सब देखकर औरंगजेब ने हिन्दू को हिंदुओ से लड़ाने की सोचकर जोधपुर के ''राजा यशवंत सिंह'' को युद्ध के लिए भेजा लेकिन वे भी पराजित होकर वापस आ गया फिर औरंगजेब ने जयपुर के ''मिर्जा राजा जयसिंह'' को ''शिवाजी महराज'' को पकड़ने के लिए भेजा राजा जयसिंह एक लाख सेना लेकर ''रायगढ़'' पहुंचे ''वीरपुत्र शिवाजी महाराज'' ने ''मिर्जा राजा जयसिंह'' को एक बहुत अच्छा पत्र लिखा कि मैं और आप दोनों ''भगवान श्रीराम'' के वंशज हैं यदि आप अपने लिए लड़ने आ रहे हैं तो मैं अपना राज्य सोने की थाली में सज़ा कर आपको सौंप दूँगा लेकिन इस मलेक्ष को नहीं ऐसा पत्र महराज ने लिखा दोनों में बात हुई वे ''मिर्जा राजा जयसिंह'' के साथ रवाना हुए, औरंगजेब के षणयंत्र को समझकर उन्होंने वहां से निकल कर पुनः अपनी राजधानी आ गए शिवाजी महाराज ने औरंगजेब को बार -बार पराजित ही किया।
भरतपुर द्वारा पराजय
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''भरतपुर रियासत'' में बार बार छेड़छाड़ करने से राजा परेशान हो गया फिर ''महाराजा सूरजमल'' ने मंत्रिमंडल में विचार विमर्श करके मुगल बादशाह को चुनौती दी उसने दिल्ली पर हमला कर दिया और केवल पराजित ही नहीं किया तो उन्हें लगा कि कोई तो विजय की निशानी चाहिए फिर क्या था लालकिले का दरवाजा ही उखाड़ कर ले गए आज भी वह दरवाज़ा भरतपुर दरबार में रखा हुआ है।
और फिर वापस न लौट सका
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उत्तर भारत से पराजित होकर पूरी राजधानी सहित युद्ध के नाम पर दक्षिण की तरफ रवाना हो गया उसे लगा कि अब ''क्षत्रपति शिवाजी महाराज'' नहीं है 25 वर्ष का लड़का क्या करेगा ऐसा सोचकर उसने मराठों के किले की बढ़ा उसे यह नहीं पता था कि उसकी समाधि यहीँ बनने वाली है, औरंगजेब खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचने वाली कहावत चरितार्थ होने लगी निरीह निहत्थे किसानों पर हमले शुरू कर दिया उस समय ''क्षत्रपति शम्भाजी राजे'' सत्ता सम्हाल चुके थे वे 21 वर्ष की अवस्था में गद्दी पर बैठे थे अपने सात वर्षों के शासन काल में 9 युद्ध लड़े सभी मे विजयश्री प्राप्त किया वे "पृथ्वीराज चौहान" के समान न्याय प्रिय राजा थे वे धर्मरक्षक धर्माभिमानी थे "शिवाजी महाराज" के समान ही कूटनीतिक व राजनीतिक भी थे,अपने ही एक रिश्तेदार ने धोखे से महराज को कैद करा औरंगजेब को सौंप दिया उनके साथ उनके प्रिय मित्र कबी "कबि कलश" भी थे, औरंगजेब ने उनपर घोर अत्याचार किया उन्हें इस्लाम स्वीकार करने के लिए दबाव बनाया उन्होने इनकार कर दिया, उन्हें घोड़े में बांधकर जुलूस निकालकर घसीटा, उनसे कहा तुम मुसलमान वन जाओ तो रियासत सहित छोड़ दिया जाएगा ''संभाजी महराज'' तो थे वीर योद्धा धर्म रक्षक के पुत्र उन्होंने कहा कि यदि तुम अपनी बेटी को दे दो तो भी मैं इस्लाम नहीं स्वीकार करूंगा क्रोधित होकर महाराज की जीभ काट लिया, जब महराज ने आँख तरेरी तो उनकी आँखों में गरम शलाखे डालकर आँख फोड़ दिया, हाथ काट दिया धीरे धीरे महराज के अंग अंग काट डाला और अन्त में कबि कलश और संभाजी महाराज की लासो को विखेर दिया, (संभाजी महराज ने यह सिद्ध कर दिया कि वे वीर पिता के महान पुत्र थे) बगल के गाँव की महिलाएं भड़क उठी उन्होंने अपने गांव के पुरुषों को चूड़ियां देकर कहा तुम घर में बैठो हम महराज के दाह संस्कार में जा रही हैं फिर क्या था ? सारा का सारा मराठा साम्राज्य उठ खड़ा हो गया औरंगजेब की समाधी 1707 मे अहमद नगर मे हीँ बन गई वापस नहीं लौट सका दिल्ली---!
केवल दिल्ली के इर्दगिर्द
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मुगलों की सत्ता कभी भी सम्पूर्ण भारत में नहीं थी लेकिन ''सेकुलरिस्ट व वामपन्थी'' इतिहासकार यह कहते नहीं थकते की मुगल शासक सम्पूर्ण भारत पर शासन करते थे ।
क्या उन्होंने सम्पूर्ण राजपुताना पर सत्ता हासिल कर पाये--?
क्या कभी मुगल आगरा से पूर्व बढ़ पाये--?
क्या कभी वे असम में शासन किया---?
क्या उसके शासन सत्ता को दक्षिण ने स्वीकार किया--?
क्या पंजाब में कभी सत्ता स्थिर रही---?
तो वास्तविकता यह रही है कि राजपूतों को आगे करके युद्ध तो लड़ा लेकिन मुगल बादशाह ग्वालियर से दक्षिण आगरा से पूर्व कुरुक्षेत्र से पश्चिम बढ़ नहीं पाया केवल अकबर नामा और बाबर नामा में ही ये भारत वर्ष के साम्राट थे उसी का आधार बनाकर बामपंथियों ने बढ़ा चढ़ा कर इन्हें राजा बनाने का प्रयास किया।
जीवन में औरंगजेब कोई युद्ध नहीं जीता उसकी पराजय पर पराजय होती रही वह एक पराजित ही सुल्तान था।

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