नेपाल की अपनी समस्या


राजतंत्र और लोकतंत्र के बीच पिसता नेपाल


भारत के आजाद होने के बाद 1950 में एक संधि हुई जिसमें नेपाल के राजा त्रिभुवन वीर विक्रम शाहदेव, श्री3 चंद समसेर जंग बहादुर राणा और नेपाली कांग्रेस नेता बी पी कोइराला शामिल हुए उसी समय श्री5 त्रिभुवन वीर विक्रम शाहदेव पूर्ण रूप से राजा हुए और सेनाध्यक्ष भी बी.पी. कोइराला प्रधानमंत्री मनोनीत किये गए इसमें बहुत सारी बाते हैं लेकिन इस समय उन बातों का उल्लेख आवस्यक नहीं है, 1955 में महाराजा त्रिभुवन का देहांत हो गया और उनके लड़के राजा महेंद्र श्री5 महाराजाधिराज हुए लेकिन प्रधानमंत्री बी पी कोइराला ही रहे। 1959 में चुनाव हुआ जिसमें वे जनता के चुने हुए प्रधानमंत्री हुए।

बी पी कोइराला की चीन यात्रा

1959 में प्रधानमंत्री होने के पश्चात उन्होंने चीन की यात्रा की उनके साथ में "सुवर्ण समशेर राणा" 'विजिंग' गए कुछ समझौते की बात आई "चीन" के राष्ट्रपति ने 'बी पी कोइराला' से कहा कि "हिमालय" सहित उत्तर का भाग चीन का है नेपाल उसे बलात कब्जा किया हुआ है उसे आप चीन को देदे कोइराला नहीं माने फिर चीन ने कहा कि एवरेस्ट का नेपाली में क्या कहते हैं यह भी किसी को नहीं पता उस समय फोन का भी युग नहीं था तार द्वारा समाचार काठमांडू भेजा गया "तारानाथ दहाल" जो इतिहासकार थे दो दिन बाद बताया कि इसका नाम सागरमाथा है, ध्यान रखना है कि नेपाल की सीमा हिमालय के उत्तर तिगड़ी नदी तक था "टिगड़ी नदी" 'हिमालय' के उत्तर 20 किमी स्थिति है, चीन ने 'बी पी कोइराला' को ब्लेंक चेक दिया कि जो भी भरना चाहते हैं भर लें लेकिन वे तो देशभक्त थे लोकतंत्र द्वारा चुने हुए प्रधानमंत्री थे नहीं माने और वापस काठमांडू आ गए।

त्रिपुरेश्वर संधि

बी पी कोइराला के वापस आने के बाद वे बहुत दिन तक प्रधानमंत्री नहीं रह सके, वास्तविकता यह है कि नेपाल और चीन की सीमा मिलती ही नहीं थीं तिब्बत और नेपाल की सीमा पर भारतीय सेना रहती थी जो बात चीन को बहुत खटकती थी, राजा महेंद्र और चीन की डील हुई और तूड़ीखेल मैदान में एक कार्यक्रम से बी पी कोइराला को सेना ने गिरफ्तार कर लिया राजा महेंद्र ने सत्ता अपने हाथ में ले लिया, 'राजा महेंद्र वीर विक्रम शाहदेव' स्वयं तो राजा थे लेकिन उनका मन मस्तिष्क बामपंथी था उन्होंने 'त्रिपुरेश्वर' संधि किया और उस संधि में आधा हिमालय सहित उत्तर टिगड़ी नदी तक का भाग चीन को दे दिया, आखिर उसके बदले नेपाल को क्या मिला ? तो चीन ने वादा किया कि चीन हमेशा मोनार्की को समर्थन करता रहेगा और नेपाल धीरे धीरे बामपंथ की ओर बढ़ने लगा।

बामपंथ की जड़

"राजा महेंद्र" हीन भावना से ग्रसित थे उन्हें 1950 की सन्धि जिसमें ''राजा त्रिभुवन'' पूर्ण रूप से राजा हुए उस समझौते में नेपाल की कई प्रकार की नीतियां भारत से होकर जाती थी वे अपने देश को भारत से अलग दिखाना चाहते थे इस चक्कर में उन्होंने नए प्रकार की राष्ट्रीयता बनाने का प्रयत्न किया वे हिंदुत्व के पक्षधर थे लेकिन भारत विरोधी हिंदुत्व वे यह समझने में चूक कर बैठे कि हिंदू भारत विरोधी नहीं होता, अब वे दो रास्ते पर काम करना शुरू कर दिये प्रथम नेपाल को बामपंथ की ओर बढ़ाना उन्हें लगता था कि 'नेपाली कांग्रेस' लोकतांत्रिक होने के कारण भारत के पक्ष की पार्टी है अब वे बामपंथी पार्टी का गठन के पक्ष में थे उन्होंने बामपंथी ट्रेनिंग शुरू कर दिया यहाँ तक कि जो भी सिंह दरबार में काम करेगा उसे कम्युनिस्ट कैडर होना अनिवार्य हो गया, दूसरा जो नेपाली भाषा भाषी भारतीय थे उन्हें ''सिंह दरबार'' में अधिकारी नियुक्ति शर्त भारत विरोध-! इस प्रकार राजा ने अपने पैरों पर स्वयं ही कुल्हाड़ी मार लिया।

आत्मघाती कदम

और इस प्रकार राजा के आत्मघाती कदम ने नेपाल को इस मुकाम पर पहुचा दिया कि जिसकी अपनी कोई राष्ट्रीयता नहीं रही जो भारत को जितना गाली दे वह उतना बड़ा राष्ट्रवादी हो जाता है और के पी ओली यही कर रहे हैं उन्हें देश से कोई मतलब नहीं है क्योंकि देश भक्ति व राष्ट्रीयता उनके जेहन में है ही नहीं, बामपंथियों का केवल एक ही लक्ष्य है एन केन सत्ता में बने रहना, राजदरबार और बामपंथी दोनों में कोई अंतर नहीं है क्योंकि बामियों ने जो कुछ सीखा है वह दरबार से ही सीखा है, पहले नेपाली कम्युनिस्टों को दरबार से बाकायदा बेतन मिलता था, इसलिए नेपाल में कम्युनिस्टों को रॉयल कम्युनिस्ट कहा जाता था।

अब समस्या असली नेपाली की

नेपाल में जो भी जनसंख्या है जो लोग रहते हैं वे कभी न कभी भारतीय भूभाग से गये हैं पहले नेपाल में जनजातियों का शासन था भारत में तुर्कों, मुगलों इत्यादि हमलों से पलायन कर पहाड़ी भूभाग में आये चाहे वह उत्तराखंड का भूभाग हो अथवा नेपाल का, (मेवाड़ में पद्मनी जौहर के पश्चात् रावल रतन सिंह के भाई रावल कुम्भकरण नपाल आये और उन्होंने राज्य स्थापित किया उन्ही के वंशज पृथ्बी नारायण शाह ने नेपाल का एकीकरण किया अभी का राजा उनका ४८वीं पीढ़ी है) राजा महेंद्र ने भी पढ़ें लिखे भारतीय नेपालियों को बुलाया, इस प्रकार जब दरबारी राष्ट्रवाद शुरू किया तो इसमें सबसे पहले जिन नेपालियों को बाहर से बुलाकर नौकरी दिया था उन्होंने असली नेपाली बनने के लिए भारत विरोध शुरू किया, ये जो भी कोईराला, शर्मा, दहाल, ढकाल, विष्ट, देवुवा, शाह, चंद, थापा, उपाध्याय ये सभी लोगों की वर्जिन भारतीय भूभाग ही है अधिकांश राजस्थान, कन्नौज और महाराष्ट्र से है अभी जो प्रधानमंत्री हैं "के पी शर्मा ओली" वे भी उज्जैन में बहने वाली "छिप्रा नदी" के किनारे से संबंधित हैं ये भी मूलतः भारतीय ही है, अब चुकी ये नेपाली तो हैं नहीं इसलिए असली नेपाली साबित करने के लिए भारत बिरोध, आज कल नेपाल के तराई भूभाग में भी दिखाई देता है कि कहीं कहीं भारत बिरोध का स्वर उभरता है वे भी अपने को असली नेपाली साबित करने के लिए यह कदम उठाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते।
"इसलिए नेपाल के प्रधानमंत्री "के पी शर्मा ओली" का भारत विरोध स्वाभाविक है और यह तब तक होता रहेगा जब तक अपने मिट्टी, अपनी संस्कृति और अपनी परंपरा से प्रेम नहीं होगा।"

समाधान

नेपाल "हिंदू धर्म- हिंदू संस्कृति" मानने वाला देश है इसकी राष्ट्रीयता भी "हिंदुत्व"ही है, पहाड़ - तराई और हिमाल इन तीनों भागों को हिंदुत्व ही जोड़ सकता है वास्तव में ईश्वर ने इसे भारत की गोद में बसाया है कोई भी ताकत इसे अलग नहीं कर सकती, हमारे केवल राजनीति सम्वन्ध नहीं है रोटी बेटी का संबंध है जो वास्तविक संबंध होता है, कोई भी भारतीय बिना "पसुपतिनाथ व मुक्तिनाथ" के दर्शन के बिना नहीं रह सकता उसी प्रकार कोई भी नेपाली बिना "चारों धाम व द्वादश ज्योतिर्लिंग" दर्शन के नहीं रह सकता वास्तव में यह धर्म संस्कृति हमे एक दूसरे से जोड़ती है इस संबंध को कोई तोड़ नहीं सकता।

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