कांग्रेस कभी भी पूर्ण स्वराज्य की बात नहीं की।

राष्ट्रवाद और उपनिवेशवाद


1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम हो चुका था, इस स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व जहाँ महारानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, नाना साहब पेशवा और वीर कुँवर सिंह जैसे क्रांतिकारी कर रहे थे वहीं इसके आगे आगे साधू सन्यासियों की टोली इन सबको दृष्टिकोण देती मार्ग प्रसस्त करते हुए चल रही थी, स्वातंत्र्यवीर सावरकर प्रसिद्ध अपनी पुस्तक "1857 स्वतंत्राय समर" में लिखते हैं कि इन क्रांतिकारियों के आगे आगे आगे एक संतों की टोली भी चल रही थी वास्तविकता यह है कि उस टोली का नेतृत्व 'स्वामी दयानंद सरस्वती' कर रहे थे इन सभी क्रांतिकारियों से स्वामी दयानंद जी का प्रत्यक्ष संबंध था और वे इस स्वराज्य के आंदोलन में अग्रगणी भूमिका निभा रहे थे, यह संघर्ष कंपनी से चल रहा था और हम युद्ध जीत चुके थे लेकिन ब्रिटिश शासन उसी समय युद्ध में कूद पड़ा उसने अफ्रीका- नेपाल इत्यादि देशों से सैनिक सहायता लेकर पासा पलट दिया।

ब्रिटिश साम्राज्य परेशान

ब्रिटिश सरकार इस बात से परेशान थी कि राजा- रजवाड़ो के अतिरिक्त आम जनता स्वतंत्रता संग्राम के लिए आगे बढ़ने लगी, गांव गांव में स्वतंत्रता युद्ध चल रहा था, एक तो भारतीय जनता पहले यह समझ नहीं पायी की यह शासन हमारे राजाओं का है अथवा कंपनी का क्योंकि राजाओं से विनती करके मालगुजारी वसूलने का काम लिया फिर कहा कि चोर डाकुओं से बचने के लिए 'सिक्योरिटी गार्ड' के लिए राजाओं से आग्रह किया अनुमति ले लिया, फिर चोरी चोरी सिक्योरिटी गार्ड के बहाने सेना में भर्ती शुरू कर दिया और सेना तैयार कर लिया, जब देश को यह सब पता चला तो देश में विद्रोह होना स्वाभाविक ही था, ब्रिटिश सरकार को लगा इतने पढ़े लिखे लोग कहाँ से आ गए तब उन्होंने देखा कि यहाँ तो प्रत्येक गांव में गुरुकुल है 85% से अधिक साक्षरता दर है, इसलिए केवल उत्तर प्रदेश और बिहार में कोई बीस लाख लोगों की हत्या की जो भी पढ़े लिखे लोग थे उन्हें या तो फांसी दे दी या गोली मारकर हत्या कर दिया, यह बात 'स्वामी दयानंद सरस्वती' को समझ में आ गई कि हमारी पराजय कहाँ हुई।

विना स्वराज्य के स्वधर्म सम्भव नहीं

स्वामी दयानंद सरस्वती को यह ध्यान में आ गया कि अपने यहां एक वर्ग ऐसा है जो परकीय शासन का पक्षधर है और वह संगठित होकर कार्य कर रहा है उनका ध्यान "ब्रम्हासमाज" की ओर गया और वे उसके मुख्यालय कोलकाता पहुंच गए उस समय वायसराय कोलकाता बैठता था अंग्रेजों ने अपनी राजधानी कलकत्ता बना रखी थी, स्वामी जी कलकत्ता में ब्रम्हासमाज के मुख्यालय में रुके उस समय ब्रम्हासमाज के प्रमुख केशवचंद्र सेन थे, स्वामी दयानंद सरस्वती का प्रतिदिन ब्याख्यान, प्रश्नोत्तर होता था कुछ प्रमुख लोगों की अलग से बैठक किया करते थे, उसमें स्वामी जी समझाते थे कि बिना स्वराज्य के स्वधर्म सम्भव नहीं है, एक दिन वायसराय का संदेश आया कि वह स्वामी दयानंद सरस्वती का दर्शन करना चाहते हैं, बग्घी आयी स्वामी जी वायसराय से मिलने गए उसने स्वामी जी से पूछा कि स्वधर्म क्या है- ? स्वामी जी ने बताया कि वैदिक धर्म ही भारत का स्वधर्म है और फिर उसने पूछा कि स्वामी जी ये स्वराज्य क्या है स्वामी दयानंद जी ने दो टूक कहा कि आपको हम इंग्लैंड भेज दे यही स्वराज्य है, 'वायसराय' परेशान होकर तुरंत स्वामी जी को ब्रम्हासमाज के मुख्यालय भेज दिया लेकिन उसने केशवचंद्र सेन से कहा कि इस बाबा को अपने यहाँ से निकाल दीजिए नहीं तो हम आपका सहयोग बंद कर देंगे, इसका अर्थ यह है कि ब्रम्हासमाज को अंग्रेजों द्वारा अनुदान राशि मिलती थी।

देश में दो धारा

देश में उस समय दो प्रकार के लोग उभर कर सामने आए एक वे जो प्रखर राष्ट्रवादी थे, स्वामी दयानंद सरस्वती का मानना था कि अब संपूर्ण हिन्दू समाज को संगठित होकर स्वराज्य के लिए लड़ना होगा इसलिए उन्होंने "आर्य समाज" की स्थापना की ओर बहुत तेज गति में यह संगठन फैलने लगा भारत में सेना की तीन कमान थी स्वामी जी ने सर्वप्रथम उन्हीं तीनों स्थानों पर मुंबई, लाहौर और दानापुर (पटना) आर्यसमाज की स्थापना किया, 1857 के संघर्ष में भारतीय टूट चुके थे मनोबल बढ़ाने की आवश्यकता थी स्वामी दयानंद सरस्वती इस कार्य को तेज गति में कर रहे थे, अब ब्रिटिश साम्राज्य परेशान हो गया था उन्हे लगता था कि कोई एक संगठन चाहिए जो भारतीय गुस्से को निकाल सके इसलिए बड़ी योजनाबद्ध तरीके से एक पूर्व ब्रिटिश अधिकारी "ए ओ ह्यूम" ने एक संगठन बनाया जिसका नाम कांग्रेस रखा जिसमे पहले कुछ पढ़े लिखे अंग्रेज फिर भारतीय ईसाई उसके बाद वे हिन्दू जो उपनिवेश मानते थे यानी अंग्रेजों का राज्य रहना चाहिए जैसे ब्रम्हासमाज ! ब्रम्हासमाज का मानना था कि अंग्रेज देवदूत हैं ईश्वर इक्षा से शासन कर रहे हैं वे स्थान स्थान पर ब्रिटिश शासन की वकालत करते दिखाई देते थे हिंदुओं को ईसाई बनाने के पुल के रूप में काम करते थे, इन ब्रम्हासमाज के लोगों को तो कांग्रेस के प्रवेश था लेकिन आर्यसमाज के लोगों को प्रबेश नहीं था, उसी समय जो राष्ट्रवाद की धारा थी जो स्वराज्य चाहते थे वे स्वामी दयानंद सरस्वती आर्यसमाज उनके अनुयायी लोकमान्य तिलक, श्यामजी कृष्ण वर्मा लाला लाजपतराय, लाला हरदयाल, बिपिनचंद्र पाल, डॉ हेडगेवार, वीर सावरकर, भगतसिंह डॉ आंबेडकर और सुभाषचंद्र बोस इत्यादि और जो दूसरी धारा थी वे उपनिवेश वादी थे उन्हें स्वतंत्रता से कोई लेना देना नहीं था वे लोग राजाराममोहन राय के अनुयायी ब्रम्हासमाज, केशवचन्द्र सेन, गोपालकृष्ण गोखले, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू इत्यादि इस लिए जब हम विचार करते हैं तो ध्यान में आता है कि कांग्रेस ने कभी देश आजादी पूर्ण स्वराज्य की बात नहीं किया।

उपनिवेशवादी कांग्रेस

आज भी स्वतंत्रता जो हैं वास्तव में देश को पता ही नहीं है कि आज भी हम ''ब्रिटिश उपनिवेश'' के हम अंग हैं, आज भी भारत 'कामनवेल्थ' का सदस्य है, आज भी 'ब्रिटिश रानी' बिना 'पासपोर्ट वीसा' के भारत आती है, इसलिए यह स्वतंत्रता नहीं सत्ता का हस्तांतरण है जो आज़ादी 1948 में मिलने वाली थी वह एक वर्ष पहले क्यों ? तो वास्तविकता यह है कि भारत जाग उठा था अंग्रेज सुरक्षित नहीं था, ''आजाद हिंद फौज'' जीतते हुए 'ढाका' तक पहुंच गई थी अंग्रेजों को लगता था कि यदि सत्ता क्रांतिकारियों, राष्ट्रवादियों के हाथ में आ गई तो हमारे चर्च का क्या होगा ? बहुत ही सावधानी से 'लॉर्ड माउंटबेटन' को बुलाया गया और कैसे भारत 'ब्रिटिश उपनिवेश' का हिस्सा बना रहे इसकी ब्यवस्था किया गया, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरु अथवा ये उपनिवेशवादी ग्रुप को सत्ता सौंप कर अंग्रेज यहाँ से चले गए।
आज भी देश में दो प्रकार के लोग हैं एक राष्ट्रवादी जिसमे आर्यसमाज, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, साधू सन्यासि, तमाम प्रकार के आध्यात्मिक संगठन और राजनीतिक दलों में भारतीय जनता पार्टी और जो उपनिवेशवाद को आज भी लिये चल रहे हैं पूरी कांग्रेस पार्टी और उनके सहयोगी दल, वामपंथी विचारधारा सहित, यह सब देखते हुए देश की जनता को सावधान रहने की आवश्यकता है, आज कांग्रेस जहाँ से शुरू हुई थी वहीं पहुंच गई है।

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