चिरंजीवी हिंदू समाज !


इतिहास में तीन बार हिन्दुओं का अस्तित्व समाप्त होने ही वाला था! वो समस्याएं आज के परिदृश्य से अधिक भयानक थीं, क्योंकि उस समय हिन्दुओं को जोड़ने के लिये कोई अखिल भारतीय संगठन अथवा सोशियल मीडिया जैसे उपकरण नहीं थे।

कायरता का बीजारोपण 

अपने देश अथवा सनातन धर्म जिसे आज हम हिंदू धर्म कहते हैं उसके लिए पहली चुनौती थी बौद्ध धम्म की थी, बौद्ध धम्म भले ही कोई अलग धर्म नहीं था। भगवान बुद्ध ने अपने हिसाब से वैदिक धर्म को ही परिभाषित किया, जिस समय अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकर किया उसने बुद्ध की शिक्षाओं के इतर अपनी कायरता की शिक्षा दी सारी सेना को अहिंसक बना कपुरुषता का बीज बोया सेना को "चमर" (पीला कपड़ा) पहना दिया, उसने भारतवासियों में अहिंसा का जो बीज बोया जिसने भारत को लंबे समय तक कष्ट दिया।

पुष्यमित्र शुंग का आगमन 

जिस कापुरुषता की शुरुवात सम्राट अशोक ने किया था उसी का अनुसरण कर मगध साम्राज्य के सम्राटों ने आगे बढ़ाया दुर्भाग्य विदेशी यवनों के हमले शुरू हो गए। उसी समय मगध साम्राज्य का सेनापति "सेनानी पुष्यमित्र शुंग" था बार-बार राजा को आगाह किया पर कथित सम्राट बृहद्रथ को यह समझ में नहीं आया और अंत तक अपने देश राष्ट्र और संस्कृति बचाने व पुनरुत्थान हेतु बृहरथ की हत्या कर स्वयं मगध साम्राज्य का सम्राट बनना पड़ा। और तब पुष्यमित्र शुंग ! जिन्होंने हिंदू धर्म संस्कृति व मगध की रक्षा हेतु सत्ता पर कब्जा किया और पुनः वैदिक क्रांति का संचार किया! भारतियों ने फिर से शस्त्र उठाकर लड़ना आरंभ किया, और सदियों तक अपनी रक्षा की, भारत की रक्षा की। पर जिन विस्तारों में 'बौद्ध धम्म' प्रबल रहा, वो विस्तार अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रूप में अब इस्लामिक देश के रुप में है।

हल्दी घाटी युध्द के पश्चात मुगल 

दूसरा सबसे भयानक दौर था जब १५७६ में "हल्दी घाटी" में अकबर की पराजय हुई, मानसिंह भाग भी नहीं पाया था! रात भर जहां मुगल सेना थी उसके चारो तरफ खाई खुदवाता रहा कि कहीं से किसी ओर से "महाराणा प्रताप" हमला न कर दे। इतना ही नहीं पराजय के पश्चात कई महीनों तक मुगल दरबार में मानसिंह के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया। महाराणा प्रताप के बाद अब कोई हिन्दू राजा शेष नही था जो उसे चुनौती देता। पर अकबर १५८१ तक काबुल के अभियानों में उलझा रहा और धीरे-धीरे इस्लाम से उसका मोह भंग होता गया, कहने को तो अकबर का काल लगभग ५० वर्षों का था, मगर वह इस्लामिक क्रांति के लिये कुछ खास नहीं था। सबसे भयानक काल था औरंगजेब का! औरंगजेब ने भी ५० वर्षों तक राज किया और प्रारंभ के २५ वर्ष उसने केवल रक्तपात किया।

हिंसा हत्या के द्वारा इस्लाम का विस्तार 

"मार-मार के मुसलमान बनाओ" की नीति के चलते उसने अफगानिस्तान, पंजाब और काश्मीर में हिन्दुओं के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगा दिए। कश्मीर के मुस्लिमों द्वारा प्रताड़ित हिंदू, धर्म रक्षक गुरु तेगबहादुर जी से पंजाब आकर धर्म सुरक्षा की गुहार लगाई। गुरु जी ने उनसे कहा कि जाओ औरंगजेब से कहो कि यदि गुरु तेगबहादुर को आप इस्लाम स्वीकार करवा लेंगे तो हम कश्मीरी अपने आप इस्लाम स्वीकार कर लेंगे। और गुरु तेगबहादुर बलिदान देने के लिए चल दिए, आज भी दिल्ली में "शीश महल गुरुद्वारा" गुरु तेगबहादुर के बलिदान का स्मारक गुरुद्वारे के रुप में याद दिलाता हुआ मौजूद है। गुरु तेग बहादुर जी और महाराज गोकुल सिंह जी जाट को इस्लाम के नाम पर उनके वध कर दिए! १६८१ में उसे छत्रपति संभाजी महाराज ने चुनौती दी! यहाँ औरंगजेब ने गलती की! उसने मराठों को समाप्त करने की प्रतिज्ञा ली, और संभाजी से लड़ने महाराष्ट्र आ गया।

प्रतिकार की महत्वपूर्ण घटना 

अकबर ने अंतिम २५ वर्ष, दीन-ए-इलाही धर्म अपनाया था यानी इस्लाम से अलग दिखाने की कोशिस और सर्व धर्म समभाव का ढोंग करते हुए सत्ता को बचाए रखा! वहीं औरंगजेब ने अंतिम २७ वर्ष तक कट्टरता की नंगी नाच किया और उत्तर में मेवाड़ महाराणा "राजसिंह", भरतपुर राज्य के जाट राजा "जवाहर सिंह" से बार बार पराजित होकर दक्षिण की ओर गया जहां मराठों से युद्ध किया क्षत्रपति संभाजी राजे ने कई बार औरंगजेब को बड़ी मार लगाया परिणाम ये हुआ कि मराठा विजयी हुए और औरंगजेब की कब्र वहीं आज के औरंगाबाद में बनी हुई है वह लौटकर दिल्ली अपनी राजधानी वापस नहीं आ सका। पांडवों के जिस इंद्रप्रस्थ (आज का दिल्ली) को विदेशी शक्तियों ने नोच-नोच कर खा लिया था। उसी दिल्ली को १७३७ में पेशवा बाजीराव ने स्वतंत्र किया और २० वर्षों के पश्चात, उनके पुत्र पेशवा बालाजीराव ने उसी दिल्ली सम्राज्य को हिन्दू स्वराज्य के रुप स्थापित किया। इन तीन घटनाओं का ऐतिहासिक महत्व बहुत गहरा है और इन्हे फिर से समझने-समझाने का तात्पर्य यह है कि भारत कभी इस्लामिक देश नहीं बना न बनेगा और न ही हिन्दू प्रभाव से शून्य होगा।

हिंदू समाज चिरंजीवी है 

१६५७ में जब औरंगजेब बादशाह बना था, तब किसने सोचा था कि १०० वर्षों के पश्चात १७५७ आते-आते मुगल ही समाप्त हो जायेंगे ? जब छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपनी सेना बनाई थी, तब उसमें केवल ५० मराठा योद्धा या सैनिक थे। जब गोकुल सिंह जाट खड़े हुए थे, उनके साथ मात्र ४० जाट थे। जब गुरु हरगोविंद सिंह जी ने आहवाहन किया था तब उनके साथ मात्र २५ सिख थे! डा हेडगेवार जी ने जब संघ की स्थापना की उस समय केवल ५ स्वयंसेवकों से आरंभ किया था। मगर आज देखिये इन सभी के नाम पर आर्मी, रेजीमेंटस और विशाल संगठन चल ही नहीं रहे हैं है बल्कि अपने देश और विश्व को प्रभावित कर रहे हैं। बात ये नहीं है कि आपका अंतिम लक्ष्य क्या है ? बात ये है कि आप अपने नागरिकों को प्रेरित करते हैं या हतोत्साहित! जब दिल्ली पर मराठाओं का शासन आया था, तब तक शिवाजी महाराज के स्वर्गवास को ७० वर्ष हो चुके थे, पर जो शुरुआत उन्होंने की थी उससे हमें सीखना पडेगा!

गीता का वह संदेश सदैव याद रहे - "हम थे भी, हम हैं भी और हम होंगे भी"

वे सभी हमारी एकता से घबराये हुए हैं, ओड़िसा -बंगाल से तमिळनाडु तक राजनीति में राष्ट्रवाद की धमक से भयभीत हो चुके हैं। उन्हें मालूम है कि अगले दो वर्षों में अगर राष्ट्रवाद का विजयरथ को नहीं रोका गया तो २०२४ तक हिन्दू इतने संगठीत और शक्तिशाली हो जायेंगे कि उन्हें दबाना असंभव-सा हो जायेगा और भारत विश्व गुरु बन जायेगा ! उनके लिए तो आगे अस्तित्व की लडाई का है! वे सब हिन्दू वोट बैंक को क्षत-विक्षत करने का हर हथकंडा अपनाएंगे ! बर्षों की "जातिवादी तुष्टिकरण की राजनीति" का सर्वनाश होते देखना उनके लिए असहनीय है! हिंदू राष्ट्र विरोधी खुलकर मैदान में हैं, वे चाहते हैं कि आप सभी जातियां आपस में लड़ें। सब आपस में कट मरें! उन्हें तो बस आपके टूटने का इंतज़ार है!

संगठन में शक्ति है

"भीम आर्मी" का गठन करना और बीच सड़क पर गाय काटकर खाना या फिर बाबासाहेब आम्बेडकर की तस्वीर के आगे बजरंगबली हनुमान जी का अपमान करना ये सभी उसी प्रपंच का हिस्सा हैं! सेना का मनोबल तोड़ने के प्रयास प्रति दिन किए जा रहे हैं! उन्होंने आतंकी, नक्सली, हुर्रियत, और पत्थर-बाजों तक का भी समर्थन करके देख लिया! तैयार रहिये अगले वर्ष - इनसे भी विकट परिस्थितियाँ खड़ी की जायेंगी। आपको उकसाने-भडकाने का हर संभव प्रयास किया जायेगा! साधु-संतों पर कीचड़ उछालकर और फूट डालकर आपस मे लड़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन हर वार खाली जा रहा है! प्रभु की कृपा रही तो राष्ट्रवादी ताकतें आगे भी विरोधियों को जोरदार पटखानी देंती रहेगी! सदियों के बाद आया है यह स्वर्णिम समय - हिन्दू एकता का -इसे यूँहीं न खोने देगें। हम सभीको व्यक्तिगत मतभेद और अहंकार की लडाई को छोड़कर इस एकजुटता को बनाए रखने का समय है! याद रखिये! निशाने पर न ब्राह्मण है, न मराठा है, न वैश्य है, न राजपूत है, न गुर्जर है, न दलित है, न पिछड़े हैं, निशाने हम केवल और केवल हिंदू हैं और भारत ! स्थान, अवसर के अनुसार जातियां बदलेंगी, क्योंकि निशाने पर "हिन्दू" है, निशाने पर "हिन्दू धर्म" है, निशाने पर "भारत" है, निशाने पर "भारतीयता" है! निशाने पर हमारी धर्म-संस्कृति है! निशाने पर सनातन धर्म है! अब बारी हमारी और आपकी है हमे खड़ा होना है। हमें और आपको केवल और केवल इतना ही करना है कि जातिवाद, ऊंच-नीच, अगड़े-पिछड़े, भाषावाद, क्षेत्रवाद, आदि सभी तरह के भेदभाव भुलाकर, संगठित एकता में रहना है, संगठित ही रहना है।

संगठन में शक्ति है। ॐ समगच्छद्वम् संवदध्वम् ...

साथ-साथ चले, प्रेमपूर्वक परस्पर व्यवहार करें। हमारा मन. विचार और लक्ष्य समान हों, फिर देखो ! कोई भी ताकत हमें आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती।

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2 टिप्पणियाँ

  1. अदभुत, ज्ञानवर्धक लेख
    आपको सादर नमन एवं आभार

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  2. वीर व्रतधारी हिन्दू समाज के लिए प्रस्तुत काव्य रचना युगों युगों तक मार्गदर्शन देता रहेगा ! 💐🎂नमन 🎂💐👏

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