भारत में सेकुलर जिहाद

भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री 

वैसे तो इस्लाम में सैकड़ों प्रकार के जिहाद है और आज तक सैकड़ों वर्षों से मुसलमानों के संपर्क में रहने के बावजूद हिंदू समाज जिहाद क्या है यह नहीं समझ सका। देश विभाजन के पश्चात वोट बैंक बनाने के लिए जवाहरलाल नेहरू ने सेकुलर की परिभाषा गढ़ी और वे स्वयं कहते थे कि "मैं बाई एक्सीडेंट हिंदू घर में पैदा हुआ हूँ, संयोग से हिंदू, कल्चर वाई मुस्लिम मैं संस्कृति से मुसलमान हूँ।" लेकिन उन्होंने सेकुलर जिहाद चलाने का काम किया इसी योजना के तहत उन्होंने अपने नाम के आगे पंडित शब्द जोड़ लिया और वे तथाकथित पंडित अब पंडित जवाहरलाल नेहरू कहलाने लगे, सारे ब्राह्मणों तथा हिंदू समाज को मूर्ख बनाने का काम किया। देश विभाजन के पश्चात सारे पाठ्यक्रम से हिंदू स्वाभिमान जैसी सभी हटा दिया गया महाराणा प्रताप, क्षत्रपति शिवाजी महाराज, वीर छत्रशाल गुरु गोविंद सिंह जैसे हिंदू धर्म रक्षक, देश भक्तों को भटके हुए पढ़ना भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल इत्यादि को आतंकवादी बताना यही सेकुलर की परिभाषा लिखी गई और ये हो भी क्यों न बड़े योजनाबद्ध तरीके से नेहरू ने शिखा मंत्री एक विदेशी कट्टर मुस्लिम को बनाया जिसे बड़े प्रेम से मौलाना आजाद कहते थे, ये भारतीय नहीं थे, इन्होंने किसी अंग्रेजी, हिंदी स्कूल व कालेज में प्रवेश नहीं लिया था। इनकी योग्यता थी कि ये "जमायते इस्लामी हिन्द" के अध्यक्ष थे, जमायते इस्लामी हिंद का उद्देश्य था कि अखण्ड भारत और जो गजवाये हिंद का स्वप्न है पूरा करना यानी भारतवर्ष का इस्लामीकरण करना इसी उद्देश्य से मौलाना आजाद भारत आये थे और यही रह गए। वे जब तक जीवित रहे तब तक शिक्षा मंत्री रहे और उसके बाद भी शिक्षा मंत्री सेकुलर गिरोह का ही ब्यक्ति बनाया गया। सेकुलर जिहाद की परिभाषा नेहरू और मौलाना आजाद ने तैयार किया।

कौन नायक और कौन खलनायक-?

हमें कहा गया कि औरंगजेब के उल्लेख अब इस्लामी कट्टरपंथी अथवा इस्लामी विजेता के रूप में नहीं किया जाएगा।और शिवाजी को महाराष्ट्र की पुस्तकों में अधिक प्रतिष्ठा नहीं दी जाएगी। यह कहना साफ दुष्टता है कि शिवाजी महाराज की प्रतिष्ठा केवल महाराष्ट्र में है, हमारा सौभाग्य है कि सारा का सारा हिंदू समाज शिवाजी महाराज का सम्मान करते हैं चाहे वह भारत के किसी भी कोने में रहते हों इतना ही नहीं सम्पूर्ण विश्व का हिंदू समाज उनके प्रति श्रद्धा भाव रखता है। भारत के किसी भी प्रान्त के कबि लेखक हैं सभी ने शिवाजी महाराज के बारे में अपने अपने तरीके से प्रसंशा किया है, सभी ने नायक सिद्ध किया है। शिवाजी के ब्यक्तित्व और भारतीय इतिहास में उनकी भूमिका के साथ पूरा न्याय कर सके, ऐसे इतिहासकार को जन्म लेने अभी बाकी है। कुछ बौने राजनीति कर्मी जो इतिहासकार होने का स्वांग रचते हैं, शिवाजी को अपने कद में लाना चाहते हैं, वे सूर्य पर थूकने वाले लोफरों जैसे हैं।

सेलुलर इतिहास

जहाँ तक औरंगजेब की बात है, हमारे सेकुलरवादी अच्छी तरह समझते हैं कि उसे 'इस्लाम का नायक' की छबि देना असुविधा जनक है, क्योंकि उसके छबि साथ ही इस्लाम की छबि भी दिखाती है। और वह छबि सुखद होने से बहुत दूर है, यदि उस छबि को लोगों की नज़र से बचाकर न रखें तो हमारे सेक्युलर जिहादियों के लिए धर्म और संस्कृति के रूप में इस्लाम का दावा प्रस्तुत करना और बचाना कठिन हो जाता है। लेकिन मानव इतिहास में ऐसे तथ्यों की भरमार है जो बिल्कुल सुखद नहीं है, उन तथ्यों को केवल इसलिए नहीं मिटाया जा सकता क्योंकि कुछ लोग उसे पसंद नहीं करते या उसका सामना नहीं कर सकते। औरंगजेब वैसा ही एक तथ्य है, स्टालिन दूसरा वैसा तथ्य है और यह कहना कि औरंगजेब इस्लाम का बड़ा नायक नहीं था कुछ वैसा ही कहना है जैसे स्टालिन कम्युनिस्ट नहीं था और हिटलर नाजी नहीं था। और वह इस्लाम जिसे औरंगजेब ने नहीं दर्शाया वह न कुरान में मिलता है,न प्रोफेट मुहम्मद के सुन्ना यानी व्यवहार में।वैसा इस्लाम सेकुलरवादियों द्वारा कपोल कल्पित किया गया है और दूसरी ओर मध्यकाल और आधुनिक काल में इस्लाम के संरक्षकों द्वारा लिखे गए अनेक इतिहास ग्रंथ है जिसमें औरंगजेब को इस्लाम का महानायक कहकर खूब प्रसंशा की गई है। 

और राष्ट्रीय एकता का नाटक

'राष्ट्रीय एकता' के लिए इस धूर्तता पूर्ण योजना का पूरा मिजाज शिक्षा मंत्रालय के अगले निर्देश में बिलकुल सामने आ जाता है, मध्यकाल को काला युग या हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच संघर्ष का काल के रूप में दिखाना मना है। जबकि इसका परिणाम पाकिस्तान के रूप में आ चुका है फिर भी जिहाद तो कौम का एक हिस्सा है उस काम को तो करना ही है। इतिहासकार मुसलमानों को शासक और हिंदुओं को शासित के रूप में नहीं दिखा सकते, बिना धर्म के वास्तविक प्रभाव की जाँच पड़ताल किये राज्य को धर्मसत्तात्मक नहीं बताया जा सकता। राजनीति संघर्ष में धर्म की भूमिका को बढ़ा चढ़ा कर दिखाने की इजाजत नहीं दी जा सकती है और न ही मेल-जोल की प्रक्रियाओं, प्रवृत्तियों की उपेक्षा होनी चाहिये। 

कैसा युग अंधकार या चमत्कार-?

निस्संदेह, इस बारे में दो राय हो सकता है कि भारतीय इतिहास का मध्य काल अर्थात मुस्लिम शासन में भारत अंधकार युग था अथवा चमकदार, यह तो इस बात पर निर्भर करता है कि किस दृष्टि से कोई उसे देखता है। इस्लाम की दृष्टि से देखने पर यह सचमुच एक शानदार जमाना था इस्लाम ने ऐसे अनेक बड़े बड़े साम्राज्य कायम किया जो अपने वैभव में अतुलनीय था। इस्लाम को इससे भारी संतोष था क्योंकि, 1.लागातार जिहाद में लाखों लाख घृणित काफिरों को दोजख भेज दिया गया। 2. मूर्ति पूजा के हज़ारों स्थलों और तीर्थों को नष्ट और अपवित्र किया गया। 3. हज़ारों ब्राह्मणों और भिक्षुओं को मार डाला गया और बाकियों को जबरन गोमांस खिलाया गया। 4. भारी मात्रा में बहुमूल्य चीजें लूटी गई और उसे 'प्रोफेट' द्वारा तय किए गए नियम के अनुसार मोमिनों में बांटा गया। 5. लाखों लाख पुरुषों और स्त्रियों, बच्चों को पकड़कर दूर इस्लामिक देशों में गुलाम और रखैलों के रूप में बेचा गया। 6. बड़ी संख्या पर सत्ता और सुविधा हथियाई गई, जिसे दासता यानी गुलामी में रखा गया 7. तलवार के बल पर इस्लामी मजहबी किताबों का वर्चस्व बनाया गया। मुस्लिम शासकों ने अपने लिये बड़े किले, महल कब्जा कर लिया विलासिता पूर्ण जीवन के लिए, अनेक मस्जिदें व मदरसे बनवाये और मिल्लत की मजहबी ताकत बनाये रखने के लिए असंख्य मुल्लों को संरक्षण दिया। 

झूठा परोसा

इस भवन निर्माण वैभव में अन्य कलाएं और कारीगरी, पोशाक और कलात्मक हस्तलेख, सचित्र पांडुलिपियां, फ़ारसी पद्य और गद्य, कुरान और हदीस पर अरबी व्याख्यान, दरबारी संगीत और नृत्य, इस्लाम के संतों-सूफियों के संवाद जोड़ कर, भारत में इस्लामी विरासत की प्रदर्शनी में इन सब को इकट्ठे देखकर निश्चित तौर पर छाप पड़ेगी कि मुस्लिम शासन में मध्यकालीन भारत सचमुच शान्ति और उन्नति का स्वर्ग ही था। मगर जहाँ तक हिंदुओं का प्रश्न है, यह काल अंधकार का लंबा युग था जो तभी खत्म हुआ जब 18वीं सदी के मध्य में मराठों, जाटों, सिखों और राजपूतों ने इस्लामी साम्राज्यवाद की कमर तोड़ दी। मुस्लिम शासन में हिंदुओं की स्थिति का वर्णन तारीखे-वसाफ के लेखक ने इन शब्दों में किया है, "बूतपरस्ती को झुकाने और बुतों (मूर्तियों) को तोड़ने के लिए मजहबी जुनून की रौ ऊंची फड़कती थी। मुहम्मदी सेनाओं ने इस्लाम के लिए उस नापाक जमीन पर बाएं -दाये, बिना देखे बिना किसी मुरौवत के मारना और कत्ल करने शुरू किया और खून के फौवारे छूटने लगे। उन्होंने इस पैमाने पर सोना और चांदी लूटा जिसकी कल्पना नहीं हो सकता, भारी मात्रा में जवाहरात और तरह तरह के कपड़े, उन्होंने बड़ी संख्या में सुंदर और छरहरी लड़कियों,लड़कों और बच्चों को कब्जे में लिया, जिसका कलम वर्णन नहीं कर सकती..! 

संक्षेप में

"मुहम्मदी सेनाओं ने देश को बिलकुल ध्वस्त कर दिया और वहाँ के रहने वालों की जिंदगी तबाह कर दिया, शहरों को लूटा गया और उनके बच्चों का कब्जा किया अनेकों मंदिर उजाड़ दिया देवमूर्तियाँ तोड़ डाली गई उन्हें पैरों के नीचे रौंदा जिसमे सबसे बड़ा सोमनाथ मंदिर था, मूर्तियों के टुकड़े कर दिल्ली लाया गया और जामा मस्जिद के रास्ते में बिछा दिया गया ताकि लोग याद रखें और शानदार जीत की चर्चा करते रहे। सारी दुनिया के मालिक अल्लाह की शान बनी रहे।" इस्लामी विरासत की महत्ता दिखाकर हिंदू समाज को बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता और न ही बनाना चाहिए। यह महत्ता उसी अनुपात में बढ़ी जिस अनुपात में हिंदुओं की दुर्गति, पीड़ा, तबाही और मौत हुई, यह जले पर नमक छिड़कने के समान है।

सेकुलरिज्म का नशा

रसिया की एक सत्य कथा है, कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी कॉमरेड रादेक जो मजाक यानी कामेडी के लिए जाना जाता है जिसमें एक चुटकुला इस प्रकार का था! एक दिन कामरेड रादेक पूरी तरह नंगा होकर पूरे दिन के उजाले में रेड स्क्वायर पर खड़ा था, किसी साहसी ब्यक्ति ने उसके पास जाकर कहा, "कॉमरेड कमिसार, क्या आपको पुलिस का डर नहीं है ?" रादेक ने उसकी ओर देखा और पलट कर कहा, पुलिस! कहाँ है पुलिस ? नागरिक ने चारों ओर दिख रहे पुलिस वालों की ओर संकेत किया और कहा, यह पुलिस वाला है दूसरा भी अरे यह तो पूरी जगह पुलिसकर्मियों से भरी पड़ी है। रादेक न ने जबाव दिया, "तुम उन्हें देख सकते हो, मैं नहीं! मैं पार्टी का सदस्य हूँ, मैं उन्हें नहीं देख सकता। पार्टी सदस्यों के लिए सोवियत रूस में कहीं भी पुलिस नहीं है।" ठीक उसी प्रकार आज भारत में सेकुलरवादी और समाजवादी शासक वर्ग उसी वैचारिक अन्धेपन की स्थिति में है। वह अपने आस पास उमड़ रही इस्लामी साम्राज्यवाद की हिंसक तरंगों को नहीं देख सकता, वैसा करना देखना पाप होगा और उसकी प्रगतिशील, उदार और विशाल हृदय छबि पर बड़ा धब्बा लगेगा।

हिंदुओं को ही भाषण पिलाना

महत्वपूर्ण बात यह है कि हर बार मुस्लिम सड़क पर दंगा करता है पर यह "राष्ट्रीय एकता" की फटकार तीब्र और अनियंत्रित हो जाती है। हमारा शासक वर्ग तुरंत हिंदू समाज को लंबे लंबे भाषण पिलाना शुरू कर देता है-- बेचारे अल्पसंख्यकों को मारने वाले साम्प्रदायिक बनना बंद करो; यह बड़े भाई वाला व्यवहार छोड़ो! अपने छोटे भाई की जान माल की रक्षा करो! मुसलमानों के धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों का आदर करो इत्यादि।

भारतीय चिति की भयंकर हानि

1947 के पहले सैकड़ों वर्षों तक हिंदू समाज संघर्ष करता रहा न कि गुलामी स्वीकार किया असली गुलाम तो भारत पंद्रह अगस्त 1947 से हुआ। देश विभाजन के पश्चात नेहरूवादी, सेकुलरिष्ट और बामी इतिहासकारों ने भारतीय स्वाभिमान को समाप्त करने का काम किया जो दिल्ली कभी भी भारतीय सत्ता का केंद्र नहीं था उसे सत्ता का केन्द्र पढ़ाया जाता रहा। जबकि भारतीय सत्ता का केंद्र हस्तिनापुर, राजगीर, पाटिलीपुत्र, उज्जैन, कन्नौज और मेवाड़ रहा भारत में सत्ता का केंद्र बदलता रहता था लेकिन नेहरूवादी इतिहासकारों ने दिल्ली को सत्ता का केंद्र पढ़ाने का काम किया। नेहरूवादियों को भारतीय स्वाभिमान पच नहीं पा रहा था इसलिए उन लोगों ने बप्पारावल, राणा सांगा, महाराणा कुम्भा, महाराणा हम्मीर, महाराणा प्रताप, क्षत्रपति शिवाजी महाराज, गुरु गोविंद सिंह, वीर छत्रसाल, बाजीराव पेशवा इत्यादि जिन्होने कभी भी मुसलमानों को स्वीकार नहीं किया बार बार पराजित किया लेकिन यह हमें पढ़ाया नहीं गया इतना ही नहीं महारानी लक्ष्मीबाई, वीर कुंवर सिंह, तात्या टोपे इत्यादि 1857को नकार दिया गया, इतना ही नहीं तो नेताजी सुभाषचंद्र बोस, अमर क्रांतिकारी भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल ऐसे अनगिनत क्रांतिकारियों को उदंड और आतंकी पढ़ाने का काम किया। जब हम विचार करने हैं तो ध्यान में आता है कि जितना नुकसान सैकड़ों वर्षों के संघर्ष में नहीं हुआ उससे कहीं अधिक सामाजिक धार्मिक और भारतीय स्वाभिमान का नुकसान पंद्रह अगस्त 1947 के बाद इन इतिहासकारों, नेहरूजी ने किया।


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