धर्म विशेष

भारतीय समाज में नारी---!

भारतीय ग्रंथों में नारी---!
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भारतीय मनीषियों, दार्शनिकों, चिंतकों ने स्त्रियों को पवित्र एवं श्रद्धा बताया है, हिन्दू संस्कृति में नारी के मातृ स्वरूप की वंदना की गई है, इस दृष्टि से ईश्वर के बाद "मां" को ही सर्वश्रेष्ठ स्थान दिया गया है, "वेंदो" व सभी ग्रंथों में पूजनीय बताया है, "अथर्ववेद" के 'पृथ्वीसूक्त' में भूमि को माता कहा गया है, "माता भूमि: पुत्रोहं पृथिव्या:" यह भूमि मेरी माता है हम इसके पुत्र हैं, उपनिषदों में 'मातृदेवो भव', 'पितृदेव भव' कहकर मां को प्रथम स्थान दिया है, महाभारत में 'गुरुणां चैव सर्वेषां माता परमको गुरुः' अर्थात गुरूजनों में माता को परम गुरु माना है।

यात्रा का अनुभव----!
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मैं गोरखपुर से सप्तक्रांति एक्सप्रेस से मुज़फ़्फ़रपुर जा रहा था अक्सर ट्रेन यात्रा में कुछ चर्चाएं चलती रहती हैं उसी प्रकार कुछ लोग महिलाओं के बारे में बात कर रहे थे विवाह करने का विषय था तभी एक मौलाना साहब बोल पड़े कि विवाह दूसरा तीसरा करने में क्या दिक्कत ? एक नौकर रखने में कितना कठिन है औरत तो बिना पैसे की नौकर है तभी वहां विबाद खड़ा हो गया क्योंकि हिंदू समाज महिलाओं को अर्धांगिनी मानता है वहीं मौलबी ने अपने इस्लाम में महिलाओं का स्थान बता दिया, मैं चुपचाप बैठा यह सुनकर विचार में डूब गया कि आधी आबादी बारे में इस्लाम का क्या विचार है "इस्लाम" में महिलाओं को जब चाहे तब 'तीन बार तलाक- तलाक' बोलकर उससे छुटकारा पा सकते हैं चार- चार विवाह कर सकते हैं, तलाक के पश्चात "हलाला" जैसा निर्मम आपराधिक परंपरा है जो मानवता के विरुद्ध है आज इस्लामिक जगत में इन सारी कुरीतियों को लेकर संघर्ष जारी है, दूसरी तरफ ईसाई जगत में 'बाइबिल' महिलाओं के अंदर 'आत्मा' नहीं होती जितनी महिलाएं हैं सभी "डायन हैं डायन" इस प्रकार 1470 से 1770 के बीच 70 लाख महिलाओं की हत्या की। ईसाई जगत में महिलाएं पूर्णतः पति के अधीन होती थीं, "सेंटपॉल" ने कहा ईसाईयत में 'काम' 'शैतान' है, 'पाप' है, 'अपराध' है क्योंकि शैतान के उकसाने पर ही 'आदम' ने 'हउवा' के कहने पर ही 'अदन' के उद्यान से फल खाया था, एक दूसरे दार्शनिक प्लेटों (428-347 ई.पू.) ने 90 लाख महिलाओं जो निर्दोष, सदाचारिणी, भावमयी श्रेष्ठ स्त्रियों को डायन, चुड़ैल घोषित कर जिंदा जलवाया, पानी में डुबोकर मारा, बीच से जिंदा चिरा गया, घोड़े में बांधकर सड़कों, गलियों में इस प्रकार घसीटा कि बंधी हुई स्त्रियां लहू- लुहान होकर दम तोड़ दें, स्त्रियों को आँख छोड़कर सभी अंग ढक कर रखना पड़ता था, इतना ही नहीं गोवा में 'सेंट जेवियर' ने अत्याचार की सीमा पार कर दी उसने जिन महिलाओं ने ईसाई बनने से इंकार किया उनकी आंखों की पलकें काट दी जिससे उनके बच्चों को तड़पा कर मारने पर आँख बंद न कर सकें उसने 70 हज़ार महिलाओं के हाथ काट लिया आज भी 'हथकटवा खंभा' "गोवा" में स्मारक वना खड़ा है, इन दोनों किताबी विचार में महिलाओं का क्या स्थान है यह हम समझ सकते हैं।

विभिन्न युगों में भारतीय नारी का स्थान--!

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ऋग्वैदिक काल में नारी का सर्बोत्तम स्थिति थी स्त्री पुरूष सखा भाव से रहते थे, 'ऋग्वेद' में गृह स्वामिनी अर्थात घर की मालिकिन कहा जाता था, शिक्षा का समान अधिकार था, महिलाओं को उपनय व चाहें तो आजीवन ब्रम्हचर्य जीवन बिता सकती थी, बहुत वड़ी संख्या में "मंत्रद्रष्टा" व 'ब्रम्हवादिनी' होती थी जैसे लोपामुद्रा, लोमहर्षनी, घोषा, अपाला, इंद्राणी, सिकता निवानरी इत्यादि, ध्यान में आता है कि वैदिक काल की अपेक्षा धीरे- धीरे यह स्थिति नहीं रह पायी, अपने देश में महिदास ऐतरेय, याज्ञवल्क्य, बृहस्पति इत्यादि ऋषि स्मृतिकार हुए हैं लेकिन "ऋषि मनु" ने समूचे राष्ट्र को एक व्यस्थित नियमवद्ध नैतिक मूल्यों पर आधारित जीवन जीने की पद्धति खड़ी कर दी, 'मनु' ने 'मनुस्मृति' में "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः" जहाँ मनु ने महिला पुरुषों के सामंजस्य की बात की वहीं कुछ कड़े नियम भी बनाये उन्होंने स्त्रीशक्ति के बारे में कहा बचपन में पिता, युवावस्था में पति और बृद्धा अवस्था में पुत्र की देखरेख में जीवन ब्यतीत करने चाहिए, मनु थोड़ा और कठोर होते हैं उन्होंने स्त्री पुरूष दोनों को अलग -अलग रहने की ब्यवस्था की यहाँ तक कि कितना भी विद्वान क्यों न होलेकिन वह व्यक्ति भी अकेले में अपनी माता, बहन व पुत्री से न मिले।

"यत्र नारी पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता"---!

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कहते हैं भारतीय संस्कृति  में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती का बहुत ही महत्व है यदि माना जाय तो "मां दुर्गा" समाज के रक्षार्थ व शक्ति की देवी, मां लक्ष्मी धन देवी और माता सरस्वती विद्या की देवी हैं सारे संसार के हिन्दू समाज में पूजनीय हैं, हिंदू वांग्मय में नारी का पुरुषों से कहीं अधिक सम्मान प्राप्त है वैदिक काल में लड़कियों को अपना वर चुनने का पूरा अधिकार था, ऐसी मान्यता थी उसी में 'सती सावित्री' एक ऐसी महिला है जिसने जंगल में रहने वाले निर्धन राजकुमार 'सत्यवान' को अपना वर चुना 'ऋषी नारद' उसके पिता को बताते हैं कि जिस वर का चयन सावित्री ने किया है वह कुछ दिन का ही मेहमान है जब पिता को यह पता चला तो राजा ने सावित्री को विविध प्रकार से समझाने का प्रयत्न किया लेकिन सावित्री ने यह कहकर मना कर दिया कि क्या जिसे मैं अपना वर चुनूँगी वह मरेगा नहीं राजा निरुत्तर हो गए विवाह हो गया सावित्री को यह पता था कि मेरे पति सत्यवान कब तक जिंदा रहने वाले हैं, वह दिन गिनती जा रही थी, वह भी दिन आ गया उसने अपने पति से कहा कि आज मैं लकड़ी काटने आपके साथ चलूँगी बहुत मना करने पर भी नहीं मानी, 'सत्यवान' पेड़ पर लकड़ी काटने चढ़ गए थोड़ी देर में अचानक उनका सिर दर्द करने लगा निचे उतर आये देखते देखते भगवान "यमराज" आये सत्यवान की आत्मा को लेकर जाने लगे, "सावित्री" उनके पीछे -पीछे चलने लगी थोड़ी दूर चलने पर यमराज ने कहा पुत्री तुम वापस चली जाओ सावित्री ने कहा कि मेरे पति को लेकर आप जा रहे हैं जहाँ मेरे पति जायेगे वहीं मेरा स्थान है यह कह उनसे यमराज से विभिन्न विषयों पर शास्त्रार्थ करते हुए चलती रही, वह नहीं मानी यमराज वरदान पर वरदान देते गए और अंत में वे सावित्री से पराजित होकर सत्यवान को वापस कर स्वर्गलोक को चले गए भारतीय नारी इस प्रकार अबला नहीं "सबला" होती है।

वनकन्या शकुंतला---!

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"सतयुग" में राजा दुष्यंत की एक कथा है इससे हम यह समझ सकते हैं कि भारतीय संस्कृति में नारियों का कितना बड़ा सम्मान था "राजा दुष्यंत" शिकार खेलने जंगल में जाते हैं उन्हें प्यास लगती है वे एक आश्रम की तरफ बढ़ते हैं वहां उन्हें एक वन कन्या मिलती है वे उससे रति क्रिया का आवेदन करते हैं वह कहती हैं कि जब पुरूष स्त्री मिलते हैं तो प्रेम होना स्वाभाविक ही है कोई बुराई भी नहीं है लेकिन बिना विवाह के संभोग सम्भव नहीं राजा गंदर्भ विवाह करते हैं फिर 'वनकन्या शकुंतला' कहती है कि इतना से सम्भव नहीं होगा संभोग का उद्देश्य क्या है पुत्र प्राप्त करना या शारीरिक सुख यदि शारीरिक सुख के लिए संभोग है तो यह सम्भव नहीं "राजा दुष्यंत" कहते हैं कि पुत्र प्राप्ति के लिए फिर भी "शकुंतला" तैयार नहीं होती वह कहती है कि कुछ साक्ष्य तो चाहिए राजा अपनी 'राज्य मुद्रिका' उसे निकाल कर देते हैं, फिर वह अपने बेटे के राज्याधिकार की बात, कि मेरा पुत्र ही आपका उत्तराधिकारी होगा, इसी दुष्यंत और शकुंतला से "पुत्र भरत" की उत्पत्ति होती है जिसके नाम पर इस देश का नाम "भारत" पड़ा, "राजा दुष्यंत" 'चक्रवर्ती ही नहीं "धरती" के सम्राट' थे वे चाहते तो कुछ भी कर सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया क्योंकि भारतीय जीवन मूल्यों में महिलाओं का सम्मान-! महिला अबला नहीं सबला।

त्रेता युगीन नारी------!
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भारतीय संस्कृति में नारी मां है, सहधर्मिणी यानी पत्नी है, बहन है और बेटी भी है जहाँ वैदिक कालीन महिलाओं ने मानव जीवन किस प्रकार हो उसे कैसा होना चाहिए इसपर विचार किया वहीं देखने में आता है बहुत सारी महिलाएं वैदिक मंत्र द्रष्टा हैं, त्रेतायुग युग में नारी कमजोर नहीं हुई मुझे लगता है राज्याधिकार प्राप्त किया, जब "भगवान श्रीराम" वनवास के लिए तैयार है "राजा दशरथ" से कहते हैं कि हे पिता जी यदि आप मुझे इतना ही प्रेम करते हैं तो 'मेरी माँ कैकेयी' को क्षमा कर दें, जब वे 'बालि' का वध करते हैं तो कहते हैं कि हे सुग्रीव राजा तो आप बनेगें लेकिन 'राज्य महीसी' तो "तारा" (राजाबालि की रानी) ही होगी फिर आगे लंका में भगवान ने यही बात "राक्षसराज विभीषण" से कहते हैं कि राजा तो आप होगें लेकिन राज्य महिसी "मंदोदरी" ही होगी, इस प्रकार विभिन्न युगों में भारतीय नारी कभी कमजोर नहीं वह अबला नहीं वह ताकतवर राज्याधिकारी है।

महाभारत में नारी----!
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नारी जननी है वह पालक है सृजन करता है, "हस्तिनापुर" के चक्रवर्ती सम्राट "राजा शांतुन" को एक "गंगा" नाम की लड़की से संबंध आ गया उससे उन्होंने विवाह किया वह भी कहती है कि मैं क़ुछ भी करूँ आप मुझे कुछ कहेंगे नहीं महाभारतकार लिखते हैं कि गंगा ने अपने सात पुत्रों को "गंगाजी" में फेंक दिया 'शांतुन' कुछ बोल नहीं सके आखिर क्यों ? और आठवे पुत्र पर राजा वर्दाश्त नहीं कर सके फिर टोका 'महाभारत' कार कहते हैं कि वह 'गंगा' वापस चली गयी, यदि "किताबी मत" होता तो--? इन्हीं "सम्राट शांतुन" के राज्य में एक मल्लाह की लड़की "सत्यवती" पर मन आ गया वे उससे विवाह करना चाहते थे हम समझ सकते हैं कि उस समय तक छुवाछुत भेदभाव नहीं था, नारी कितना महत्वपूर्ण स्थान पर है कि सत्यवती शर्त रखती है कि मेरा ही पुत्र आपका उत्तराधिकारी होगा इतना ही नहीं राजा के बड़े लड़के "देवब्रत" (भीष्म पितामह) को प्रतिज्ञा करनी पड़ती है कि वे आजीवन ब्रम्हचारी रहेगें, भारतीय वांग्मय में महिलाओं को इस प्रकार महत्व है जो विश्व में कहीं दिखाई नहीं देता इसी युग में आध्यात्मिक पताका फहराने वाली जिसका ब्राह्मण ग्रंथों में उल्लेख है ऐसी नारी जिसने ऋषि याज्ञवल्क्य को चुनौती देती दिखाई दे रही है महान 'अध्यात्मवेत्ता गार्गी'।

वर्तमान युग में नारी----!
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भारतीय संस्कृति में नित्य नूतन चिंतन की परंपरा रही है कभी आध्यात्मिक, कभी 'मंत्रद्रष्टा' तो कभी राज्याधिकार सम्पन्न तो हम मध्यकाल में योद्धा के रूप में भी देखते हैं, जहाँ महाभारत के समाप्त होने के पश्चात सारे राज्य व्यवस्था को सम्हालने का कार्य द्रोपदी देख रही है, जनक के दरबार में गार्गी संबाद कर रही है वहीं "श्री भारती" "आदि शंकराचार्य" को चुनौती देती दिखाई दे रही है, 'भारतवर्ष' पर विधर्मी परकियों के हमलों में सीना चौड़ा कर खड़ी है जहां वह 'महारानी मीरा' के रूप में अध्यात्म को जगा रही है वहीं "रानी दुर्गावती" वनकर अकबर को चुनौती दे रही है, 'महारानी लक्ष्मीबाई' के रूप में अंग्रेजों के छक्के छुड़ा रही है, आज़ादी के पश्चात भारत में राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री बनकर देश का नेतृत्व कर रही है तो इस समय रक्षा मंत्री, विदेशी मंत्री, युवा संसाधन विकाश मंत्री, मानव संसाधन मंत्री जैसे दायित्व ही नहीं सेना तथा प्रशासनिक अधिकारियों के रूप में दिखाई दे रही हैं।

भारत में चिंतन पर चिंतन---!
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बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय (1838-1894) ने अपने राष्ट्रीय पत्र 'बंगदर्शन' तथा अपने 14 प्रसिद्ध उपन्यासों द्वारा नारी -यातनाओं तथा नारी- संघर्षों का वर्णन किया है, 'ऋषि दयानंद सरस्वती' को 'शंकराचार्य' के बाद भारत में सांस्कृतिक जागरण का प्रथम संदेशवाहक माना जाता है, 'आर्यसमाज' ने भारतीय संस्कृति की जड़े वेदों, उपनिषदों तथा 'ब्राह्मण ग्रन्थों' में देखा, आर्यसमाज देश आज़ादी, समाज सुधार के लिए शक्तिशाली रूप में उभर कर आगे आया, आर्यसमाज ने बाल -विवाह का कटु विरोध किया, विधवा विवाह का समर्थन किया, विवाह व अन्य अवसर पर कम खर्च करने का संदेश दिया, महिलाओं में पर्दा प्रथा, कन्या हत्या को शास्त्र बिरोधी बताया, आर्यसमाज पहली संस्था थी जिसने विधवाओं के लिए घर बनाने का काम किया, आर्यसमाज ने स्थान स्थान पर कन्या पाठशाला, कन्या महाविद्यालय, गुरूकुल खोलने का काम किया इसमे स्वामी दयानंद सरस्वती के योग्य अनुयायी स्वामी श्रद्धानंद, लाला हंसराज, लाला लाजपतराय तथा पं. गुरूदत्त ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
        आज समय की आवश्यकता है कि सारे विश्व में भारतीय नारी आगे आये और हज़ारों -लाखों वर्षों की विकास प्रक्रिया व चिंतन धारा भारतीय जीवन- मूल्यों के आधार पर जीवन मूल्यों की रक्षा करे पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में न वहे, अपने चिंतन के अनुसार आवश्यक परिवर्तन करते हुए पुरानी नीव नए निर्माण की वैज्ञानिक दृष्टिकोण को लेकर आगे बढ़ने की आवश्यकता है।
                (सन्दर्भ ग्रन्थ- ऋग्वेद, अथर्ववेद, सतपथब्राह्मण, रामायण -ऋषि बाल्मीकि , महाभारत -वेद्ब्यास , भारतीय नारी अतीत से वर्तमान - डॉ सतीशचन्द्र मित्तल ) 

2 टिप्‍पणियां

Anita saini ने कहा…

जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (13-04-2019) को " बैशाखी की धूम " (चर्चा अंक-3304) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
- अनीता सैनी

मन की वीणा ने कहा…

विस्तृत और व्याख्यात्मक लेख समालोचक दृष्टि सुंदर प्रस्तुति।