धरा के प्रथम कवि ''महर्षि वाल्मीकि''


 धरा के प्रथम कबि

महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित "रामायण" पढ़ने के पश्चात बाल्मीकी का जीवन दर्शन को समझा जा सकता है कि वे कितने दूरदर्शी थे! उन्हें आदि कबि भी कहा जाता है और यह सत्य भी समझ में आता है। वेदों का प्रादुर्भाव "एक अरब छानबे करोड़ आठ लाख वर्ष" पूर्व "भगवान ब्रह्माजी" के कण्ठ में आया ब्रह्मा जी ने सरस्वती नदी के किनारे प्रथम गुरुकुल खोलकर ऋषियों को वेदों का ज्ञान दिया। फिर ऋषियों ने सामान्य समाज को वेदों का ज्ञान दिया जो हमारे जीवन में रच बस गया। कहते हैं कि पृथ्वी पर मानव द्वारा प्रथम ग्रंथ मनुस्मृति है वह भी काब्य रचना है जिसे मानव जीवन का प्रथम संवैधानिक ग्रंथ माना जाता है। इसलिए यह कहना कठिन है कि महर्षि वाल्मीकि प्रथम कबि थे! लेकिन जनसमान्य में इस ऋषी को प्रथम कबि इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि इसके पहले जो भी ग्रंथ आये वे वैदिक ग्रंथ थे इसलिए भारतीय समाज में उसे मानव द्वारा लिखा नहीं बल्कि अपौरुषेय माना जाता है। मनुस्मृति भी चूंकि "भगवान मनु" द्वारा रचित है इसलिए इसे भी ईश्वर प्रदत्त माना जाता है, इसी कारण बाल्मीकी प्रथम कबि माने जाते हैं।

जीवन दर्शन

कुछ ग्रंथों में रत्नाकर को प्रचेता का पुत्र माना गया है, प्रचेता ऋषि हैं तो हो सकता है कि किसी तरह का कोई संपर्क आया हो लेकिन रत्नाकर के पिता किसान थे, उनकी माता का नाम "पर्शणी" था, यह भी संभव है कि उस समय कृषि का प्रचलन कम था, क्योंकि "राजा जनक" का वही काल है जब वे कृषि करना चाहिए ऐसा स्वयं हल चलाकर अपनी जानता को प्रेरित कर रहे थे। लोग अधिक तर वनों में रहते थे फल-फूल सेवन करते थे लेकिन इतना सत्य है कि रत्नाकर के पिता गरीब किसान थे और रत्नाकर राज्यकर्मी! हां यह हो सकता है कि वाल्मीकि के पिता "प्रचेता ऋषि" रहे हों ऋषि परंपरा में शिक्षा दीक्षा देने अपने गुरुकुल में रखने अपना सबकुछ उनके अंदर उतार देनेके कारण जैसे रामकृष्ण परमहंस ने अपना सबकुछ स्वामी विवेकानंद को दिया, स्वामी विरजानंद ने दयानंद सरस्वती को दिया हो सकता है कुछ इस प्रकार होने के कारण वे प्रचेता पुत्र कहलाये। रत्नाकर (महर्षि वाल्मीकि) का जन्म अश्विन पूर्णिमा के दिन हुआ था, पिता ऋषि प्रेचेता और "माँ पर्शणी" था। वर्ष की ठीक प्रकार से गणना करना हम जैसे साधारण मनुष्य के लिए संभव नहीं हो सकता। यदि हम भारतीय कालगणना के हिसाब से जोड़ते हैं तो-- कलियुग चार लाख बत्तीस हज़ार वर्ष द्वापरयुग आठ लाख चौसठ वर्ष और भगवान श्री राम का प्रादुर्भाव त्रेता युग के अंतिम चरण में हुआ था इस प्रकार यदि हम गणना करते हैं तो आठ लाख उनहत्तर हज़ार वर्ष होता है, तो ऋषि वाल्मीकि का समय कमसे कम नौ लाख वर्ष पहले माना जा सकता है। वे भारद्वाज गोत्री हैं तो ब्राह्मण रहे होंगे, इनके बारे में कई मतभेद है क्योंकि बौद्ध साहित्य में कई प्रकार के क्षेपक डाला गया है वे महर्षि वाल्मीकि जी को डाकू-लुटेरा बताने में लगे हैं और उनकी विरासत लिए हुए बामपंथी एक कदम और आगे चलकर भेद खड़ा कर रहे हैं। उस समय वास्तविकता यह है कि उनका बचपन का नाम रत्नाकर था वे उस राजा के सेना में सैनिक थे जिस राज्य में रहते थे, राजा अनाचारी था इसलिए उन्होंने राज्य से विद्रोह किया था। और वे लुटेरा नहीं थे बल्कि राजा के संपत्ति को लूटकर गरीबों को सहायता करने का काम किया करते थे।

नारद मुनि से भेंट

कहते हैं कि वे सरदार थे किसी साहूकार, किसी नागरिक को नुकसान नहीं पहुचाते थे। एक दिन उसी जंगल के रास्ते से नारद मुनि जा रहे थे जंगल के बाहर गांव वालों ने उन्हें रोका मुनि जी रात्रि हो गई है आप यहीं हमारे गांव में विश्राम कर लें। जंगल में डाकू रहते हैं जो आपको नुकसान पहुंचा सकते हैं लेकिन नारद मुनि नहीं माने उन्होंने कहा क्या लेगा मुझसे क्या है मेरे पास ? वे अपने रास्ते पर बढ़ते गए तभी बीच जंगल में उनकी भेंट राज विद्रोही रत्नाकर से हुई, रत्नाकर उन्हें राजा का खुफिया विभाग का ब्यक्ति समझा और पकड़ लिया। नारद मुनि घबड़ाये नहीं उन्होंने राज्य से विद्रोह करना अच्छा नहीं है यह समझाते रहे और कहा कि यदि आपके पिता जी अथवा परिवार के लोग हों तो पूछ कर आइये की इसका दंड कौन भोगेगा ? रत्नाकर ने अपने कुछ साथियों को सौंपकर अपने घर चले गए जब अपने पिताजी से नारद मुनि के बारे में बताया तो पिताजी ने नाराज होकर कहा तुम पाप के भागी बनोगे किसको पकड़ लिया है वे ऋषि हैं मंत्र द्रष्टा हैं। रत्नाकर  को सब बात समझ में आ गई और वे सीधे नारद मुनि के पास पहुँचे क्षमा याचना करने लगे, अपने मुक्ति के मार्ग के बारे में पूछने लगे कहते हैं कि नारद मुनि ने उन्हें दीक्षा दिया और वे रत्नाकर से महर्षि वाल्मीकि बन गए।

रत्नाकर से वाल्मीकि

महर्षि नारद मुनि ने रत्नाकर को दीक्षा दी और रत्नाकर तपस्या में लीन हो गए कहते हैं कि वे साधना करते-करते इतने समाधिस्थ हो गए कि कहते हैं कि उनका शरीर दीमक ने ढक लिया था ऐसा लगता था कि वे निष्प्राण हो गए हैं। कहते हैं कि इससे पहले कोई भी ऋषि महर्षि इतनी कठोर तपस्या नहीं किया था जितना रत्नाकर ने किया। कहते हैं कि भगवान ब्रम्हा जी का आसन हिलने लगाऔर ब्याकुल ब्रम्हा जी रत्नाकर के पास पहुँचे, कमंडल से जल निकालकर रत्नाकर के शरीर पर छिड़का शरीर में जान आ गई दीमक का आवरण समाप्त हो गया, ब्रम्हा जी ने रत्नाकर को वाल्मीकि कहकर संबोधित किया इसलिए वाल्मीकि जी को ब्रम्हाजी का भी पुत्र माना जाता है। और अबसे उन्हें महर्षि वाल्मीकि के नाम से पुकारा जाता है।

रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि

अब वाल्मीकि जंगल में तपस्या करने लगे उनकी ख्याति सारे आर्यावर्त में फैलने लगी, उन्होंने अन्य ऋषियों के समान गुरुकुल और आश्रमों का निर्माण किया। आज भी समाज में बड़ा भ्रम की स्थिति है क्योंकि वाल्मीकि आश्रम कई स्थानों पर पाया जाता है। बिहार के और नेपाल के लोग यह मानते हैं कि बिहार के पश्चिमी चंपारण और नेपाल के बॉर्डर पर नारायणी नदी के किनारे वाल्मीकि आश्रम है लेकिन उत्तर प्रदेश में लोग कहते हैं कि प्रयागराज और काशी के बीच गोपीगंज के पास गंगाजी के किनारे पर वाल्मीकि आश्रम है ऐसे ही मध्य प्रदेश व अन्य स्थान पर आश्रम बताया जाता है और कानपुर के पास गंगाजी के किनारे बिठूर में भी वाल्मीकि आश्रम है। तो इसमें कुछ भी अतिसंयोक्ति नहीं है क्योंकि उस समय ऋषियों के बहुत सारे शिक्षण संस्थान यानी गुरुकुल हुआ करता था और राजा-महाराजा तथा सामान्य लोग अपने बच्चों को वेदों की शिक्षा हेतु गुरुकुल भेजा करते थे। उस समय की शिक्षा ब्यवस्था ऋषियों, महर्षियों पर निर्भर थी वे सारे समाज को शिक्षित करने का काम किया करते थे जिसमें कोई भेद भाव नहीं होता था। उनकी विस्वस्नीयता ऐसी थी कि सभी क्षात्र वहीं गुरुकुलों के छात्रावासों में रहते थे और शिक्षा ग्रहण करते थे। उस समय वाल्मीकि ऋषि से बढ़कर किसी भी ऋषि का महत्व नहीं था क्योंकि वे किसी के दरबारी, गुरु नहीं थे वे स्वतंत्र महर्षि थे जिन्हें महर्षि वशिष्ठ और ऋषि विश्वामित्र दोनों ही बड़ा सम्मान देते हैं। विस्वास्नीयता कैसी है भगवान श्री राम कहते हैं कि जब महर्षि वाल्मीकि "सीता" को पवित्र कह रहे हैं तो इसमें शंका की गुंजाइश कहाँ है ?

बाल्मीकि के राम

महर्षि वाल्मीकि के राम ने तो शबरी के जूठे बेर खाये, महर्षि वाल्मीकि के राम किसी तपस्वी शम्भुक की हत्या नहीं कर सकते, वाल्मीकि के राम ने मंदोदरी को राजमहिषी और महारानी तारा की बालि के वध के पश्चात भी किष्किंधा की पटरानी बनाया! वाल्मीकि के राम अपनी गर्भवती पत्नी को जंगल में नहीं छोड़ सकते। क्योकि जब वे प्रथम रात्रि सीताजी से मिलते हैं तो कहते है कि हे सीते आज से पहले मैंने किसी भी स्त्री को भर आख देखा नहीं है तुम्हारे पश्चात् किसी को देखूगा भी नहीं! ऐसे राम किसी के कहने पर कैसे अपनी प्राण प्रिय धर्म पत्नी को जंगल में छोड़ सकते हैं ? राम का जीवन तो मानव जीवन के लिए आदर्श है, वास्तविकता यह है कि ये सब बाद में क्षेपक डाला गया है। और यदि यह कहा जाए कि उत्तर कांड ही क्षेपक है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगा।

संस्कृत भाषा में प्रथम श्लोक 

ब्रम्हा जी द्वारा दी गई उपाधि यानी रत्नाकर से वाल्मीकि हो गए और आश्रम बनाकर रहने लगे, एक दिन की बात है! आश्रम में एक शिकारी घूमता हुआ आया और ऊंचे बृक्ष पर बैठे एक क्रौंच के जोड़े को देखकर उस पर तीर चला दिया उस तीर से जोड़े में से एक पक्षी गिर कर तड़पने लगा। वाल्मीकि ने उसे उठाया तब तक वह मर चुका था, इसको देख वे क्षुब्ध होकर विह्वल हो उठे और उस शिकारी को शाप दिया तो उनके मुख से एक श्लोक निकला ..! 

"मां निषाद प्रतिष्ठा त्वमगम: शाश्वती: समा:।

यत्क्रौचमिथुनादेकम अवधी: कम्मोहितम।।"

 जो उनके द्वारा यह पहला श्लोक था लेकिन वह वैदिक श्लोक न होकर लौकिक छन्द था। बस इसी कारण वे धरा के प्रथम कवि कहलाये। जब श्री राम, लक्ष्मण और सीता जी को वनवास हुआ था तो श्री राम अपने भाई और पत्नी सीता जी के साथ उनके आश्रम में ठहरे हुए थे।

बौद्धों द्वारा क्षेपक

महर्षि वाल्मीकि ने अपने महान ग्रंथ रामायण में कुल 6680 श्लोकों की रचना की है ऐसा पुराने ग्रंथ वाल्मीकि रामायण में मिलता है लेकिन इस समय वाल्मीकि रामायण में कुल श्लोकों की संख्या 24000 से अधिक पाई जाती है। अब यह क्या है वास्तविकता यह है कि बौद्ध भिक्षुओं ने भगवान बुद्ध को श्रेष्ठ बताने के लिए रामायण में क्षेपक डाला। बौद्धों ने हिंदू धर्म विरोधी एक पुस्तक लिखी जिसमे बहुत सारी भ्रांतियां डाली गई जैसे ब्रम्हाजी का अपने पुत्री सरस्वती के सम्वन्ध में, सीता जी को वनवास भेजने तथा महर्षि वाल्मीकि को निम्न जाति का बताना यह जबदस्त साजिश के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। जबकि हिंदू समाज में छुवा छूत, भेद भाव की अवधारणा है ही नहीं यहाँ तो "चातुर्वर्ण्य मयासृष्टा गुण कर्म विभागशः" की अवधारणा है इस समाज में कोई ऊंचा-नीचा नहीं हो सकता यह सब एक साजिश का हिस्सा है। आज भी वाल्मीकि समाज के लोगों को निम्न माना जाता है लेकिन क्या वे निम्न हैं तो नहीं! वास्तविकता यह है कि जिसे हम निम्न जाति का समझ रहे हैं वे हिन्दू धर्म के रक्षक थे इसीलिए साजिश के तहत उन्हे निम्न किया उस समय बौद्धों का काल था। इसमें सम्राट अशोक की बड़ी भूमिका थी उसने बहुत सारे हिंदू ग्रंथों को नष्ट करने का काम किया था।

वाल्मीकि रामायण ने धर्म को बचाया

महर्षि वाल्मीकि ने कहीं यह नहीं लिखा कि तपस्वी शम्भूक का वध श्री राम ने किया था उन्होंने यह नहीं लिखा कि अपनी गर्भवती पत्नी सीता जी को श्री राम ने जंगल भेजा, उन्होंने यह भी नहीं लिखा कि लव-कुश का युद्ध उनके पिता श्री राम से हुआ था। महर्षि वाल्मीकि ने एक अमर काब्य की रचना की वे त्रिकाल दर्शी थे वे भगवान श्री राम के समकालीन थे इसलिए उन्होंने यह रामायण जैसा ग्रंथ लिखा। राम का आदर्श जीवन कैसा है तो भगवान मनु द्वारा रचित अमर रचना मनुस्मृति में जो वर्णन मनु ने किया है श्री राम का जीवन वैसा ही है इसलिए रामायण की रचना आवस्यक हो जाती है। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण लिखकर हिंदू समाज पर बड़ा उपकार किया है विश्व का सारा का सारा हिंदू उन्हें अपना आदर्श मानता है और वैसा जीवन जीने का प्रयास करता है। यही महर्षि वाल्मीकि की विशेषता है।

ऐतिहासिक दृष्टि

वाल्मीकि रामायण का वर्णन आधुनिक ऐतिहासिक दृष्टि से नहीं है, इसलिए पश्चिमी देशों में इसकी ऐतिहासिकता पर संदेह करते हैं। किंतु वाल्मीकि का संसार हजार दो हजार लाख दो लाख वर्ष का नहीं है यह तो भारतीय काल गणना के अनुसार कमसे कम नौ लाख वर्ष पुराना माना जाता है। और उस समय विश्व में लोगों को कुछ जानकारी नहीं थी, लेकिन सरे ज्ञान का उद्भव भारत में हुआ यहाँ के ऋषियों ने इस ज्ञान को देश देशांतर में फैलाया ! हां इतना सत्य है कि सारा विश्व सनातन धर्म का मतावलम्बी था।

           धर्मार्थकाममोक्षं मुपदेशसमन्वितं   ।

           पूर्ववृत्तं कथायुक्तमितिह्रास प्रचक्षते।।


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