मा लक्ष्मण श्री कृष्णा भिड़े शत शत वंदन--!
मा भिड़े जी विश्व विभाग के प्रथम प्रचारक थे वे पानी वाली जहाज से मारिषस जा रहे थे जहाज में कुछ ओर स्वयंसेवक थे लेकिन मा भिड़े जी का कोई परिचय नहीं था। उन्होंने जहाज के ऊपर घूमने गये थे कि उनके मन में आया कि क्यों न ध्वज लगाकर प्रार्थना कर ली जाय जैसे ही उन्होंने ध्वज लगाया तुरंत तीन -चार लोग ओर आ गए फिर क्या था प्रार्थना हुई सबसे परिचय हुआ और मरीशस में संघ की नीव पड़ गई। लेकिन विश्व विभाग में जो प्रथम शाखा शुरू हुई वह पानी वाली जहाज में शुरू हुई ओर यह यात्रा कई दिन तक रही वे सारे के सारे कार्यकर्ता वन गए।
ओर नेपाल
उन्होंने जब राजा महेंद्र का काल था काम शुरू किया संगठन का नाम था मातृभूमि सेवक संघ वर्मा के एक़ प्रशिक्षित स्वयंसेवक जो नेपाली मूल के थे उन्हें लाकर काम शुरू किया वे नेपाल के प्रथम संघचालक थे उस समय नेपाल में प्रत्यक्ष शाखा नहीं लग सकी लेकिन सघ का रजिस्टेशन हो गया था। कई स्थानों पर विद्यालय भी शुरू हो गया जो आज भी चल रहा है लेकिन दुर्भाग्य वस आज वे विद्यालय अपने पास नहीं है। मा भिड़े जी कई बार यात्रा करते तो कम पैसा लगे वे ट्रक में पीछे बैठ जाते थे। वे कई वर्षो तक नेपाल में रहे मुझे जानकारी है वे दस वर्षो तक रहे आज भी नेपाल में उनके बनाये कार्यकर्त्ता मिलते हैं। उनकी स्मृति नेपाल में यादगार के रूप में है।
संघे शक्ति कलियुगे।
सादगी की प्रतिमूर्ति लक्ष्मण श्रीकृष्ण भिड़े जी को उनके पुण्य तिथि पर कृतज्ञ राष्ट्र का कोटि कोटि नमन।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य को विश्वव्यापी रूप देने में अप्रतिम भूमिका निभाने वाले श्री लक्ष्मण श्रीकृष्ण भिड़े का जन्म अकोला (महाराष्ट्र) में 1918 में हुआ था। उनके पिता श्री श्रीकृष्ण भिड़े सार्वजनिक निर्माण विभाग में कार्यरत थे। छात्र जीवन से ही उनमें सेवाभाव कूट-कूट कर भरा था। 1932-33 में जब चन्द्रपुर में भयानक बाढ़ आयी, तो अपनी जान पर खेलकर उन्होंने अनेक परिवारों की रक्षा की। एक बार माँ को बिच्छू के काटने पर उन्होंने तुरन्त अपना जनेऊ माँ के पैर में बाँध दिया। इससे रक्त का प्रवाह बन्द हो गया और माँ की जान बच गयी।
चन्द्रपुर में उनका सम्पर्क संघ से हुआ। वे बाबासाहब आप्टे से बहुत प्रभावित थे। 1941 में वे प्रचारक बने तथा 1942 में उन्हें लखनऊ भेज दिया गया। 1942 से 57 तक उन्होंने उत्तर प्रदेश में अनेक स्थानों एवं दायित्वों पर रहते हुए कार्य किया। 1957 में उन्हें कीनिया भेजा गया। 1961 में वे फिर उत्तर प्रदेश में आ गये। 1973 में उन्हें विश्व विभाग का कार्य दिया गया। इसके बाद बीस साल तक उन्होंने उन देशों का भ्रमण किया, जहाँ हिन्दू रहते हैं। विदेशों में हिन्दू हित एवं भारत हित में उन्होंने अनेक संस्थाएँ बनायीं। इनमें 1978 में स्थापित ‘फ्रेंडस ऑफ इंडिया सोसायटी इंटरनेशनल’ प्रमुख है। 1990 में जब भारतीय दूतावास ही विदेशों में भारतीय जनता पार्टी की छवि धूमिल कर रहा था, तो उन्होंने ‘ओवरसीज फ्रेंडस ऑफ बी.जे.पी.’ का गठन कर कांग्रेसी षड्यन्त्र को विफल किया। जब मॉरीशस के चुनाव में गुटबाजी के कारण हिन्दुओं की दुर्दशा होने लगी, तो उन्होंने सबको बैठाकर समझौता कराया। इससे फिर से हिन्दू वहाँ विजयी हुए।
रहन सहन
शरीर से बहुत दुबले भिड़े जी सादगी और सरलता की प्रतिमूर्ति थे। आवश्यकताएं कम होने के कारण उनका खर्चा भी बहुत कम होता था। विदेश प्रवास में कार्यकर्ता जबरन उनकी जेब में कुछ डॉलर डाल देते थे; पर लौटने पर वह वैसे ही रखे मिलते थे। वैश्विक प्रवास में ठण्डे देशों में वे कोट-पैंट पहन लेते थे; पर भारत में सदा वे धोती-कुर्ते में ही नजर आते थे। 1992 में वे दीनदयाल शोध संस्थान के अध्यक्ष बने। दिल्ली में उसका केन्द्रीय कार्यालय है। वहाँ अपने कक्ष में लगे वातानुकूलन यन्त्र (ए.सी.) को उन्होंने कभी नहीं खोला। उस कक्ष की आल्मारियाँ सदा खाली रहीं, उनमें ताला भी नहीं लगता था। क्योंकि उन पर निजी सामान कुछ विशेष था ही नहीं। अलग-अलग जलवायु और खानपान वाले देशों में निरन्तर प्रवास के कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया था। अंतिम कुछ महीनों में उन्हें गले सम्बन्धी अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो गयीं। इस कारण उनकी वाणी चली गयी। बहुत कठिनाई से कुछ तरल पदार्थ उनके गले से नीचे उतरते थे। फिर भी वे सबसे प्रसन्नता से मिलते थे तथा स्लेट पर लिखकर वार्तालाप करते थे।
अंतिम बिदाई
दिसम्बर 2000 में मुम्बई में ‘विश्व संघ शिविर’ हुआ। खराब स्वास्थ्य के बावजूद वे वहाँ गये। विश्व भर के हजारों परिवारों में उन्हें बाबा, नाना, काका जैसा प्रेम और आदर मिलता था। यद्यपि वे बोल नहीं सकते थे; पर सबसे मिलकर वे बहुत प्रसन्न हुए। वहाँ सबके नाम लिखा उनका एक मार्मिक पत्र पढ़ा गया, जिसमें उन्होंने सबसे विदा माँगी थी। उन्होंने सन्त तुकाराम के शब्दों को दोहराया - आमी जातो आपुल्या गावा, आमुचा राम-राम ध्यावा। पत्र पढ़ और सुनकर सबकी आँखें भीग गयीं। शिविर समाप्ति के एक सप्ताह बाद सात जनवरी, 2001 को उन्होंने सचमुच ही सबसे विदा ले ली।

1 टिप्पणियाँ
प्रेरणादायक व्यक्तित्व
जवाब देंहटाएंकोटि कोटि प्रणाम 🙏
विनम्र श्रद्धांजलि।
आपका भी व्यक्तित्व बहुत ही सुन्दर आकर्षक है,
भगवान से आपके जल्द पूर्ण स्वस्थ होने की कामना करते रहता हूं 😔💕🚩🙏
भारत माता की जय