धर्म विशेष

विदेशी षडयंत्र, राजनेताओं के स्वार्थ का शिकार ''नेपाल''

       
नेपाल विदेशी षड्यंत्र तथा राजनेताओं के स्वार्थ का शिकार---!

         नेपाल सार्वभौम सत्ता संपन्न देश भारत का सीमा देश है वास्तविकता यह है की भारत- नेपाल एक राष्ट्र दो देश है दोनों देशों की संस्कृति बोली भाषा धर्म सब कुछ एक है दोनों की मानवीय मान्यताएं भी एक हैं आज के हज़ारों वर्ष जब सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य चक्रवर्ती सम्राट हुआ करते थे उस समय यह भाग आर्यावर्त का एक अंग हुआ करता था पुराणों के अनुसार हिमालय भारत के बीचो-बीच स्थित था यानि तिब्बत कभी भारत का अंग हुआ करता था भारत के प्रख्यात समाजवादी नेता डॉ राममनोहर लोहिया कहते थे कोई उपासक अपने भगवन की कल्पना जहाँ वह रहता है वहीं का करता है इस नाते यदि हिन्दू समाज भगवन शंकर का निवास स्थान ''कैलाश-मानसरोवर'' मानता है तो इससे यह सिद्ध होता है की तिब्बत भारत का हिस्सा हुआ करता था, नेपाल के प्रथम शासक अथवा संस्थापक भगवन कृष्णा थे उन्होंने काठमांडू की घाटी को रहने लायक बनाया भगवान पशुपतिनाथ की स्थापना भी उन्ही ने किया, आज के २५०० वर्ष पूर्व आदि जगतगुरु शंकराचार्य ने पुनर्प्रतिष्ठा कर पूजा -अर्चना की ब्यवस्था भी किया जिसमे दक्षिण से पुजारी आया जनकपुर से मैथिल ब्राह्मण अन्य पूजा के लिए लाए गए जो आज भी वहां मौजूद हैं। 
          नेपाल व भारत में जबसे चक्रवर्ती सम्राट की ब्यवस्था समाप्त हुई बिभिन्न राजे-रजवाड़े खड़े हो गए नेपाल में भी कोई ४६ रियासत हो गई मेवाड़ महारानी पद्मनी के जौहर के समय रावल कुम्भकरण ने नेपाल में राजसत्ता स्थापित की फिर कभी लिक्षवि वंश कभी वर्मन वंश का शासन हुआ और गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद से महाराजा पृथ्बी नारायण शाह ने पुनः नेपाल का एकीकरण किया तब से आज तक इस राजवंश का शासन चल रहा है, १८१५-१६ में 'ब्रिटिश भारत' और नेपाल में एक संधि हुई जिसमे वीरगंज से पूरब का भाग (बारा, पर्सा, रौतहट, धनुषा, सप्तरी, सिराहा जलेसर मोरङ) नेपाल को दिया और दार्जलिंग का भाग भारत में मिला लिया जिसे हम सुगौली संधि भी कहते हैं, १८४६ में अंग्रेजों के षड़यंत्र से नेपाल के राजा को काशी तीर्थयात्रा के दौरान गिरफ्तार कर लिया गया और उसी समय जंगबहादुर राणा श्री तीन की उपाधि ग्रहणकर प्रधानमंत्री और सेनापति स्वयं नियुक्त हो गए राजा स्वाभाविक रूप से गुलाम हो गया सब कुछ राणाओं की ही चलती थी, १८५७ से पहले अथवा उसी समय भारत के पंजाब में जलियावाला कांड हुआ जिसमे हज़ारों भारत आज़ादी के क्रन्तिकारी मारे गए, लखनऊ लूट हुई यह सब नेपाली शाही सेना ने किआ जिसका नेतृत्व जंगबहादुर राणा ने किया था अंग्रेज प्रसंद होकर 'बांके, बर्दिया, कंचनपुर, कैलाली' को नेपाल को दे दिया जिसे आज भी नया मुलुक कहते हैं, जब भारत आज़ाद हुआ तब १९५० में भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के हस्ताक्षेप से एक संधि के तहत राजवंश पुनः सत्ता में आया और महाराजा त्रिभुवन गद्दी पर बैठे नेपाल में चुनाव हुवा जिसमे वी.पी कोइराला पूर्ण बहुमत के साथ प्रधानमंत्री हुए उनके भारत से अच्छे सम्बन्ध थे यह बात राजा महेंद्र को अखरती थी उन्होंने योजनावद्ध तरीके से नेपाली कम्युनिष्ट पार्टी की स्थापना करायी वे चाहते थे भारत और चीन दोनों का संतुलन बनाया रखा जाय वे वामपंथी राजनीति को समझ नहीं पाये धीरे-धीरे दरबार में कम्युनिष्टों का प्रभाव बढ़ने लगा और नेपाली कमनिष्टों को 'रॉयल कम्युनिष्ट' कहा जाने लगा दरबारी और कम्युनिष्टों मे कोई भेद नहीं रह गया, १९५५ में स्विट्जर लैंड में राजा त्रिभुवन की मृत्यु हो गयी राजा महेंद्र का राजतिलक हुआ राजा हुए नेपाल और चीन के सम्बन्ध मधुर होने लगे राज़ा महेंद्र को हीन भावना ग्रंथि के कारण भारत और हिन्दुत्व दोनों से दूरी रखने लगे जिससे दुनिया भारत से अलग पहचान बनी रहे, राज़ा महेंद्र ने दो मंत्रियों (भोला झ जनकपुर, साने बाबू सुनसरी) को लगाया कि भारतीय सीमा पर मुसलमानों को बसाया जाय वे भली प्रकार जानते थे कि भारत का प्रथम शत्रु मुसलमान होता है, लेकिन उन्होने यह समझने मे भूल की कि मुसलमान सभी हिंदुओं को अपना शत्रु समझता है आज भारत-नेपाल सीमा पर आईएसआई, मखतब, मदरसों की बाढ़ सी आ गयी है जो नेपाल भारत दोनों के लिए सिर दर्द बना हुआ है यह नेपाल के स्वस्थ्य के लिए अच्छा नहीं हुआ । 
          १९६० में प्रधानमंत्री वीपी कोइराला का चीन में प्रवास हुआ उनके साथ एक बरिष्ठ सहयोगी भी गए थे उस समय नेपाल की सीमा हिमालय के उत्तर 'तिगणी नदी' तक था ज्ञातब्य हो की यह नदी हिमालाय के १६ किमी उत्तर बहती थी चीन के राष्ट्रपति ने वीपी कोइराला से कहा की आधा हिमालय सहित उत्तर का भाग चीन का है जितना चाहो धन ले सकते हो वीपी ने धन लेने से मन कर दिया कहा की मै तो चुना हुआ प्रधानमंत्री हूँ मुझे नेपाली जनता जिंदा नहीं छोड़ेगी और वे वापस आ गए कुछ दिन वाद 'टुडिखेल मैदान' में कांग्रेस पार्टी के एक कार्यक्रम से वीपी को गिरफ्तार कर लिया गया कहते हैं की बहुत कम रूपया लेकर राजा महेंद्र ने चीन को आधा हिमालय सहित टिगड़ी नदी तक का भाग चीन को दे दिया जबानी यह शर्त की चीन हमेसा ''मोनार्की'' को समर्थन करता रहेगा, १९७१ में पाकिस्तान भारत का युद्ध जिसमे ''बंगलादेश'' का निर्माण हुआ 'राजा महेंद्र' भरतपुर जंगल में शिकार हेतु गए थे यह सुनकर की पाकिस्तान युद्ध हार गया एक नया देश बन गया उनका हार्ट अटैक हो गया, राजा बिरेन्द्र नेपाल की गद्दी पर बैठे वे बड़े अच्छे लोकप्रिय राजा थे लेकिन दरबार की नीतियों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ १९९० में लोकतंत्र के लिए जन आंदोलन हुआ मोनार्की के बिरुद्ध नेपाली जनता खडी हो गयी बहुदलीय प्रजातंत्र की स्थापना हुई, राजा तो बिरेन्द्र थे लेकिन सेना पर पकड़ ज्ञानेन्द्र की थी नेपाल का स्वाभाव आंदोलन का है प्रत्येक दस से पंद्रह साल में आंदोलन लोकतांत्रिक नेताओं के प्रति अविस्वास के कारन १९९६-९७ माओवादी हिंसक जनांदोलन शुरू हो गया लोगो का मत है को कहीं न कहीं राजा ज्ञानेन्द्र का समर्थन था 2001 में राजा बिरेन्द्र की हत्या राजा ज्ञानेन्द्र राजा हुए जिसका लाभ उठाकर माओवादियों हिंसा हत्या का तांडव मचा दिया, राजा ज्ञानेन्द्र को दिल्ली ने यह समझने का प्रयास किया की वे और लोकतंत्रवादी एक हो जाय लेकिन राजा के गले यह बात नहीं उतरी इस कारन माओवादी और लोकतंत्रवादी एक हो गए परिणाम 'मोनार्की' समाप्त हो गयी राजा ज्ञानेन्द्र सभी अधिकारों से मुक्त हो गए २००८ में नेपाल 'धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र' घोषित हुआ। 
            माओवादी सत्ता में आये नेपाली जनता को इनसे बड़ी उम्मीद थी लेकिन माओवादियों के जो भी ब्यूरो के सदस्य थे सभी रातो-रात करोङपति हो गए, तराई के आंदोलन पर कब्ज़ा करने वाले उपेन्द्र यादव ने भी कहा की मैं तो माओवादी ही हूँ तराई की जनता भी अपने को ठगा महसूस करने लगी, हिंसा- हत्या का दौर थम तो गया लेकिन जनता को कुछ नहीं मिला, केवल नेता चाहे तराई के चाहे पहाड़ के हो अथवा राजा, किसी ने नेपाल देश, नेपाली संस्कृति व धर्मकी चिनता नहीं की, वर्तमान का जातीय आंदोलन केवल इसलिए है की कहीं हिन्दू राष्ट्र न घोषित हो जाय या देश एक न हो जाय इन्हे नेपाली एकता और देश की एकता से खतरा है आखिर किसको है इससे खतरा ? तो विदेशी मिशनरियों को ही खतरा हो सकता है वे इस समय अत्यधिक सक्रिय हैं। 
          नेपाल की वास्तविकता यह है की चाहे राजा हों या नेता सभी नेपाली जनता की निगाह में अविस्वस्नीय हो गए हैं आखिर राजा महेंद्र ने ही 'आधा हिमालय सहित तिगड़ी नदी' तक का भूभाग चीन को दे दिया यह तो कोई देश भक्ति नहीं राजा बिरेन्द्र ने भी एक बड़ा भूभाग चीन को दे दिया यह भी कोई देश भक्ति नहीं है माओवादियों ने देश के आधारभूत ढ़ाचा को नष्ट किया, हज़ारों सैनिको की हत्या की, सरकारी हॉस्पिटल, स्कुल और सरकारी संस्थानों को नष्ट करना कोई देश भक्ति का काम तो नहीं है जातीय नाम पर देश बिखंडन करना  सभी जातियों को स्वायत्तता के नाम पर देश बिरुद्ध करना, आज जो लोकतान्त्रिक दाल सत्ता में हैं वास्तविकता यह है की नेता उस योग्य नहीं की वे देश सम्हाल सके जनता को आस्वस्त कर सकें जनता को लगता है की इस प्रकार प्रांतीय ब्यवहार से हमारा कोई लाभ नहीं आखिर क्यों चाहिए प्रान्त ! यदि प्रान्त चाहिए तो उसकी स्वस्थ रचना बनानी चाहिए जिसपर जनता विस्वास कर सके। 
          आंदोलन ही आंदोलन आखिर क्यों वास्तविकता यह है की नेपाल में जब भी देश की एकता हिंदुत्व की एकता का आंदोलन शुरू होता है तो विदेशियों का दर्द शुरू हो जाता है आंदोलन इसमे है आखिर हिन्दू का भाव मजबूत होगा तो भारत नेपाल की एकता मजबूत होगी लेकिन इससे किसको कष्ट है ! तो ध्यान देने योग्य बात है कि नेपाल में २2-२५ देशों कि एम्बेशी का क्या काम है वे क्या करतीं हैं वे सबके सब नेपाल में रहकर भारत पर निगाह रखने का काम करती हैं वे बिभिन्न प्रकार के बिखण्डनवादी आंदोलन को बढ़ावा देने का काम करती हैं, कहते हैं कि ''लाठी मरने से पानी नहीं फटता'' नेपाल और भारत दो देश होते हुए दोनों कि आत्मा एक है इसी से कष्ट था दरबार को, माओवादी को और बिभिन्न राज दूतावासों को हिन्दू संगठन से इनका पेट दर्द कर रहा है एक बार पुनः दरबारी लेखक माओवादी पत्रकार सक्रिय हैं वे समझ नहीं प् रहे हैं कि भारत बिरोध करते-करते हिन्दू बिरोध हो जा रहा है जो नेपाली अस्मिता का बिरोध हो जा रहा है यह समझने कि आवस्यकता है ईश्वर ने हमें एक बनाया है आप अलग नहीं कर सकते।     
              
    

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