तुषाग्नि में कुमारिल और आदि शंकर


  आदि शंकर 

आचार्य कुमारिल भट्ट आद्य शंकराचार्य समकालीन थे, आद्य शंकराचार्य को भगवान शंकर का अवतार माना जाता है। पुरी पीठ, कांचीपुरम पीठ के शंकराचार्यों मठों में लिखित दस्तावेजों के अनुसार विक्रम संवत से 450 वर्ष पूर्व आदि शंकर का प्रादुर्भाव माना जाता है, शंकराचार्य का जन्म दक्षिण केरल प्रदेश के पूर्णा नदी के तटवर्ती "कालड़ी ग्राम" में वैशाख शुक्ल पंचमी को नामुद्रिपाद ब्राह्मण सुसंस्कारित परिवार में हुआ था। वे अपने पिता शिवगुरु और माता सुभद्रा के इकलौते पुत्र थे। आचार्य गोविंदपाद इनके गुरु थे अत एव वैदिक विद्वानों में परंपरा से उनके संबंध में यह श्लोक चर्चित रहा है।

       अष्टवर्षे   चतुर्वेदी   षोडशे   सर्वभाष्यकृत।

       चतुर्विशे   दिग्विजयी   द्वान्त्रिशे  मुनिरभ्यागत।।

अर्थात आठ वर्ष की आयु में ही शंकर चारों वेदों में पारंगत हो गए, सोलह वर्ष की अवस्था में सभी वेदों-उपनिषदों के भाष्य का आलेखन कर चुके थे, चौबीस वर्ष की आयु तक उन्होंने चतुर्दिक वैदिक सनातन धर्म का न केवल ध्वाजारोहण किया बल्कि नास्तिकों को पराजित कर बत्तीस वर्ष में ब्रम्हलीन हो गए।

पद्मपाद कुमारिल को खोजने गए

वेदव्यास के आदेशानुसार शंकराचार्य ने कुमारिल भट्ट से भेंट करने प्रयाग संगम पर पहुचे जो भारतीय सांस्कृतिक धार्मिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। जब शंकराचार्य प्रयाग पहुँचे अपने शिष्य पद्मपाद को आचार्य कुमारिल का पता लगाने के लिए भेजा। शंकर स्नान से निवृत हुए ही थे तभी दौड़े हुए पद्मपाद आये और बोले शीघ्र चलिए देव अनर्थ हो गया! शंकराचार्य ने सहज भाव से कहा, विद्वान को उद्वेलित तथा सन्यासी को विचलित नहीं होना चाहिए। शान्त होकर बताओ क्या हुआ ? पद्मपाद ने सिर झुकाकर कहा "सीघ्र चलिये देव, भट्टाचार्य तुषाग्नि में प्रवेश कर चुके हैं।" इसके पश्चात शिघ्रता पूर्वक इंगित दिशा में चल पड़े। 

 शंकर का अभिवादन

चिता के चारों ओर शोकाकुल दर्शकों की भीड़ थी सभी की आंख गिली थीं, सभी मंत्रमुग्ध से मौन हो देख रहे थे। तुषानल में प्रवेश तो और लोगों ने भी किया था इसके पहले कुमारिल के गुरू बौद्धाचार्य धर्मपाल ने भी किया था परंतु वे शास्त्रार्थ में पराजित होकर किये थे। इसके विपरीत कुमारिल भट्ट स्वेच्छा पूर्वक एक सांस्कृतिक मर्यादा की रक्षा के लिए, आत्म शुद्धि के उद्देश्य से कर रहे थे। अतः इनका आत्मोत्सर्ग अधिक स्तुत्य एवं अभूतपूर्व था। शंकराचार्य अपने शिष्यों सहित रास्ता बनाते हुए चिता के निकट जा खड़े हुए, शंकर ने एक बार दृष्टि ऊपर उठाकर देखा फिर हाथ जोड़कर अभिवादन किया, परंतु कुमारिल की दृष्टि उनपर नहीं पड़ी। तभी पद्मपाद ने उच्च स्वर में पुकारा भट्टाचार्य श्री, हमारे गुरु आचार्य शंकर आपको अभिवादन निवेदित कर रहे हैं। कुमारिल के कानों में आवाज आई उन्होंने अभिवादन का उत्तर देते हुए कहा- मैं कृतार्थ हुआ यतिश्रेष्ठ! मेरे जन्म-जन्मांतर के पुण्य फलीभूत हुए। शंकराचार्य ने कहा भट्टाचार्य! "आपने वैदिक धर्म के हित में जो कार्य किया है वह स्तुत्य है, उसकी चारों ओर चर्चा है और उससे मैं बहुत प्रभावित हूँ आपके दर्शन व विचार विमर्श करने का इच्छुक था। मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि हमारी भेंट इन परिस्थितियों में होगी।" 

कुमारिल और शंकराचार्य की भेंट

 आचार्य कुमारिल भट्ट आदि शंकराचार्य को अपनी आंखों के समक्ष आया हुआ देखकर कहना शुरू किया,  "यतिवर- मेरा अहोभाग्य है कि संसार से प्रयाण करते समय आप जैसे सर्वज्ञ, तपोनिधि, ब्रम्हज्ञान के साकार विग्रह, वैदिक धर्म के परम उद्धारक मेरे सम्मुख विराजमान हैं। मैं अपने भाग्य की जितनी प्रशंसा करू बहुत कम है, आचार्य मैने आपका नाम यश भली भांति सुन रखा था किंतु अभी तक दर्शन करने का सौभाग्य नहीं मिला था अंतिम समय में आपका दर्शन कर मैं कृत्य कृत्य हो गया, अहो मैं परम भाग्यशाली हूँ।" हे यतिवर, "जिसने यह शरीर दिया था उसी ने इस शरीर को एक भूमिका दी थी! मैने केवल अपने कर्तव्य का पालन किया है मैंने नास्तिकों, बौद्धों के तर्कों को निरस्त किया। परंतु काल के तर्क को कोई निरस्त नहीं कर सकता अतः उसे स्वीकार कर रहा हूँ।" शंकराचार्य ने कहा- परंतु पाप और आप ! और इतना घोर प्राश्चित। फिर कुमारिल बोले- "मैंने जीवन में दो पाप किये हैं, "मैंने जैमिनी मीमांसा से प्रभावित होकर अपनी कृतियों में ईश्वर की सत्ता का खंडन किया, परंतु ऐसा मैंने केवल यह सिद्ध करने के लिए किया कि वेद अपौरुषेय है, स्वत: प्रमाण है और उनकी सत्यता के लिए ईश्वर को दुहाई देना अनावश्यक है। परंतु मैं अनीश्वरवादी नहीं हूँ, यतिश्रेष्ठ! मैंने उस परम सत्ता को कभी नकारा नहीं सम्पूर्ण सृष्टि का कर्ता और हर्ता वही है।" अंतिम शब्द समाप्त होते कुमारिल की दृष्टि अंतरिक्ष की ओर उठ गई। मेरा दूसरा पाप यह है कि मैंने गुरुद्रोह किया है। नालंदा के बौध्द आचार्य धर्मपाल से समस्त बौध्द शास्त्रों का अध्ययन करने के बाद उनकी अवज्ञा की, उनका खंडन किया, प्रतिपक्षी वनकर उनसे शास्त्रार्थ किया और अंत में उनके मृत्यु का कारण बना। वे विधर्मी थे, वेद विरोधी थे, परंतु मैंने स्वइच्छा से उन्हें गुरू स्वीकार किया था। अतः मेरा आचरण शिष्य धर्म के अनुरूप नहीं था, यह कृत्य गुरुद्रोह था, घोर पाप था, मैं उसका प्राश्चित कर रहा हूँ। अपराध के अनुरूप ही प्रायश्चित होना चाहिए अतः जिस प्रकार उन्होंने तुषानल में प्रवेश कर शरीर त्याग किया था वैसा ही मैं कर रहा हूँ।

शास्त्रार्थ से पहले ही पराजित 

शंकराचार्य  मैं यहाँ शास्त्रार्थ में कुमारिल को पराजित करने तथा एकेश्वरवाद की विचारधारा को अपनाने तथा उत्तर मीमांसा चिंतन दर्शन को छोड़ने के लिए विवश करने के उद्देश्य से आया था, परंतु मैं आचार्य कुमारिल के त्याग एवं प्रायश्चित से पराजित हो चुका हूं मैं यहाँ आध्यात्मिक सम्राट बनने की मंशा से आया था लेकिन कुमारिल के सामने आत्मसमर्पण करने के लिए बाध्य हूँ मैं शास्त्रार्थ में कुमारिल को पराजित करने आया था परंतु शास्त्रार्थ शुरू होने से पहले ही मैं पराजित हो गया। शंकर ने कहा आचार्य आपका जीवन स्तुत्य है, वैसे ही आपका अंत भी है लेकिन असमायिक है, आपने जो कार्य शुरू किया वह पूरा नहीं हुआ है आपने वेद विरोधी आचार्यों को परास्त कर उनके प्रभाव को क्षीण किया है परंतु वैदिक धर्मावलंबियों की अंतर्कलह का निवारण अभी शेष है विविध सम्प्रदायों तथा मत मतांतरों को एकता के सूत्र में बांधना नितांत आवश्यक है। अन्यथा विघटन रुकेगा नहीं, इसके अतिरिक्त वैदिक धर्म का शुद्धिकरण भी आवश्यक है, उसमें विकृतियां आ गई हैं वे दूर होनी चाहिए अन्यथा नए नए धर्म प्रवर्तित पैदा होते रहेंगे। 

लंबी प्रतीक्षा के पश्चात 

''बहुत दिन से मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था, तुम आओगे तथा मेरे साथ शास्त्रर्थ करोगे लेकिन आप आये ऐसे समय---!'' फिर कुमारिल ने कहा--! मैं आपके विचारों से सहमत हूँ ये दोनों कार्य होने चाहिए, परन्तु विधाता ने यह यश मेरे भाग्य में नहीं लिखा है, भविष्य की चिंता करना वर्तमान का धर्म है, मैं अब अतीत का अंग बन चुका हूं। शंकराचार्य न कहा वर्तमान अपने कर्तव्य का पालन करेगा, विद्वतर। अब मेरा यह दायित्व है परंतु यदि आपका थोड़ा सहयोग मिल जाता तो मेरा कार्य सरल हो जाता, वास्तव में मैं इस समय इसी प्रयोजन से प्रयाग आया हूँ। महात्मन! मेरी दृढ़ धारणा है कि अद्वैत सिद्धांत ही वह सूत्र है जो सनातन धर्म के विभिन्न सम्प्रदायों को बांधकर रख सकता है, मैंने उसके प्रचारार्थ ब्रह्मसूत्र आदि प्रस्थान-त्रय के भाष्य लिखे हैं। मेरी इच्छा थी कि आप ब्रम्हसूत्र भाष्य का अवलोकन करें, अपनी शंकायें व्यक्त करके मुझे उसके निवारण का अवसर देते और यदि संतुष्ट हो जाते तो उस पर वार्तिक रचना करते। चिता भली भांति अग्नि पकड़ चुकी थी आधे से अधिक भाग प्रज्वलित हो गया था, उसपर समाधि मुद्रा में आसीन कुमारिल उसके ताप का अनुभव कर रहे थे। परंतु अविचलित थे।

शंकराचार्य का प्रयोजन

शंकर ने कुमारिल को सम्बोधित करते हुए कहा कि हे विद्वत शिरोमणि, आपने जो भी किया वेद विरोधी मतों का निराकरण करने के उद्देश्य से किया है उसे पाप नहीं कहा जा सकता। अतः आपका प्राश्चित अनावश्यक है, आपको अभी धर्म हित में जीवित रहने की आवश्यकता है। यदि आप अनुमति दे तो "मैं अपने कमण्डल का जल छिड़क कर अग्नि को समाप्त कर सकता हूँ।"  कुमारिल ने कहा मैं जानता हूँ कि आप योगसिद्ध हैं, सर्वसमर्थ हैं, आपके लिए कुछ भी असंभव नहीं है। परंतु हे आचार्य, जिस वेदोक्त विधान में मैं प्रबृत्त हुआ हूँ उसका परित्याग महापाप होगा। मेरी लोक में निंदा होगी, मेरा यश कलंकित होगा, मेरे जन्म-जन्मांतर के अर्जित पुण्य अस्त हो जाएंगे। अतः विनती है कि आप मुझसे संकल्पच्युत होने का अनुरोध न करें। शंकराचार्य ने पूछा जिस प्रयोजन से मैं आया हूँ उसका क्या होगा ? कुमारिल ने बताया, महाजनों के प्रयोजन कभी असिद्ध नहीं होते, आपका भी नहीं रहेगा। इस विषय पर आप मंडन मिश्र से मिले वह मेरा पटु शिष्य हैं और मुझसे कम योग्य नहीं है, मैं उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित कर चुका हूँ, वह महिष्मति नरेश की मंत्री परिषद का सदस्य है। उस पर मुझे गर्व है वह विद्या, बुद्धि, तर्क तथा ज्ञान में मुझसे कम नहीं है। 

श्री भारती देवी

कुमारिल ने कहा इस संदर्भ में मेरा एक सुझाव है, जब मंडन मिश्र के साथ आपका शास्त्रार्थ हो तो मध्यस्थता के लिए आप अपनी ओर से श्री भारती देवी का नाम प्रस्तावित करेँगे तो अच्छा रहेगा। भारती, मंडन मिश्र की पत्नी है विलक्षण स्त्री है वह, लोग कहते हैं कि उसके जिभ्वा पर सरस्वती का वास है, वह परम विदुषी है, सर्व विद्या विशारद है। यदि मण्डन मुझसे कम नहीं तो वह मण्डन से किसी अंश में कम नहीं है, मेरी दृष्टि में आपके और मंडन मिश्र के शास्त्रार्थ में उससे अच्छा मध्यस्थ कोई नहीं हो सकता। शंकराचार्य कुछ बोल नहीं रहे थे उनका ध्यान ऊपर उठती हुई अग्नि पर स्थिर थी। 

अंतिम प्रयाण

कुमारिल ने शंकराचार्य से कहा मेरा अंतिम विचार, मेरी अंतिम इच्छा है कि हमारे धर्म में इतनी स्वायत्तता, इतनी वैचारिक स्वतंत्रता है कि ब्यक्ति जो भी धारण कर लेता है वही उसका धर्म हो जाता है, यह हमारे विघटन का मुख्य कारण है। लेकिन हम इसे निर्मूल नहीं कर सकते क्योंकि यही हमारी विशेषता है, हमारी मूल शक्ति भी है। इस विषय में आपको ही विचार करके कोई व्यवस्था बनानी होगी जिसके लिए आप प्रयत्न शील भी हैं। 

        "हे महात्मन अब मेरा जीवन शेष हो रहा है, अग्नि मेरे शरीर को स्पर्श करने लगी है, अतः मैं समस्त चिंताओं से मुक्त होकर अपने चित्त को परब्रह्म परमात्मा में समाहित कर रहा हूँ। आप मुझे तारक ब्रह्म का नाम सुनाइये"। यह कहकर कुमारिल सदा के लिए मौन हो गए। उनकी आँखें बंद हो गई और वे ध्यान मुद्रा में समाधिस्थ हो गए। शंकर का सिर श्रद्धा से झुक गया, उन्होंने एक बार सप्रयास दृष्टि उठा कर वैदिक धर्म के अस्त होते हुए सूर्य को देखा फिर आँखे मूंद कर गंभीर स्वर में तारकब्रह्मा - नाम का उच्चारण शुरू कर दिया। कहते हैं कि आदि जगद्गुरु शंकराचार्य ने कुमारिल भट्ट को हमेशा अपने गुरु स्थान पर रखा और पूरे भारतवर्ष के भ्रमण, शास्त्रार्थ के दौरान उन्हें जो बनी बनाईं भूमिका मिली वह कुमारिल भट्ट ने तैयार किया था, कुमारिल ने वेदों को अपौरुषेय सिद्ध किया और वेद स्वात: प्रमाण है, यह भी सिद्ध किया वे वैदिक धर्म के अपराजेय योद्धा थे। उन्होंने वैदिक धर्म के अनुसार जीवन जिया और उसकी रक्षा के लिए तुषाग्नि में प्रवेश किया।


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