गुरु गोविन्द सिंह --- देश व धर्म हेतु शिष्यों सहित पिता, पुत्र के भी बलिदान हेतु प्रेरित किया--!

योद्धा और सन्यासी गुरु गोविंद सिंह--!
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भारत वर्ष में संघर्ष क़ा काल चल रहा था मुगलों क़ा अधिपत्य था भारत माता, गौ माता त्राहि-त्राहि कर रही थी हिन्दुओ को बलात मुसलमान  बनाया जा रहा था कश्मीर व अन्य स्थानों से तमाम साधू, संत व ब्रहमण आये थे धर्म सभा लगी थी, गुरु तेगबहादुर ने सभा में कहा कि हमारा देश व धर्म किसी बड़े महापुरुष क़ा बलिदान चाहता है!
पीछे से दस वर्षः क़ा एक बालक उठा--- पिता जी--!
इस धर्म सभा में आपसे बड़ा महापुरुष कौन है---?
इस सभा में तो सबसे बड़े तो आप ही है इस नाते सबसे पहले आपका ही बलिदान होना चाहिए--! सभा मे सन्नाटा छा गया गुरु तेगबहादुर को समझने मे देर न लगी आखिर यह तो गुरु पुत्र है-! यही बालक धर्म की रक्षा करेगा, आखिर वे गुरु पुत्र ही थे उन्ही को यह गुरु गद्दी सम्हालनी थी-! अपने सिर की पगड़ी बच्चे क़े ऊपर रखते हुए बलिदान क़े लिए प्रस्थान कर दिया क्रूर औरंगजेब ने छल पूर्बक गुरु तेगबहादुर को दिल्ली बुलाया और निर्दयता पूर्बक हत्या कर दी, यही बालक आगे गुरु गोविन्द सिंह क़े नाम से प्रसिद्द हुआ। 
संगठित शक्ति----!
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पिता क़े बलिदान क़ा बहुत गहरा प्रभाव पड़ा उन्होंने देखा कि औरंगजेब क़े अत्याचार से हिन्दू धर्म की रक्षा केवल संगठित सैनिक शक्ति ही कर सकती है, सम्पूर्ण भारत में गुरु नानक से लेकर तेगबहादुर तक -- भ्रमण कर हजारो मठो की स्थापना की थी जैसा हम जानते है कि हमारे संतो ने राष्ट्रीयता को ध्यान में रखकर आध्यात्मिकता क़ा संचार किया, अकेले बिहार में ३०० मठ से अधिक थे जिन्हें ''उदासी मठ' के नाम से आज भी जाना जाता है, गुरुगोविन्द सिंह ने समय क़े अनुसार सभी मठो को खालसा में परिवर्तन कर एक सैनिक शक्ति खड़ी की..
जन विस्वास करौ तुरुक्का !
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अमोघ निशाना मारते थे उनका बाण अचूक था वे महाबीर थे और दो लम्बी तलवारे बाधते थे प्रथम आनंदपुर साहब, चकोर और नाहन में सैनिक छावनी स्थापना की औरंगजेब ने सरहिंद, लाहौर क़े सूबेदारों को युद्ध हेतु भेजा गुरुदेव क़े दो बालक बंदी बना लिए गए, इस्लाम क़े मुहब्बत व प्रेम क़ा सन्देश देने वालो ने दोनों पुत्रो को मस्जिद क़े दिवार में जिन्दा चुनवा दिया गुरु गोविन्द सिंह लड़ते-लड़ते दमदमा में दसवां ग्रन्थ निर्मित किया, महान क्रन्तिकारी बन्दा को धर्म की रक्षा हेतु तैयार कर दक्षिण में गोदावरी क़े तट पर साधना में लग गए आश्रम में दो पठानों ने आश्रय मागा उन्हें निराश्रित जानकर आश्रय दिया, उनको भोजन कराया स्वयं बिश्राम पर गए थे कि उन तुर्कों ने धोके से उनके पेट में कटार मार दी वे स्वर्ग सिधार गए, [ वाहे गुरु की फतह और सत श्री अकाल ] क़े युद्ध घोष देश, धर्म की रक्षा क़े लिए गुरुदेव क़े शिष्यों ने गुंजित किये और हिंदवी साम्राज्य के निर्माण की नीव रखी, मरते समय उनकी अमरवाणी अकस्मात् निकली---------!
             ''जन विस्वास करऊ तुरुक्का''------!
 हम हिन्दू कैसे है की अपने महापुरुषों की बात नहीं मानते इसलिये बारम्बार धोखा खाते रहते है बिधर्मी हमें बेवकूफ समझ कर इस्लाम को प्रेम-मुहब्बत का धर्म बताता रहता है। 
आज़ादी हेतु बलिदान पर बलिदान
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पृथ्बीराज चौहान से लेकर हिन्दू कुल सूर्य राणाप्रताप, शिवाजी महराज पूरी सिक्ख परंपरा आजाद हिंद फ़ौज से लेकर भगत सिंह तक की बलिदानी परंपरा -- लाखो बलिदानियों ने अपनी आहुति दी तब देश आजाद हुआ, केवल १८५७ से १८६० क़े बीच में उत्तर प्रदेश व बिहार  में बीस लाख लोगो को अंग्रेजो ने मारा जितने पढ़े लिखे लोग थे सभी को समाप्त कर दिया देश बिभाजन क़े समय लगभग 10 लाख लोग मारे गए-! आज़ादी ऐसे नहीं मिली-! मै गाधीजी की आलोचना नहीं करता चाहता लेकिन जो गीत गाया जाता है कि --
''साबरमती क़े संत तुने कर दिया कमाल देदी आज़ादी हमें खड्ग बिना ढाल''----!
 ये गीत उन सभी क्रांतिकारियों क़ा अपमान करती है जिंहोने भारतीय आज़ादी और स्वाभिमान हेतु अपने को बलिदान कर दिया, हमने सैकड़ो वर्ष संघर्ष व लाखो, करोडो बलिदान क़े बाद आज़ादी प्राप्त की है यह आज़ादी किसी की कृपा पर नहीं है। 
सम्पूर्ण आहुति---!
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 गुरु गोविन्द सिंह अकेले नहीं बलिदान हुए अपने पिता, बच्चो और शिष्यों सहित स्वयं को बलिदान करके एक अद्भुत उदहारण प्रस्तुत किया जो हमारे लिए हमेसा प्रेरणा दायक रहेगा, ऐसे थे हमारे गुरु गोविन्द सिंह, जब पंजाब में गुरु क़े शिष्यों क़े विजय पर्व क़ा तीन सौवा वर्ष मनाया जा रहा हो तो गुरु गोविन्द सिंह को बिना याद किये यह विजय उत्सव पूरा नहीं हो सकता इसलिए हमने संक्षेप में याद दिलाने क़ा प्रयत्न किया। 

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17 टिप्पणियां

  1. वलिदानियों की इस परम्परा को हमें आगे बढ़ाना है इन वलिदानियों के कुर्वानी को हमेशा अपना आदर्श मानकर।
    क्रांतिकारी पोस्ट के लिए पसंद का चटका भी

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  2. रक्तनलिकाओ में जोश का संचार करती आपकी ये प्रस्तुति!भारतीय इतिहास तो ऐसे असंख्य बलिदानों से भरा पड़ा है पर उस इतिहास को दबाया जाता रहा है!जो उसे लोगो तक पहुंचाने का कार्य करना चाहता है उसे "साम्पर्दायिक" बता कर गलत घोषित करने की साजिश रची जाती है!

    ये मंच जो हमें सौभाग्य से मला है हमें इसका ऐसा ही सदुपयोग करना है......इस यज्ञ में आपकी आहुति सफल रही...शुभकामनाये स्वीकार करे...

    कुंवर जी,

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  3. साथक लेखन के लिये साधुवाद

    जय हिन्‍द जय भारत जय श्रीराम

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  4. रत्नेश त्रिपाठी
    सादर वन्दे !
    इन वीर बलिदानियों और महापुरुषों को भुलाने का ही परिणाम है कि यह देश पुन उसी अवस्था में आता जा रहा है |
    इस देशभक्ति से ओतप्रोत आलेख के लिए आपका अभिनन्दन !
    रत्नेश त्रिपाठी

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  5. बढिया, जानकारीपूर्ण आलेख.आभार.

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  7. बहुत बढिया व जानकारी भरा आलेख है। आभार।

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  8. आज के वर्तमान युग में भी गुरु तेग बहादुर की बलीदानी परम्परा को कायम रखते सघर्स करने की आवश्यकता है

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  9. बीता तो बीत गया
    अब जो आने वाले वक्‍त में बीतेगा उसका प्रतिरोध करने तो गुरू गोविन्‍द सिंह जी आने से रहे

    बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध लेई

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  10. उत्तरी भारत में विवाहोपरांत लड़की की विदाई को "कन्या को सीख दे दो" कहते हैं यानि भावार्थ यह है कि लड़की स्थाई रूप से विदा हो रही है।तदर्थ जब 1 मण रक्त रंजित जनेऊ रोज तोले जाने लगी और हिन्दू कौम तेजी से विलुप्त होने लगी तब बुद्धिजीवियों एवं बुजुर्गों ने चिंतन कर हर घर के ज्येष्ठ पुत्र को सीख देने की पद्धति जारी की ताकि कौम की वे रक्षा कर सकें और उन्हें सैनिकों की वेशभूषा से सुसज्जित कर अपना सरदार घोषित किया था।कालांतर में उसी सीख शब्द की परिणीति "सिक्ख" जाति में हो गयी।
    हे सरदार-आप ना होते तो हिंदुत्व कब का ही विलीन हो चुका होता और आपकी शहादतों की एवं वीरता का इतिहास अविस्मरणीय है।कोटि कोटि नमन गुरु पन्थ एवं गोविन्द देव जैसे महापुरुषों को और उनके बलिदान को।

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  11. बहुत ही अच्छि जानकारी दी इसी कारन भारत ही नहीं विश्व का हिंदु समाज सिक्खों का सम्मान करता है.

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