हिन्दू साम्राज्य दिवस पर बिशेष

 गौरव शाली अतीत


 हमें पता ही नहीं इतिहास भी साक्षी है कि सम्राट चन्द्रगुप्त, बिन्दुसार से लेकर लगभग 2000 वर्षो तक भारत की तरफ किसी भी बिदेशी हमलावर ने टेढ़ी आख देखाने की हिम्मत नहीं की, यदि किया भी तो उसे मुहकी खानी पड़ी महाराजा दाहिरसेन, बप्पारावल व पृथ्बीराज चौहान क़े पश्चात् एक बार पुनः भारत में निराशा क़ा बातावरण छा सा गया, लेकिन ऐसा नहीं था की हमारे पूर्बज संघर्ष क़ा माद्दा खो बैठे थे. भारत में हिंदुत्व और राष्ट्रीयता क़े प्रतीक 'महाराणा प्रताप' मुग़ल सत्ता को चुनौती दे रहे थे अकबर [दिने इलाही] सूफी क़े नाम पर धर्मान्तरण को नाकाम करने हेतु संत समाज आगे आया । 

जब सन्तों ने हुंकार भरी

 संतो क़ा जागरण जारी रहा वे अध्यात्म क़े उतुंग शिखर पर थे 'अकबर' ने ''ब्रज'' क़े 'संत कुम्भन दास' को उनकी प्रसिद्धि सुनकर 'आगरा' बुलाया 'प्रयाग' उन्हें लेने क़े लिए पालकी भेजी गयी 'कुम्हन दास' ने पालकी पर बैठने से मनाकर दिया, पालकी आगे- आगे वे पीछे- पीछे आगरा क़े लिए चल दिए दरबार में फटे पुराने कपडे पहने हुए दरबार में गए, अकबर ने बैठने क़ा आग्रह किया पर वे बैठे नहीं--! उन्होंने कहा किस काम क़े लिए बुलाया था वह बताओ--? अकबर ने कहा की आपकी बहुत महानता सुनी है हमें कुछ तो सुनाओ, कुम्हन दास ने एक भजन गाया....!

जब संतो ने सत्ता को इंकार किया

 ''संतन कहा सीकरी सो काम--!
 आवत जात पनहिया टूटत, बिसर जात हरि नाम.
  जाको मुख देखत अघि लागत, तिनको करण पड़ी परनाम।''
एक तरफ कुम्हन दास ने ऐसा कहा, वास्तव मे अकबर को लगता था कि मुझे व मेरा सम्मान तो हिन्दू समाज करता नहीं वह तो संतों का ही सम्मान करता है किसी प्रकार भारतीय संतों को अकबर अपने पक्ष मे कर हिन्दू समाज को पराभूत करना चाहता था इस कारण उसने फिर दूसरी तरफ जब ''संत तुलसीदास जी'' को मंसबदारी दने क़े लिए बुलाया तो तुलसीदास ने उसे सन्देश भेजा लिखा-!
       ''हम चाकर रघुबीर क़े,पट्टों लिखो दरबार,
       अब तुलसी क़ा होइहै,नर क़े मनसबदार।''
ऐसे निडर होकर हमारे संतो ने जहा ''स्वामी रामानंद'' क़े शिष्यों ने अकबर को जबाब ही नहीं दिया बल्कि बिभिन्न माध्यमो द्वारा हिन्दू समाज की रक्षा कर जागरण भी किया। 

और फिर जाग उठे सपूत

उसी समय उत्तर में 'गुरु गोविन्द सिंह, महाराणा राजसिंह' तो दक्षिण में 'शिवाजी महराज' नाम क़ा सूर्य उदय हुआ ''हिन्दवी साम्राज्य'' की स्थापना बड़े संघर्षो क़े बाद हुई, शिवाजी क़ा जन्म १९ फ़रवरी १६३० को हुआ, होस सम्हालने के पश्चात वे लगातार किले पर किले जीतते गए वे बिना राज्याभिषेक क़े ही राजा थे, औरंगजेब धर्मांध मुस्लिम शासक था उसे यह स्वीकार नहीं था कि कोई हिन्दू राजा बने, भारत क़े संतो ने तय किया की 'शिवाजी महराज' क़ा राज्याभिषेक हिन्दू रीती-निति और परंपरा क़े अनुसार होना चाहिए काशी क़े प्रकांड पंडित विद्वानों की टोली ''गागा भट्ट'' क़े नेतृत्व में ''रायगढ़'' पहुची और महराज क़ा डंके की चोप पर सारी दुनिया क़े सामने ''हिन्दूपद्पाद-शाही'' की स्थापना हुई, उनका राजतिलक जेष्ठ १३शुक्ल सन १६७४ को वैदिक रीती से मुस्लिम बिरोध क़े बावजूद एक स्वाधीन राजसत्ता क़ा उदय हो चूका था, हिन्दू समाज को एक दुखद समाचार मिला चार अप्रैल १६८० को जिसे ''शिसोदिया कुल, सिहनाधिस्वर छत्रपति'' घोषित किया गया था वह सूर्य अस्त हो गया। 

और फिर घात

'शिवाजी महराज' क़े पश्चात् ''शम्भाजी राजे छत्रपति'' हुए उन्होंने अपने नौ वर्षो में एक साथ चार-चार मोर्चे को सम्हाला, मुग़ल, जंजीर क़ा सिद्दी, पुर्तगाली और अंग्रेज किन्तु उन्हें देश द्रोहियों से पाचवे मोर्चे पर भी लड़ना पड़ा अपने लोगो ने इस मराठा राजा से घात किया और १६८९ मे 'सोमेस्वर' नामक स्थान पर धोखे से मुगलों ने उन्हे बंदी बना लिया, शम्भा जी सौर्य पूर्बक युद्ध किया शत्रु पंक्ति तोड़कर वे जा चुके थे, पाँच लाख सेना जिसे बंदी नहीं बना सकी उसे एक देशद्रोही ने अंजाम दिया, उनके दोनों हाथो में बास बाध कर घसीट कर दरबार में लाया गया महराज क़ा कपडा फट गया था, शरीर लहूलुहान हो गया था यह जानते हुए की मृत्यु सामने खड़ी है, ''संभाजी'' ने भरे दरबार में औरंगजेब को धिक्कारा और मुसलमान होने से इंकार कर दिया, उन्हें पेट क़े बल दौड़ाया -घसीटा जब तक उनका छाती फट नहीं गया रक्तरंजित शरीर में उन्हें बादशाह क़े सामने लाया गया, फिर भी उन्होंने मुसलमान होने से मना कर दिया उनकी जीभ खीच कर काट ली गयी और दुबारा वही प्रश्न, लेखन साहित्य मगाकर लिखा की यदि बादशाह अपनी बेटी रिश्वत में दे तो भी इस महान धर्म को नहीं  छोड़ूगा, ऐसी घोर यातनाये देकर उन्हें मरवाया जैसे बीरबन्दा बैरागी क़े साथ किया था। 

मृत्यु को पराजित किया

'सम्भाजी महराज' क़ा बलिदान मराठो की प्रतिकार भावना क़े लिए अत्यंत प्रेरणादायक सिद्ध हुआ, 'सम्भाजी' क़े इस वीरोचित धर्माभिमानी मृत्यु का समाचार जंगल में आग क़े समान पूरे मराठा साम्राज्य में फ़ैल गयी और मुग़ल शासन क़े लिए वह अंतिम कील साबित हुई, पूरा भारत खड़ा हो गया अंत में तो मुग़ल केवल दिल्ली की सीमा क्षेत्र तक ही रह गए थे, इतिहासकार लिखते है ''सम्भाजी'' केवल महान सेनापति ही नहीं थे बल्कि मृत्यु ने उन्हें एक महान पिता क़ा धर्मवीर पुत्र सिद्ध कर दिया।