धर्म विशेष

जब भगवान परसुराम पहुचे टांगीनाथ धाम--------

            त्रेता युग की कथा है जहा विश्वामित्र भगवान श्रीराम को लेकर राष्ट्र रक्षा हेतु उनके प्रशिक्षण की तैयारी कर रहे थे, वही लंका का राजा रावण जो आर्याबर्त और मानव समाज के लिए दुर्भाग्य बन चुका था, ऋषियों-महर्षियों का जीना दूभर हो गया मानव समाज के चिंतन और शोध पर काली छाया राक्षसों की पड़ चुकी थी, ऐसे में मिथिला और अयोध्या को एक होना भी अभीष्ट था इस नाते राजर्षि विश्वामित्र  ने सीता स्वयंबर में भगवान श्रीराम को लेकर जनकपुर पधारे, जब धनुष टूटा जिसकी आवाज़ भगवान परसुराम ने सुना-- सीता ने श्रीराम के गले में जयमाला डाला कि भगवान परसुराम जनकपुर पहुचे और बहुत ही नाराज हो गए किसने तोडा यह धनुष सभी भयक्रांत थे--?
            लक्षमण और परसुराम का लम्बा संबाद भी हुआ जब परसुराम को पता चला की जिस श्रीराम ने धनुष तोडा है वे तो स्वयं ही नारायण है, तो उन्हें बड़ी ही आत्मग्लानी हुई ---मैंने उन्हें पहचाना नहीं इससे दुखी होकर वे पश्चाताप करने की दृष्टि से दक्षिण की तरफ गए बिंध्याचल के शांति पर्बत शृंखलाओ में भगवान शिव की स्थापना कर साधना के लिए बैठ गए,  वे अपने साथ परसु यांनी फर्सा हमेसा रखते थे वही पर उसे गाड दिया इस नाते उस स्थान को हम 'टांगीनाथ' के नाम से जानते है बंगाल और झारखण्ड में टांगी का अर्थ फर्सा से लिया जाता है, आज यह स्थान बहुत ही उपेक्षित पड़ा हुआ है कभी यहाँ बहुत बड़ा मंदिर और कई की.मी. क्षेत्र में यह तीर्थक्षेत्र था लाखो तीर्थ यात्री यहाँ आते थे आज भी इस स्थान की बहुत मान्यता है.
              बिगत संघर्ष काल में हज़ार वर्ष तक हिन्दू समाज संघर्ष करता रहा उस काल में यह मंदिर भी टूटा ये मुग़ल काल हो सकता है  वहा पर सैकड़ो खंडित मूर्तियाँ आज भी पड़ी दिखाई देती है उसे देखने से लगता है की योजना बद्ध तरीके से हमारे उस तीर्थ क्षेत्र को नष्ट-भ्रष्ट किया गया, वहा के लोगो ने जब खुदाई करना चाहा तो त्रिशूल और फर्सा बीसों फिट खोदने के पश्चात् भी थाह न पाने पर खुदाई बंद कर दी गयी, आज पुनः हिन्दू समाज वहा पर बड़ी श्रद्धा-भक्ति से जाता है कहते है की जब भगवान टांगीनाथ चाहते है तभी उनका दर्शन होता है इस समय धर्मजागरण समन्वय बिभाग ने कावर यात्रा के माध्यम से समाज में जागरण का प्रयास किया है.
            चर्च और ईसाई मिशनरी इस तीर्थ क्षेत्र को घेर धर्मपरिवर्तन करा क्षेत्र में अशांति फ़ैलाने का प्रयास कर रही है लेकिन यदि हिन्दू समाज खड़ा हो गया तो जिस प्रकार बिरसा मुंडा ने ब्रिटिस साम्राज्य को भगाने का काम किया था उसी प्रकार यह वनवासी समाज खड़ा होकर चर्च का मुकाबला करेगा, यह संघर्ष केवल वनवासियों का ही नहीं पूरे हिन्दू समाज का है, हिन्दू समाज को यह ध्यान रखना पड़ेगा की यह क्षेत्र चर्च का चारागाह न बनाने पाए नहीं तो भगवान परसुराम तपस्थली की मर्यादा का हनन होगा आतंरिक भारत को खतरा, इस तीर्थ क्षेत्र की रक्षा करना ही भगवान परसुराम के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि, भक्ति का प्रकटीकरण होगा, यह तीर्थ क्षेत्र झारखण्ड के गुमला जिला में गुमला से ७५ की.मी. की दुरी पर जसपुर की दिसा में छत्तीसगढ़ की सीमा से लगा हुआ है, प्रदेश की राजधानी रांची से यह कोई १५० किमी. की दुरी पर सड़क मार्ग पर स्थित है.
         आइये हम सभी दर्शन करे उस शिवलिंग की जिसे भगवन परसुराम ने स्थापित कर साधना की थी जिससे वहा के हिन्दू समाज का मनोबल तो बढेगा ही और चर्च के देश बिरोधी गतिबिधियो पर रोक भी लगेगी यह केवल धार्मिक ही नहीं राष्ट्रीय कार्य है ऐसा हमें समझने की आवश्यकता है.. 

2 टिप्‍पणियां

prashant ने कहा…

naman.

बेनामी ने कहा…

परसुराम विष्णु भगवन के अवतार थे वे क्षत्रिय हंता हो ही नहीं सकते गुलामी के काल में यह भ्रांति फैलायी गयी वे सभी को आर्य बनाना चाहते थे.