दिग्विजयी ऋषि दयानन्द-भाग-4

1857 स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात

स्वामी जी इन सभी घटनाओं से चिंतित न होकर चिंतन में लग गए वे चाहते थे कि संपूर्ण हिन्दू समाज के अंदर देशभक्ति और राष्ट्रभक्ति होनी चाहिए, उन्होंने देखा कि विजयी अंग्रेज हिन्दुओ पर जघन्य अत्याचार कर रहे हैं, लेकिन अंग्रेजों के लिए सबसे अधिक चिंता का विषय यह था कि सारा का सारा हिन्दू समाज में ऐसी जागृति कैसे आ गई अंग्रेज अधिकारी बहुत परेशान थे, उनके ध्यान में आया कि भारत में शिक्षा का स्तर बहुत ऊंचा है, प्रत्येक गांव में गुरुकुल है उसमें सभी जाति के आचार्य हैं समरस समाज है अंग्रेजों ने एक सर्वे किया जिसमें उन्हें मिला कि उत्तर प्रदेश, बिहार व उत्तर भारत में साक्षरता 85%, कहीं 90% है लेकिन दक्षिण भारत में यह साक्षरता बढकर 95% से 100% तक हो जाती है, गांवों में पढ़े लिखे लोगों की संख्या बड़ी है इन गांवों में जब तक ये लोग रहेंगे भारत पर शासन करना आसान नहीं होगा 1857 के इस क्रांति की सफलता से अंग्रेज तिलमिलाए हुए थे उनकी समझ में आ गया था कि यहाँ का जो मूल समाज यानी हिन्दू समाज है उसी से लड़ना होगा क्योंकि अब भारत में सत्ता अटक से कटक की सत्ता हिंदुओं की है अंग्रेजों के जितने युद्ध हुए अधिकांश हिन्दू राजाओं से हुआ हिन्दू स्वाभिमान के साथ खड़ा हो गया था इसलिए अंग्रेज अधिकारी परेशान थे।


हिंदुओं का नरसंहार

ऐसा नहीं हुआ कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों की विजय होने पर वे चुप चाप शासन करने लगे उन्हें तो सत्ता में स्थायित्व चाहिए था उसके लिए उनके पास दो रास्ते थे एक जितने भारतीय पढ़े लिखे हैं जागरूक हैं उन्हें समाप्त करना, भारतीय संस्कृति को समाप्त करने के लिए शिक्षा ब्यवस्था में पूरा परिवर्तन दूसरा चर्च के द्वारा धर्मान्तरण यानी ईसाईकरण। यह युद्ध समाप्त नहीं हुआ यह ठीक है कि एक प्रकार से हिन्दू पराजित हो गया लेकिन ब्रिटिश सरकार ने पूरे भारत में नरसंहार शुरू कर दिया जिन राजवंशों ने 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ यानी स्वदेश के लिए लड़े अंग्रेजों ने उन्हें निशाना बनाया प्रथम उनके किलों को तोपों से उड़ाया उन राजवंशों का नामोनिशान मिटाने का काम किया अयोध्या से 25 कीमी दूरी पर अमोढ़ा राज्य है राजा जालिमसिंह जो सूर्यवंशी क्षत्रिय थे भगवान श्रीराम भी सूर्यवंशी थे उनके वंश की रानी तलाशकुँवरि ने युद्ध में लड़ी थी आज भी उस किले का खंडहर इसका सुबूत बनकर सामने खड़ा है, ऐसे एक उदाहरण से यह समझा जा सकता है कि केवल उत्तर प्रदेश और बिहार में बीस लाख लोग मारे गए थे और इस प्रकार का नरसंहार 1857 से 1860 तक यानी तीन वर्ष तक चलता रहा, जब हम किसी गांव में जाते हैं तो ध्यान में आता है इस कुएं को लासों से भर दिया था बहुत सारे पीपल के पेड़ मिलेगें जिस पर सैकड़ों लोगों की फाँसी हुई थी उदाहरण के लिए अयोध्या से 25 कीमी पर हाईवे- 24 पर छावनी नाम की एक छोटी सी बाजार है वहाँ जो पीपल पेड़ स्मारक के नाते खड़ा है कहते हैं कि सैकड़ों लोगों की फाँसी हुई थी, इस प्रकार के उत्तर भारत में सैकड़ों, हज़ारों स्थान दिखाई देते हैं। इस प्रकार पूरे देश में भयंकर नरसंहार करके अंग्रेजों ने मानवतावाद को शर्मसार कर दिया, अयोध्या सहित सभी धार्मिक स्थलों में सन्यासियों के जो अखाड़े थे जिसमें लश्करी अखाड़ा प्रमुख है सभी उस युद्ध में काम आए और धीरे-धीरे ये सब अखाड़े केवल धार्मिक गतिविधियों तक सीमित होकर रह गए।

गौरवपूर्ण इतिहास

स्वामी दयानंद सरस्वती को अपने इतिहास के बारे में सब कुछ पता था उन्होंने भारतीय इतिहास का ठीक प्रकार से अध्ययन किया था अब उनके सामने और बड़ी चुनौती खड़ी हो गई अब वे भारत भ्रमण पर निकल पड़े देश के स्वाभिमान को हिन्दू समाज के सामने रखना उसका गौरवपूर्ण इतिहास उसे बताना स्वामी जी के प्रवचन में अध्यात्म तो होता ही था लेकिन उससे अधिक अपना स्वधर्म और स्वराज्य वे भारत के दिग्विजयी इतिहास को बता हिन्दू समाज के स्वाभिमान को जगाने का काम करने लगे। कुछ लोग जो अंग्रेज भक्त थे तथा ब्रिटिश इन सभी का कहना था कि भारत का इतिहास पराजय का इतिहास है लगातार पराभव से भरा हुआ स्वामी जी कहते थे ऐसा कहना और लिखना बिल्कुल झूठ, निराधार और शरारत पूर्ण के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। दयानन्द जी ने बताया कि सिकंदर की लौटती सेना की बड़ी दुर्दशा हुई हिन्दुओ के छोटे छोटे गणराज्यों ने उनका ऐसा बुरा हाल किया कि ग्रीक मैदान छोड़कर भाग गए, उनमें एक भी छुद्रक और मालव के हिन्दू गणराज्यो ने सिकंदर को इतना सताया कि ग्रीक इतिहासकार भी उनके शौर्य की प्रशंसा किये बगैर नहीं रह सकें, वह सिकंदर एक बार बुरी तरह घायल भी हुआ हिन्दुओं की खड्ग से बेहोस और रक्तरंजित हुए सिकंदर को उसके सैनिक किसी तरह मैदान से बाहर निकाल लें गए वरना वह जीवित भारत से वापस न जा पाता। उसने अपने साम्राज्य में केवल पंजाब को ही जोड़ पाया (ईशा पूर्व325), पर हिन्दुओ ने ग्रीक अधिकारियों को भागकर पंजाब को भी जल्द ही मुक्त करा लिया केवल चार वर्षों में तत्कालीन बलशाली शत्रु का पावँ हिन्दुओं ने उखाड़ फेंका।
चंद्रगुप्त ने सेल्युकस को पराजित किया उसके कोई डेढ़ सौ वर्षों तक किसी परकीय की भारतीय सीमा पर हमला करने की हिम्मत नहीं हुई, लेकिन कुछ दिनों पश्चात मौर्य वंश के बौद्ध राजा बहुत दुर्बल हो गए एशिया के ग्रीक राजाओं ने एक बार फिर हिंदुस्तान पर आक्रमण करने की योजना बनायी, जिस प्रकार कमजोर नंदवंश को मारकर चंद्रगुप्त मौर्य ने साम्राज्य हासिल किया था उसी प्रकार वैदिक धर्माभिमानी मगध साम्राज्य के सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने उस दुर्बल बौद्ध राजा बृहद्रथ को मारकर राज्य की बागडोर अपने सुरक्षित हाथों में ले लिया। सम्राट सेनानी पुष्यमित्र शुंग की उपयुक्त विजय के बाद लगभग सौ सालों तक किसी भी अहिन्दू की आक्रमण करने की हिम्मत नहीं हुई, ग्रीको के एकाध आक्रमण करने पर पुष्यमित्र ने उन्हें खदेड़ कर सिन्धु पार का रास्ता दिखा दिया। फिर सैकड़ों वर्षों तक किसी की भी हिम्मत नहीं हुई कि वह भारत की ओर आँख उठाकर देख सकें।

जब स्वामीजी पहुंचे कोलकाता

स्वामीजी सम्पूर्ण भारत में आध्यात्मिक भ्रमण में स्वराज्य और स्वधर्म का विषय रख कर हिन्दू समाज को जागृत करने में लगे रहे, वे बड़े ब्यथित थे कि हमारे क्रांतिकारी, राजा व हिन्दू समाज कैसे इस 1857 के स्वतंत्रता संग्राम को हार गए उन्होंने बड़े धैर्य से इस विषय पर विचार मंथन करना शुरू कर दिया उन्हें ध्यान में था कि पूरा बंगाल अब अंग्रेजों के हाथ में जा चुका है, अंग्रेजों ने अपना मुख्यालय राजधानी कोलकाता को बना रखा था वायसराय कोलकाता में ही रहकर शासन करता था, भारत में एक परंपरा थी समुद्र लंघन बर्जित था, कोइ भी हिन्दू देश से बाहर नहीं जा सकता था लेकिन "ब्रम्ह समाज" का प्रधान कार्यालय कोलकाता में था उसके संस्थापक "राजा राममोहन राय" थे उनका उपनिषदों पर विस्वास तो था लेकिन अंग्रेजों को वे देवदूत मानते थे जो भारत के लिए बहुत बड़ा खतरा था, कहीं न कहीं वे चर्च के नजदीक पाए जाते थे इतना ही नहीं तो कुछ लोगों का मत था कि हिंदू समाज को ईसाई बनाने में ब्रम्हसमाज पुल का काम करता था। महर्षि दयानंद को लगता था कि योजना में कुछ कमी रह गई वह कमी क्या थी वे उसकी तलाश में थे। स्वामीजी मुम्बई से सीधे कोलकाता पहुचे।

वायसराय से भेंट बिना स्वराज्य के स्वधर्म सम्भव नहीं

ऋषि दयानन्द अपने समय के वेदों के महान अद्वितीय विद्वान थे, केवल वेदों के ही नहीं तो वैदिक ग्रन्थों का अध्ययन, ब्याकरण पर पूर्ण अधिकार रखते थे वे राष्ट्रवाद के प्रथम प्रतीक और प्रहरी थे उन्हें लगा कि देश की जनता जब तक अपने ग्रन्थों, अपनी संस्कृति को नहीं जानेगी तब तक प्रत्येक हिन्दू राष्ट्रवादी नहीं बन सकता, वे कोलकाता में सीधे ब्रम्हसमाज के कार्यालय में पहुंचे उस समय ब्रम्हसमाज के अध्यक्ष केशवचंद्र सेन थे वे भी विद्वान थे लेकिन उनका मानना था कि बिना अंग्रेजी भाषा के भारत की उन्नति नहीं हो सकता इसलिए वे अंग्रेजी शिक्षा पर अधिक ध्यान देते थे, स्वामी दयानंद सरस्वती को देखते ही वे भावविभोर हो गए उनकी दिव्य शरीर चेहरा देखते रह गए वे स्वामीजी को जानते थे पहचानते नहीं थे जब परिचय हुआ तो केशवचन्द्र सेन को लगा कि यह तो राजा राममोहन राय जैसे ही विद्वान उनके रिक्त स्थान को पूरा कर सकते हैं, ब्रम्हसमाज के मुख्यालय में प्रतिदिन प्रवचन होता था उसमें स्वामीजी के भी प्रवचन होने लगे लगभग एक महीना बीत गया स्वामीजी अपना छाप छोड़ते गए, अब स्वामीजी की मांग बढ़ने लगी, प्रतिदिन स्वामीजी प्रवचन में बोलते "बिना स्वराज्य के स्वधर्म का पालन सम्भव नहीं हो सकता" 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से अंग्रेज अधिकारी सतर्क रहने के कारण स्थान स्थान पर जासूस लगे थे ब्रम्हसमाज भी जासूसी का अड्डा बना हुआ था क्योंकि अंग्रेज यह समझते थे कि भारत का राष्ट्रवाद धर्म में बसता है एक दिन वायसराय के यहां से बुलाया आ गया की वायसराय स्वामी दयानंद सरस्वती का दर्शन करना चाहते हैं, बग्घी आयी स्वामीजी वायसराय से मिलने पहुंचे वायसराय ने स्वामीजी का बहुत आदर सम्मान किया बातचीत के क्रम में उसने स्वामीजी से पूछा कि स्वामीजी स्वराज्य का मतलब क्या है-? स्वामीजी बोले कि आपको इंग्लैंड भेज देना जब पुनः पूछा तो उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि सभी अंग्रेज भारत छोड़ कर अपने देश चले जायँ यही स्वराज का अर्थ है। वायसराय बहुत परेशान हुआ उसने तुरंत बग्घी बुला स्वामीजी को वापस भेज दिया, अंग्रेजों को साधू सन्यासियों से भय था कि यदि किसी साधू सन्यासियों को गिरफ्तार किया गया तो बिद्रोह हो जाएगा इसलिए उसने कोई ऐसा कदम नहीं उठाया।

राजा शौरींद्र और केशवचंद्र सेन

ब्रम्हसमाज में केशवचंद सेन का कार्यक्रम हुआ जिसमें राजा साहब उपस्थित थे प्रवचन में ईसाई धर्म सर्वश्रेष्ठ है हिंदू धर्म से श्रेष्ठ बताया गया अभिप्राय यह कि सनातन धर्म से ईसाई धर्म को अधिक सत्य मानते हैं, राजा साहब ने कहा "मैं मानता हूँ केशव बाबू ईसाईयों के बारे में कहना रणनीतिक है, परंतु दयानन्द तो सनातन धर्म का घोर विरोधी है, वह कहता है कि सांख्य दर्शन में भी ईश्वर को माना गया है", उसकी वाणी में प्रभाव तो है इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता, ऐसा प्रभाव तो क्रिस्तानो में भी था राजाराम मोहन राय में भी था इससे क्या होता है देखना है कि वे बात क्या कहते हैं ? काशी से एक विद्वान पंडित हमारे यहाँ आये थे कह रहे थे कि दयानन्द बड़े धुरंधर विद्वान हैं वहां शास्त्रार्थ में बड़े-बड़े धुरंधर पंडितों सनातन धर्मावलंबियों विद्वानों को पछाड़ दिया। "केशवचंद्र ने बताया इतना जनता हूँ कि वायसराय से लेकर छोटे-बड़े अंग्रेज अधिकारियों तक उनकी पहुंच है कुछ बात तो है इस सन्यासी दयानन्द में जो इतनी महिमा हो रही है, 'इंडियन मिरर' में प्रकाशित कल 'वाणी विज्ञप्ति' भी किसी की प्रेरणा से निकली है"। राजा शौरींद्र मोहन।ने बताया कि मुझे तो ऐसा लगता है "ये अंग्रेज सरकार के ब्यक्ति हैं जो अंग्रेजों ने हिन्दू धर्म के विनाश के लिए छोड़ा हुआ है, जहाँ भी जाता है अंग्रेज अफसर मिलने आते हैं", केशव बाबू ने तुरंत उत्तर दिया-- कि मेरा तो ऐसा विचार नहीं है, "यह पंडित हिंदू धर्म का विनाश नहीं वरन उसकी रक्षा करने आया है"। "यह सरकार की जड़ों में तेल डाल रहा है" वह निरंतर अपने देश में अपना राज्य स्थापित करने के लिए कह रहा है। "सन 1857 के विद्रोह के उपरांत मुझे यह पहला हिंदुस्तानी मिला है जो खुले आम कहता है कि हमारा अपना राज्य हो, अपना राष्ट्र हो, अपना राजा हो, अपना कानून हो, अपनी सेना हो, और अपना न्यायाधीश हो।" 

ब्रम्हसमाज शंका के घेरे में

स्वामी दयानंद सरस्वती वायसराय के यहां से वापस ब्रम्हसमाज के धर्मशाला में आ चुके थे, कुछ समय पश्चात वायसराय का शंदेश ब्रम्हसमाज के प्रधान केशवचंद्र सेन को मिला आप बिना समय गवाए जो स्वामी आपके धर्मशाला में रुका हुआ है उसे बाहर निकाल दीजिए और आगे लिखा कि यदि अपने यह बात नहीं मानी तो अंग्रेज सरकार ब्रम्हसमाज को सहयोग देती है बंद हो सकता है, केशवचंद्र सेन दबाव में आकरS स्वामी जी से निबेदन किया कि वे वह आश्रम छोड़ दें, स्वामीजी को कोई आश्चर्य नहीं हुआ उन्हें जो संदेह था उसका सबूत उन्हें मिल गया वे अन्य स्थान पर चले गए, दयानन्द सरस्वती को एक माह हो गया था कोलकाता में अभी वे और तीन महीने तक रहे शहर में प्रतिदिन कहीं न कहीं प्रवचन, संवाद चलता रहता था प्रत्येक जुबान पर स्वामीजी की प्रशंसा होती ब्रम्हसमाज की आलोचना, केशवचंद्र सेन भी उनके प्रवचन सुनने जाते थे एक दिन उन्होंने स्वामी से कहा स्वामीजी यदि आप यह प्रवचन हिन्दी में देते अथवा लोक भाषा में तो आम जन सामान्य के समझ में आता। काश स्वामीजी हिंदी व अंग्रेजी में बोलते स्वामीजी तुरंत उत्तर दिया काश केशवचंद्र सेन संस्कृति में बोलते-! स्वामीजी तो प्रत्येक अच्छी बात को ग्रहण करते थे और उन्होंने कोलकाता से ही हिंदी में संवाद व प्रवचन देना शुरू कर दिया। स्वामीजी की भेंट बहुत बड़े बड़े लोगों से हुई केशवचंद्र सेन सहित कई लोगों का आग्रह था कि आप वेदों पर भाष्य लिखे कहते हैं कि कोलकाता से लौटने के पश्चात उन्होंने वेदों पर भाष्य लिखना शुरू कर दिया। 

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