दिग्विजयी ऋषि दयानन्द भाग--14

जगत का ज्ञान श्रोत वेदज्ञान

''स्वामी दयानंद सरस्वती'' बताते हैं कि जहाँ भाषा है वहां ज्ञान भी है, यदि वेदवाणी ईश्वरीय है तो वैदिक ज्ञान भी ईश्वरीय है, इसलिए हम ज्ञान की उत्पत्ति के संबंध में आंदोलन करना चाहते हैं, हमने यह सिद्ध कर दिया है कि भाषा को मनुष्य स्वयं नहीं बना सकता प्रत्युत ईश्वर की ओर से बनी बनाई भाषा सृष्टि के आदि में मनुष्य को वेदवाणी के रूप में मिली थी, अब हम इस प्रश्न पर विचार करना चाहते हैं कि क्या मनुष्य को ज्ञान स्वयं बिना किसी के सिखाये प्राप्त हो सकता है या नहीं ? संसार भर का अनुभव इस बात का जीवित साक्षी है कि मनुष्य सिखाये बिना विद्वान नहीं बन सकता, जिस प्रकार भाषा एक-दूसरे को सीखते-सिखाते चला आ रहा है वैसे ही ज्ञान को एक-दूसरे मनुष्य से ग्रहण करता आया है और आगे भी यह क्रम चलता रहेगा, जहाँ मनुष्य में किसी भी नवीन भाषा का अविष्कार करने की क्षमता नहीं है वहाँ उसमें किसी भी नए ज्ञान को विकसित करने का भी सामर्थ्य नहीं है।


मनुष्य का कुछ ज्ञान नहीं

हम सुनते हैं कि 'न्यूटन' ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत की खोज की ? इससे कोई इंकार नहीं कर सकता परंतु इससे पूर्व हमे यह जान लेना चाहिए कि 'न्यूटन' ने जिस सिद्धांत की खोज किया जिसका वर्णन "सिद्धांत शिरोमणि" के रचयिता 'भास्कराचार्य' ने न्यूटन के पैदा होने से हज़ारों वर्ष पूर्व अपनी पुस्तक में किया था, भास्कराचार्य कहते हैं कि पृथ्वी में आकर्षण का स्वाभाविक गुण है, इसी आकर्षण के कारण पृथ्वी किसी भारी वस्तु को अपनी ओर खिंचती है, जो वस्तु गिरती है वह वास्तव में पृथ्वी की ओर उसके आकर्षण के कारण ही गिरती है। अब क्या 'भास्कराचार्य' ने यह खोज किया हो ऐसा नहीं यह ज्ञान हमारे ऋषियों मुनियों के पास पहले से ही था और ऋषियों ने इस सिद्धांत को ज्ञान के स्वाभाविक श्रोत से प्राप्त किया था, प्रकृति की जीवित पुस्तक अपना प्रभाव शुद्ध साधन रखने वाली आत्माओँ पर पहुंच सकती है और शुद्ध बुद्धि को रखने वाली आत्माएं प्रकृति के कार्य और ढंग को समझ सकती है। न्यूटन ने किसी वस्तु को गिरते हुए देखा इसका अर्थ यह नहीं है कि पहले कोई बस्तु नहीं गिरती थी।

अमैथुनी और मैथुनी सृष्टि--!

हिन्दू वैदिक धर्म में यह बात सर्वसामान्य में प्रचलित है कि 'ब्रम्हाजी' के मानस पुत्र, इसका अर्थ यह हुआ कि 'ब्रम्हाजी' सहित वे सब अमैथुनी सृष्टि के ऋषि थे जिन्हें वेदों का ज्ञान प्रथम ईश्वर द्वारा प्राप्त हुआ, 'स्वामी दयानंद सरस्वती' कहते हैं कि अमैथुनी सृष्टि ऋषि व ब्यक्ति सर्वथा पवित्र होते हैं, प्रकृति में कहीं मलिनता नहीं है, आदिसृष्टि के समय ऋषियों की आत्मा अपने पूर्ण उन्नति अवस्था में था और अमैथुनी शुद्ध शरीर रूप साधनों से युक्त थे, मैथुनीसृष्टि से शरीर धारण करने वाले व्यक्ति, आत्मा आदि सृष्टि की आत्माओं से अधिक शुद्ध मेधा बुद्धि धारण नहीं कर सकते, इसलिए जो शब्द अर्थ का ज्ञान आदि सृष्टि की आत्माओं ने अनुभव किया था उसका नाम 'अदर्शज्ञान' और उसी को पूर्ण ज्ञान कह सकते हैं, जिस प्रकार शब्दों की गंगा गंगोत्री से निकल कर अशुद्ध और मलीन होती जाती है ठीक इसी प्रकार ज्ञान की गंगा अमैथुनी सृष्टि के परम महर्षियों के हृदयों से पूर्ण अवस्था में निकली थी और उसके पश्चात वह जीवों की अविद्या के कारण मलिन दशा में दिखाई देने लगी, प्रकृति और पूर्णता को उन्नत बनाना असंभव है, इसलिए उस समय से लेकर भावी प्रलय पर्यंत कोई भी ऋषि इस अदर्शज्ञान को अधिक उन्नत नहीं कर सकता, मैथुनी सृष्टि शुद्ध और पूर्णदशा का दूसरा नाम है। अमैथुनी सृष्टि के ऋषि शेष ऋषियों के मुखिया हैं और मैथुनी सृष्टि के ऋषि यदि पूरा प्रयत्न करें तो उस ज्ञान के तल तक पहुंच सकते हैं।

प्राचीन सभ्यताएं

चीन और बाबुल की सभ्यता मिलती है और कंफ्यूशस की शिक्षा ने चीन में लोगों को एक परमेश्वर का विस्वासी बनाया उसने पितृयज्ञ, परोपकार, न्याय आदि की शिक्षा दिया, कागज बनाने और छापने का काम बहुत पुराने समय से चीन आगे बढ़ गया था, रेशमी और ऊनी कपड़ों के श्रेष्ठ वस्त्र बनाने में उच्च कोटि के शिल्पी थे, चीन के पश्चात यदि हम मिश्र पर दृष्टि डाले तो लगता है कि वर्तमान समय की सभ्यता से पहले से बढ़ी चढ़ी सभ्यता विद्यमान थी, मिश्र के प्राचीन राजा का नाम 'मेनीज' थ 'मिस्र' वह देश था जहाँ 'अफलातून' जैसा विद्वान उसके विद्याधन भिक्षुक वनकर यूनान से आया करते थे, राज्य प्रबंधन की उत्तम ब्यवस्था के कारण कभी विद्रोह नहीं होता था, वहां की वर्ण व्यवस्था भारत जैसे थी, सबसे प्रथम पुरोहितों का स्थान था फिर सैनिक का, उनसे कम कृषकों और ब्यापारियों का स्थान था, नील नदी के किनारे रंग-विरंगे लंगरो से लहराते हुए जलयान आपनी गरिमा दर्शाते थे।

विश्व सभ्यताओं की जननी

भारतवर्ष के विषय में "जैकालियट" लिखता है कि-- मैं अपने ज्ञान नेत्रों से भारत को अपना विधान, अपने संसार, अपनी सभ्यता और अपना धर्म मिस्र, इरान, यूनान और रोम को सौपते हुए देख रहा हूँ, मैं 'जैमिनी' और 'वेदव्यासजी' को 'सुकरात' और 'अफलातून' से पहले पाता हूँ। "पुराने भारतवर्ष के गौरव का अनुमान लगाने के लिए यूरोप में प्राप्त की गई विद्या किसी काम की नहीं आती और पुराने भारतवर्ष को जानने के लिए हमें ऐसा प्रयत्न करना चाहिए जैसे एक बच्चा नए सिरे से पाठ याद करता है।" मैं विस्वास पूर्वक यह कह सकता हूँ कि मिस्र के पुरोहित नील नदी से गंगा और यमुना नदी तक आते रहे होंगे और यह सम्भव है कि वे भारत के श्रमणों अर्थात ब्राम्हणों से मिलने के लिए आते होंगे, ठीक वैसे ही जैसे कि युनान के विद्वान उनकी भेंट विद्या ग्रहण करने को जाया करते थे। "दबिस्ता" का लेखक यह वर्णन करता है कि पुराने ईरानियों के पूर्वज हिंदू थे, वह कहता है कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि महाबाद अथवा 'महर्षि मनु'  की पुस्तक जो देववाणी में लिखी गई है उससे अभिप्राय वेद से है, इसलिए 'जरदुस्त' केवल सुधारक था, हम भारत में ईरान के पुराने मत की जड़ पाते हैं।

बृहत्तर भारत

"यह अत्यंत ही विचित्र बात है कि 'पीरू' निवासी (दक्षिण अमेरिका के देश) जिनका पूर्वज 'इंकस' सूर्यवंशी कहलाने का अभिमान करता था, अपने बड़े त्योहारों को 'राम उत्सव' के नाम से पुकारते हैं, जिससे परिणाम निकाला जा सकता है दक्षिणी अमेरीका में वही जाति बसती थी जो कि एशिया के सुदूर क्षेत्रों में 'राम चरित्र' और 'राम कथा' लेकर गई है।" भारत के भवन और ध्वंसावशेष बतलाते हैं कि अफ्रीका और भारत का निकट सम्वन्ध था, मिस्र के मीनारों और बुद्ध के मंदिरों के बनाने वाले एक प्रकार के शिल्पी रहे होंगे, उन भवनों पर अक्षर कुछ भारतीय, कुछ एबीसीनिया या इथोपिया के प्रतीत होते हैं, इससे विदित होता है कि इथियोपिया और भारत एक ही जाती से बसे हुए होंगे, हिंदू समाज बहुत प्राचीन काल से पुराने फारस निवासियों, इथियोपिया, मिस्र, फोनीसिया, यूनान, टर्की, सीथिया, ओर्गाथ, केल्ट, चीनी, जापानी और पीरू निवासियों से सम्वन्ध रखते आये हैं, जिससे हम कह सकते हैं कि ये जातियां हिंदुओ की बस्तियां रही होगी या उनमें से किसी ने सबको बसाया होगा। एशियाटिक रिसर्चेज के दूसरे खंड में 'विलियम जोन्स' कहता है--- "मैं 'जिन्दावस्था' के शब्दों को देखकर आश्चर्यचकित रह गया, दस शब्दों में छः या सात शुद्ध संस्कृति के हैं।"

सृष्टि का प्रारंभिक काल व स्थान

'एक अरब छियानबे करोड़ आठ लाख बावन हजार नौ सौ छियानबे' वर्ष पूर्व जब पृथ्वी पर प्रथम बार सृष्टि का निर्माण हुआ वह स्थान पृथ्वी का हरा भरा टुकड़ा ''तिब्बत'' था, जिसे संसार की छत भी कहा जाता है, ईश्वरीय नियमानुसार मनुष्य देह को धारण किये हुए 'अमैथूनी ऋषि' तिब्बत के प्राकृतिक उद्द्यानों में विराजमान हुए, मनुष्यता के पूर्ण नमूने ऋषियों ने उस अनुभव की हुई वैदिक ज्योति को जीवन में चरितार्थ करते हुए अपनी संतानों को ऐसा ही करने का उपदेश दिया, उस समय मनुष्य जाति का सबसे उत्तम और गर्वसूचक नाम 'आर्य' था। तिब्बत भूमि पर आर्यसन्तान की बृद्धि होने लगी, उधर ईश्वर के प्रबंध अनुसार पृथ्वी के विभिन्न हिस्सों जिसे अब द्वीप कहा जाता है लोगों ने अपने घर बनाने शुरू कर दिया, आर्य संतानों ने पृथ्वी के भूभागों को बसाना आरंभ कर दिया, समयानुसार पृथ्वी के हरे-भरे क्षेत्रों को आर्यो ने फलित पोषित किया और एक भी ऐसा स्थान व एक इंच भूमि ऐसी न रही जहाँ, जिस भूमि पर ऋषियों की संतानों ने बैठकर वैदिक ध्वनि न किया हो। करोङों वर्षों तक यह भूभाग ओंकार की उपासक, वैदिक धर्म व आर्यजाति का स्वर्ग बना रहा।

स्वामी दयानंद और मनुस्मृति

'महर्षि दयानंद सरस्वती' ने अपने 'ग्रंथों' के लिए 'मनुस्मृति' को प्राथमिक आधार मानकर ग्रंथों की रचना की है, उन्होंने 514 श्लोकों को प्रमाण स्वरूप उधृत किया है, अनेक श्लोकों के केवल भाव ग्रहण किये हैं, ''महर्षि मनु'' के श्लोकों पर ''महर्षि दयानंद'' का समग्र भाष्य प्रस्तुत करना तथा अपने ग्रंथों में ऋषि ने 'मनुस्मृति' के जिस-जिस श्लोक का भाष्य किया है, उसका महर्षि ने शोधपूर्ण भाष्य किये हैं, महर्षि ने किसी श्लोक को अपने ग्रंथों में एक से अधिक बार उधृत करके भाष्य किया है तो उन सभी अर्थों को उदृत कर दिया है, महर्षि ने भाष्य करके 'मनुस्मृति' की अनेक गुत्थियां सुलझा लिया है, एक ऋषिकृत ग्रन्थ पर एक ऋषि का भाष्य करने से "सोने में सुगंध" जैसे हो जाता है यानी उसका महत्व और भी बढ़ जाता है, मनुस्मृति के लगभग 600 श्लोकों पर शोध कार्य करके समीक्षा करके उसमें श्लोकों के भावों, गुत्थियों, विवादों, मान्यताओं तथा अन्यान्य बातों का विचार किया गया है और अधिक से अधिक स्पष्ट करने तथा सुलझाने का प्रयत्न किया गया है, समीक्षा में वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों, संहिताओं, उपनिषदों, दर्शनों, व्याकरण और सूत्र ग्रंथों, निरुक्त सुश्रुत तथा कौटिल्य अर्थशास्त्र आदि के अनेक प्रमाण से प्रमाणित एवं पुष्ट किया गया है, यही स्वामी दयानंद सरस्वती की विशेषता है और अन्य विद्वानों से उन्हें अलग करती है।

मनुस्मृति का पुनः खोजना

मनुस्मृति-विरुद्धा या सा स्मृतिर्न प्रशस्यते। वेदार्थोपानिबद्धत्वात प्राधान्यं हि मनो: स्मृते:॥
                                                                   (बृहस्पति स्मृति, संस्कार खण्ड 13-14)
अर्थात-- "जो स्मृति मनुस्मृति विरुद्ध है, वह प्रशंसा के योग्य नहीं है, वेदार्थों के अनुसार वर्णन होने के कारण मनुस्मृति ही सब मे प्रधान और प्रशंसनीय है।"
गत आठ सौ वर्षों के संघर्ष के कारण हमारे अन्दर हीन भावना की ग्रंथी बन गई थी हमने अपने मूल ग्रंथों को भी भुला दिया था और जिस प्रकार षड्यंत्र के तहत देवताओं के "राजा इन्द्र" पर बहुत प्रक्षेपण किया गया है, जिस 'इन्द्र' का 'वेदों' में कितने बार वर्णन मिलता है जिसकी तुलना अधिकांश महापुरुषों से होती है, उसके ऊपर बाममार्गियो ने बौद्धों ने षड्यंत्र पूर्वक क्षेपक डाल 'इन्द्र' जो देवताओं का राजा है उसे मजाक का पात्र बना दिया है, उसी प्रकार "महर्षि मनु" द्वारा रचित 'मनुस्मृति मानवता के प्रथम विधान' के बारे में भ्रम फैलाने का काम इन्हीं लोगों ने योजनाबद्ध तरीके से किया, यहाँ तक कि मनुस्मृति कोई ग्रंथ है लगभग हिंदू समाज भूल सा गया था अपने मूल ग्रंथ से चिढ़ सी हो गई थी, लेकिन जिस प्रकार 'स्वामी विरजानंद' को व्याकरणाचार्य अथवा व्याकर्णाऔतार माना जाता है, ठीक उसी प्रकार 'स्वामी दयानंद सरस्वती' को यदि यह कहा जाय कि पुनः 'मनुस्मृति' को धरती पर लाने का काम किया तो अतिसयोक्ति नहीं होगा इसलिए स्वामी जी ने केवल मनुस्मृति को खोजा ही नहीं तो उसमें क्षेपक को चिन्हित भी किया और उसकी प्रमाणिकता को सिद्ध कर दिखाया, मनुस्मृति में प्रक्षेपों का भरमार होना, एक महान तत्वदृष्टा ऋषि के अनुपम शास्त्र को स्वार्थी प्रक्षेपकर्त्ताओं ने विविध प्रक्षेपों से दूषित करके न केवल इस शास्त्र के साथ अपितु महर्षि मनु के साथ भी अन्याय किया है, स्वामी दयानंद सरस्वती ने पुनः मनुस्मृति की प्रतिष्ठा सार्थकता को साबित करके मानव जाति के ऊपर उनका उपकार ही होगा।

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