दिग्विजयी ऋषि दयानन्द - भाग--13

वेदों के भाष्य पर आग्रह

स्वामी दयानंद सरस्वती का प्रवास पूरे देश में जहाँ शास्त्रार्थ के माध्यम से सत्यशास्त्र सत्यविद्या के प्रचार में लगे थे, स्वराज्य हेतु क्रांतिकारियों को खड़ा करने का काम कर रहे थे वहीं वेदों के भाष्य के लिए भी बहुत लोगों की इक्षा का सम्मान करना, जब वे कलकत्ता गए तो केशवचंद्र सेन, महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर और तमाम विद्वानों ने स्वामी जी से आग्रह किया कि उन्हें वेदों का भाष्य करना चाहिए और प्रवचन हिंदी में करना चाहिए, देश के अन्य लोगों ने तथा महाराणा ने भी बहुत आग्रह किया कि आप जैसे महान पंडित को वेदों का भाष्य करना आवश्यक है जो भी आप देश भर में घूम-घूम कर सत्य विद्या का प्रचार कर रहे हैं, जो हमारे धर्म व संस्कृति का आधार है उसे ''मैक्समूलर'' ने विकृत करने का काम किया है उसने भी महीधर, सायण, रावण और उलूक जैसे भाष्यकारों को ही आधार बनाकर भाष्य किया है इसलिए समय की आवश्यकता है कि आप वेदों का ऋषियों की वाणी निरुक्त, निघंटु (वेदों का व्याकरण) के आधार पर भाष्य करना चाहिए।

भारतीय आत्मा

वास्तविकता यह है कि प्रत्येक भारतीयों का श्रद्धा केंद्र है 'वेद' ! भले ही वह 'वेद' पढ़ा नहीं हो, देखा भी नहीं हो, लेकिन वह जो कुछ भी करता है उसे लगता है कि मैं 'वेदानुकूल' ही सब कर रहा हूँ यही है भारतीय विशेषता, किसी प्रकार का कोई भी कर्मकांड करता है वह उसे वैदिक ही बताएगा, भारत के जन मानस में प्रत्येक हिन्दू समाज के रग-रग में यह वैदिक संस्कृति समायी हुई है, भारतीय जन-मानस में यह मान्यता है कि ''वेद'' सच्चिदानंद लक्षण वाले 'ईश्वर' से प्रकाशित हुए हैं, वेद में परमेश्वर की स्तुति है, 'वेद ईश्वरीय' ज्ञान है मनुष्य कृत नहीं, परमात्मा ने सृष्टि की आदि में ईश्वर ने ब्रम्हा जी के हृदय में वेदों का प्रकाश किया। कोई भी मत, पंथ होगा सभी अपने मत को वैदिक धर्म का ही मानते हैं यही भारतीय विशेषता है, यदि हम यह कहें कि वेद भारत की आत्मा है तो इसमें कोई अतिसयोक्ति नहीं।

मुरसान के राजा

'मुरसान' के राजा 'टीकमसिंह' स्वयं टिपिन लेकर आये और स्वामी जी, बलदेव सिंह सहित उनके साथ 'मथुरा' से सवार होकर चले, मुरसान पहुंच कर राजा साहब के बंगले में उतरे और राजा साहब ने ठाकुर गुरुप्रसाद सिंह रईस को कहला भेजा कि ''स्वामी दयानंद जी'' ठहरे हुए हैं, तुम कहते हो मैने सायण भाष्य के अनुसार यजुर्वेद का भाष्य किया है, तुम कहते हो कि दयानन्द वेद का अर्थ नहीं जानते सो आकर निर्णय करो, वे नहीं आये, तब राजा टीकमसिंह ने कहा कि तुमको कुछ नहीं आता वास्तविकता यह है और स्वामी जी को बड़े सम्मान से मेडू स्टेशन पहुचाये और वेद भाष्य का आग्रह किया।
'नीलकण्ठ मोरे' नाम का 'इसाई मराठा' प्रो मैक्समूलर द्वारा ''ऋग्वेदभाष्य'' लेकर आया, इसलिए कि 'अग्नि का अर्थ केवल आग है, ईश्वर नहीं', स्वामी दयानंद जी ने उसको उत्तर दिया कि "प्रो मैक्समूलर ने वेदमंत्रों का भाष्य करने के लिए केवल इन्हीं अर्थों का प्रयोग किया है तो इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं है; क्योंकि एक पक्षपात पूर्ण ईसाई होने के नाते उसकी हार्दिक इक्षा है कि वेदार्थ को बिगाड़े जिससे भारतवासी अज्ञान में फसकर वेदों को छोड़ दें और बाइबिल को ग्रहण करे, अतः उसके पक्षपात पूर्ण होने से उसका भाष्य प्रामाणिक नहीं हो सकता।"

भाषा-शैली

जिस प्रकार किसी पुस्तक की भूमिका होती है उसी प्रकार चारों वेदों के भाष्य की भूमिका 376 पृष्ठों की पृथक पुस्तक के रूप में महर्षि ने तैयार करके छपवाई उसका नाम "ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका" रखा, इस भूमिका में जो जो संस्कृति लेख हैं वह महर्षि का और जो उसका भाष्य है वह उनका अनुवाद किया हुआ है। जो-जो भाष्य उव्वट, महीधर, सायण आदि ने बनाये हैं वे सब मूलार्थ और सनातन वेद व्याख्यानों के विरुद्ध है तथा जो-जो इन नवीन भाष्यों के अनुसार अंग्रेजी, जर्मनी, दक्षिणी और बंगाली आदि भाषाओं में वेदव्याख्यान बने हैं वे भी अशुद्ध हैं। इस भाष्य में पद-पद का अर्थ पृथक-पृथक क्रम से लिखा जायेगा कि जिससे नवीन टीकाकारों के लेख से जो वेदों में अनेक दोषों की कल्पना की गई है उन सबकी निवृत्त होकर उनके सत्य अर्थो का प्रकाश हो जाएगा तथा जो-जो सायण, महीधर, माधव और अंग्रेजी का अन्य भाषा में उल्था व भाष्य किये जाते वा गए हैं तथा जो देशांतर भाषाओं में टीका है, उन अनर्थ व्याख्याओं का निवारण होकर मनुष्य को वेदों के सत्य अर्थों को देखने से अत्यंत सुख-लाभ पहुचेगा, इत्यादि प्रयोजनों के लिए इस वेदभाष्य के बनाने का आरंभ किया है।"

वेदों के चार भाग

महर्षि बतलाते हैं कि "भिन्न-भिन्न प्रकार के ज्ञान की दृष्टि से वेदों के चार भाग हैं, ''ऋग्वेद'' में सब पदार्थों के गुणों का प्रकाश किया है जिससे उनमें प्रीति बढ़कर उनसे उपकार लेने का ज्ञान प्राप्त हो सके तथा ''यजुर्वेद'' में क्रियाकांड का विधान लिखा गया है सो ज्ञान के पश्चात ही कर्ता की प्रवृत्ति यथावत हो सकता है तथा ''सामवेद'' से ज्ञान और आनंद की उन्नति और ''अथर्ववेद'' से सर्व संशयों की निवृत्ति होती है इसलिए इनके चार भाग किये हैं।"

वेदमंत्रों की प्रयोगशैली

'निरुक्त' के प्रमाणों से वेदमंत्रों की प्रयोगशैली को बताते हुए गायन विद्या संबंधी वैदिक स्वर का वर्णन किया है, फिर 'वैदिक व्याकरण' के उन सिद्धांतों को जिनसे कि वेदमंत्रों का अर्थ जानने में विशेष रूप से सहायता मिलती है प्रमाण पूर्वक दर्शाते हैं, इसके आगे वैदिक अलंकारों का वर्णन है। इसको जो लोग ठीक-ठीक परिश्रम से पढ़े और विचार करेंगे उनको व्यवहार और परमार्थ का प्रकाश, संसार में मान और कामना सिद्ध अवस्य होगी, इस ऋग्वेद से सब पदार्थों की स्तुति होती है-- "ऋग्वेद शब्द का अर्थ यह है कि जिससे सब पदार्थों के गुणों और स्वभावों का वर्णन किया जाय वह ऋग और वेद अर्थात जो यह सत्य सत्य ज्ञान का हेतु इन दो शब्दों से ऋग्वेद बनता है, ऋग्वेद में आठ अष्टक और एक-एक अष्टक में आठ-आठ अध्याय हैं, सब अध्याय मिलकर चौसठ होते हैं,--- आठों अष्टक के सब वर्ग दो हज़ार चौबीस होते हैं तथा इसमें दस मंडल हैं। दसो मंडलों में 185 अनुवाक, एक हजार अट्ठाइस सूक्त और दस हजार पांच सौ नवासी मंत्र हैं, यजुर्वेद में चालीस अध्याय है और सब अध्यायों के समस्त मंत्रो की संख्या एक हजार नौ सौ पचहत्तर है।"

महर्षि दयानंद का ही भाष्य क्यों पढें--?

महर्षि दयानंद सरस्वती ने अपने वेदभाष्य के संबंध में अनेक स्थानों पर इस प्रकार लिखा है---!

(क) 'जब मेरा वेदभाष्य पूर्ण हो जायेगा तो पूर्ण तया सिद्ध हो जाएगा कि मेरे सिद्धांत वेदानुकूल हैं।'
(ख) 'मैं वेदों में कोई बात युक्ति विरुद्ध व दोष को नहीं देखता, और उन्हीं पर मेरे सिद्धांत वेदानुकूल हैं।'
(ग) 'परमात्मा की कृपा से मेरा शरीर बना रहा और कुशलता से वह दिन देखने को मिला कि वेदभाष्य पूर्ण हो जाय तो निःसंदेह आर्यावर्त देश में सूर्य का सा प्रकाश हो जायेगा कि जिसको मेटने और झापने का किसी को सामर्थ्य न होगा, क्योंकि सत्य का मूल ऐसा नहीं है कि जिसको कोई सुगमता से उखाड़ सके।'
(घ) 'इस वेदभाष्य से वेदों का जो सत्य अर्थ है, वह सब सज्जन लोगों के आत्माओं में यथावत प्रकाशित होगा, तथा वेदों के ऊपर लोगों ने जो मिथ्या व्याख्यान दिये हैं उनकी निवृत्त भी इस भाष्य से अवश्य होगी।'
(च) 'यह भाष्य ऐसा होगा कि जिससे वेदार्थ से विरुद्ध अब तक के बने भाष्य और टीकाओं में वेदों में भ्रम से जो मिथ्या दोषों के आरोप हुए हैं, वे सब निवृत्त हो जायेगे, और इस भाष्य से वेदों का जो सत्य अर्थ है वह संसार में प्रसिद्ध होगा कि वेदों के सनातन अर्थ को सब लोग यथावत जाने।'
(छ) 'जो यह मेरा भाष्य बनता है सो तो वेद, वेदाङ्ग, ऐतरेय, शतपथ ब्राह्मण ग्रंथों के अनुसार होता है, क्योंकि जो जो वेदों के सनातन व्याख्यान हैं, उनके प्रमाणों से युक्त बनाया जाता है, यही इसमें अपूर्वता है।'
महर्षि की मान्यता है---! सर्वतंत्र सिद्धांत, ऋषि दयानन्द ने अपने समस्त ग्रंथों में उन्हीं सत्य सिद्धांतों तथा मान्यताओं का सप्रमाण प्रतिपादन किया है, जो वेदादि सच्चाशास्त्रो के अनुकूल है और जिन्हें ब्रम्हा जी से लेकर जैमिनी मुनि पर्यंत समस्त आप्तपुरुष, मंत्रार्थद्रष्टा ऋषि मुनियों ने एकमत से स्वीकार किया है।
                                                                                                           (ऋग्वेद भाष्यभूमिका)

ऐतिहासिक दृष्टि

ऐसा प्रतीत होता है कि महाभारत के युग से पहले से ही जिसका समय, अंग्रेजी गणना के अनुसार भी और औषत अनुमान के आधार पर भी ईसा से छः सात सौ वर्ष पहले होता है वेदों की शिक्षा और ब्याख्या भारत में नियम से होती थी और वेदों की टीका तथा ब्याख्या की सुविधा की दृष्टि से भाष्य, शब्द कोष और ब्याकरण लिखे जाते थे, समय समय पर क्रांतियां और विध्वंस होने पर भी इन रचनाओं में से कोई कोई रचनायें अब भी विद्यमान हैं, ये रचनाये यद्यपि कम मिलती हैं परंतु सर्वथा नष्ट नहीं हुई, इनमें से अधिक प्रसिद्ध पुस्तकें इस प्रकार है-- ब्राह्मण ग्रंथ, निरुक्त, निघंटु और पाणिनी मुनिकृत व्याकरण आदि, इसलिए इन पुस्तकों को वेदों की सबसे पुरातन और विस्वसनीय व्याख्या और व्याकरण समझना चाहिये, जब महाभारत युद्ध का युग आया तो उस समय हिंदू समाज की जड़ पर भयंकर कुठाराघात हुआ, उस समय लोगों को विद्याध्ययन के स्थान पर आजीविका पर अधिक ध्यान रखा, इस युद्ध में समस्त देश का उत्तरी भाग किसी न किसी एक ओर हो गया, न केवल युद्ध के दिनों में बल्कि कई शताब्दियों पश्चात तक भी वेदोक्ति शिक्षा का पूछने वाला कोई न रहा, जब कुछ शान्ति और ब्यवस्था का समय आया तो वेदों की शिक्षा की नए सिरे से चर्चा होनी प्रारंभ हुई और नए प्रकार की पाठशालाएं शुरू हुई और नए भाष्य बननेलगे, जिसमें प्राचीन ऋषियों के भाष्यों का ध्यान न रखा गया, प्रत्युत लोगों ने उस समय के अनुसार मनमाने ढंग से भाष्य बना लिए, अभी इससे बुरा काल आगे आने वाला था अर्थात वह समय जब बौद्ध मत इस देश में फैलने लगा, वेदों के विद्वान पकड़ पकड़ कर मारे जाने लगे और उनकी पवित्र पुस्तकें जलायी गई और नष्ट कर दी गई, अभी बौद्ध मत को देश से निकाले हुए थोड़ा ही समय ब्यतीत हुआ था और ब्राम्हणों को विजय प्राप्त हुए बहुत अधिक समय नहीं हुआ था कि और अधिक भयानक शत्रु का सामना करना पड़ा, महाभारत युद्ध ने और बौद्ध मत ने देश का नाश करने में जो कमी शेष बची थी वह मुसलमानों की विजय ने पूरी की, समस्त कला कौशल और वैदिक शिक्षा की समाप्ति हुई, सायण, महीधर, उव्वट, और रावण के भाष्य इसी के पीछे के काल के हैं। इनसे केवल हानि ही हुई लाभ कुछ भी नहीं हुआ और साधारण लोगों के हृदयों पर इन टीकाओं से ऐसा प्रभाव पड़ा कि प्राचीन ऋषियों के भाष्यों को कोइ पूछता ही नहीं, परंतु भविष्य में एक प्रकाश प्रकट होने वाला था, पिछले आघात के अंत में कोलब्रुक, जोन्स और और कैरी सरीखे बड़े बड़े विद्वानों का ध्यान संस्कृति भाषा की ओर गया, परिणामस्वरूप इन लोगों के आंदोलन ने भाषा विज्ञान में वह वह चमत्कार दिखाया कि बाप, बर्नाफ, श्लेगल, विल्सन, वेबर और मैक्समूलर सरीखे पूर्वी भाषाओं के विद्वान उत्पन्न हुए, इस आंदोलन का परिणाम न केवल राजेन्द्र लाल मित्र ही हुए प्रत्युत आशा है कि दयानन्द सरस्वती के वेदभाष्य के द्वारा वेदविद्या की कुंजी हमको मिलेगी।

 मैक्समूलर केे वेद संहिता की भूमिका में

भारतवर्ष में वेदज्ञान का कम होना इस बात से सिद्ध होता है कि स्वामी दयानंद सरस्वती के बारम्बार चुनौती देने पर भी कोई भी पंडित इस बात को सिद्ध करने के लिए अभी तक सामने नहीं आया है कि वेदों में मूर्ति पूजा है, यद्यपि वे सारे कहते हैं कि यह इनमें है, ऐसी दशा होने का यह कारण है कि भारतवर्ष में वेदों को केवल मौखिक याद कर लेते हैं और उसके अर्थ को समझते नहीं, इसके विपरीत स्वामी दयानंद सरस्वती ने केवल अपनी वाग्मिता और प्रबल युक्तियों के बल से लोगों के हृदय को विस्वास दिला देता है, प्रत्युत अपने वेदभाष्य में शब्दों के इतिहास और प्रत्येक स्थल को जिससे वह अपने अर्थ करता है, बतलाता जाता है और जो अर्थ वह शब्दों को देता है वह वेदों, ब्राह्मणों, निघण्टु और पाणिनी के व्याकरण से सिद्ध करता जाता है।

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