हिंदू पदपादशाही के संस्थापक क्षत्रपति शिवाजी राजे

 युग पुरूष क्षत्रपति शिवाजी महाराज

प्रयागराज का वटवृक्ष

भगवान श्री कृष्ण श्रीमद्भागवत गीता में कहते हैं कि जब जब धर्म की हानि होती है तो मैं आता हूँ और विधर्मियों का नाश करता हूँ और वे आये वे बार बार आकर अपने कार्य को करके चले जाते हैं। एक प्रसिद्ध इतिहासकार हुए हैं जिन्हें हम जदुनाथ सरकार के नाम से जानते हैं उन्होंने शिवाजी महाराज के जीवन का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि हिंदू समाज का ऐसा विस्वास है कि प्रयागराज किले में जो वटवृक्ष है वह सृष्टि के समय से है यानी "एक अरब छानबे करोड़ वर्ष" पुराना, जहाँगीर को लगा कि यदि यह "वटवृक्ष" समाप्त हो जायेगा तो हिंदू समाज समाप्त हो जाएगा उसने वटवृक्ष को जड़ो से केवल काटा ही नहीं बल्कि कुआँ खुदवाकर उसकी जड़ो में खौलता हुआ सीसा डलवा दिया। अविनाशी ऐसे वृक्ष को मैंने पूरा नष्ट किया है ऐसा वड़े गरुर से ऐलान किया, परंतु क्या हुआ?  वह वृक्ष एक वर्ष के अंदर ही जलकर भस्म हुए उन्हीं जड़ो से वह वटवृक्ष फिर से अंकुरित हुआ। और आवृत्त किये हुए सीसे के दुर्भेद्य कवचों को चीरते हुए बढ़ता गया। उस सीसे की कवचों जैसी दासता की श्रंखलायें, अत्याचार आदि हिंदुत्व के वटवृक्ष को सैकड़ों वर्षों तक ध्वस्त कर सेंध कर बैठे थे। यही बात शिवाजी महाराज ने अपने जीवन से सिद्ध कर दिखाया।

शिवाजी महाराज का जन्म

1630 ई. की 19 फरवरी को "शिवनेरी" के किले में शिवाजी महाराज का जन्म हुआ। शक संबत 1551 शुक्ल पक्ष फाल्गुन तृतीया तिथि को हिंदुभुमि के इतिहास में ही अमृत घटिका सिद्ध हुई। माता जीजा की कोख से वीर शिवा का जन्म हुआ। दिनो- दिन पेट तथा घुटनों के बल आगे खिसकते - खिसकते वह रेंगने लगा और दहलीज पार कर, कल इसी तरह अपना पुत्र असंख्य ग्राम नगर दुर्गो की दहलीज भी पार करे, अपना साम्राज्य स्थापित करे, स्वधर्म-स्वदेश का संरक्षण हो, ऐसी महत्वाकांक्षा उस माता जीजाबाई के मन में पनपने लगा। ऐसी ही उस महामाता के हृदयतरंग की कामना थी। वीर सरदार शाहजी राजा का हाथ थामने वाली जीजाबाई ने राजनीति और युद्धनीति में भी निपुणता प्राप्त कर कालांतर में अपने पुत्र को उसी राजनीति की घुट्टी घोलकर पिलाना शुरू कर दिया। पिता शाहजी विधर्मी की सेवा में बुरी तरह पस्त हुए एक शूर सरदार थे। इसलिए उनके अंतर्मन की इच्छा थी कि अपना पुत्र शिवाजी स्वातंत्र्य एवं स्वाभिमान के जलवायु का आकंठ पान करता हुआ बड़ा हो। शिवा किसी अन्य स्थान पर सिंह शावक के समान स्वतंत्र रीति से बड़ा हो सके, इस विचार से उसे शिवनेरी से पुणे भेजने का निर्णय किया। पुणे शाहजी के जागीर का एक अंग था, माता जीजाबाई एवं दादा कोड़देव के साथ पुणे पहुंचा हुआ शिवा तब केवल छः साल का था। गुरु दादाजी कोंणदेव तथा माता जीजाबाई के शिक्षण से इतनी कम आयु में ही उसमें एक एक कर सब अद्भुत सद्गुण अंकुरित पल्लवित होने लगा। माता जीजाबाई शिवा को राम, कृष्ण, अर्जुन, भीम, महावीर बजरंगबली इत्यादि रामायण, महाभारत ब्राम्हण ग्रंथों उपनिषदों की वीर गाथाएं बड़े अच्छी तरह सुनाती थीं। वह उसे बड़ी रूचि से सुनता था, उन महापुरुषों के जीवन का एक मात्र संदेश उस बाल शिवा के अंतःकरण में अंकित हो रहा था।-- "दुष्ट निर्दलन, शिष्ट परिपालन" ।

बचपन में संस्कार

वास्तव में इस वीर शिरोमणि के कुल के बारे में भी जानना चाहिए क्योंकि समाज बहुत गलत फहमी का शिकार है, जब मेवाड़ की राजधानी उदयपुर जाते है वहाँ सिटी पैलेस पहुचते हैं तो सिटी पैलेस के गेट दरबार पर सिसौदिया कुल की एक बंशवली लगी हुई है उसमें जो वर्णन है वह इस प्रकार है। उस कुल का एक वंश उत्तर दिशा में जाता है जिसने नेपाल में गोरखा राज्य स्थापित किया आज जो राजवंश है वह वही है दूसरा वंश दक्षिण दिशा में जाता है जिसे हम मराठा साम्राज्य के संस्थापक क्षत्रपति शिवाजी महाराज के नाते जानते हैं। जो इतना कुलीन राष्ट्र भक्त हिंदू स्वाभिमान रक्षक कुल से संबंध रखता हो तो वह और उसका जन्मजात संस्कार तो वैसा ही होगा।

पुणे इस्लामी हमलों का जीता जागता खंडहरों में से एक था, जहाँ मठ, मंदिरों के भग्नावशेष शिवा की स्वाभाविक उत्सुकता उमड़ रही थी! यह मंदिर किसने तोड़ा ? यह मूर्ति क्यों टूटी फूटी पड़ी है ? यहाँ के लोग क्यों और कैसे कंगाल बने ? ऐसे सैकड़ो प्रश्नों का उत्तर अपनी माँ से पूछता रहता था। अब राजा हमारा नहीं है, उन विधर्मियों ने ही हमारे मंदिरों का विध्वंस किया है। हमारा धर्म संकट में है माँ ऐसे ही उत्तर देती! यह सब सुनकर बाल शिवा तिलमिला उठता था, विधर्मी लोगों का वह राक्षसी अट्ठहास देखकर शिवा क्षुब्ध हो उठता था, असंख देवियों के चीत्कार, हाहाकार उसके हृदय को भेद देती थी। "इन सबका परिहार, प्रतिकार कौन करेगा ?" इस सबके उत्तर शिवा स्वयं अपने में ढूढने लगा ! अपने मित्रों समवयस्क बालकों को अपने साथ लेकर माटी के किले बनाकर युद्ध का खेल खेलना किलों को जीतना उसका प्रिय खेल बन गया। अब शिवा दस वर्ष का हो गया है, तब बंगलौर में रहने वाले शाह जी राजा को पुत्र दर्शन की इच्छा उत्पन्न हुई। उन्होंने पुत्र को अपने पास बुलाया, माता जीजाबाई भी साथ में आईं शिवा को शिक्षा का एक पड़ाव समाप्त कर अगले पड़ाव पर पहुचना था, बंगलुरु में ही उसकी सर्जनशील प्रतिभा विकसित होनी थी।

और बीजापुर दरबार

शाहजी को एक बार बीजापुर जाना पड़ा अपने साथ जीजाबाई, शिवाजी और दादा कोणदेव को भी ले गए। एक बार शाहजी अपने पुत्र शिवाजी को दरबार में ले गए, दरबार का वैभव जगमगाहट आदि अवर्णीय था।सभी सरदार बादशाह के तख्त तक झुके सिर ही जाकर तीन बार कोर्निश करते हुए उल्टे पाव अपने अपने स्थान पर खड़े हो जाते, शाहजी की बारी भी खत्म हुई। बाद में शिवा का हाथ पकड़कर आगे ले गए शाहजी उसकी खिदमत में अपने पुत्र को लाया है यह देखकर आदिलशाह बहुत खुश हुआ। तख्त के आगे रुककर शाहजी ने शिवा को कहा "शिवा सुल्तान को सलाम करो"! "हाँ सिर झुकाओ यही तेरे सौभाग्य का क्षण है। तू आगे चलकर एक बड़ा सरदार बनेगा!" शिवा का मन--- क्या तू इस विधर्मी के सामने अपना सिर झुकायेगा.? क्या तू अपना धर्म, परंपरा आदि भूल जाएगा ? बचपन में माँ के द्वारा राम-कृष्ण, भीम-अर्जुन की कथाओं का स्मरण नहीं करेगा ? तुझे कैसा भय ? किसका भय ? माँ तुलजा भवानी तुम्हारी रक्षा करेगी।" शिवा अपने आप मे खोया हुआ था वह दो कदम पीछे हटा। शाहजी ने फिर से प्यार भरे स्वर से पुचकारा कहा "बेटा जल्दी जल्दी कर।" सीना ताने सिंह शावक के समान शिवा को देखकर सुल्तान ने कहा "शाहजी राजे, बेचारे नासमझ बच्चे पर जोर जबर्दस्ती क्यों ? रहने दो इसे वापस ले जाओ" बिना सिर झुकाए वैसे ही चीते की गति से लौट रहे उस बालक को देखकर सारा दरबार भौचक्का रह गया।

स्वराज्य के लिए तैयार--!

स्वराज्य की चुनौती स्वीकार करना कितना भयावह था! कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैला हुआ वह प्रचंड यावनी साम्राज्य, उसकी अपार सैन्य शक्ति, असंख्य गढ़-किले, विपुल सम्पदा, धर्मान्ध दमन बृत्ति, पदतलों में सर झुकाये घुटनों के बल बैठे हिंदू वीर सरदार, गुलामी में स्वादभरी चटकार लगाने वाले उनकी दयनीय स्थिति, किसी ब्यक्ति द्वारा गलती से भी स्वातंत्र्य उच्चारण होने पर शिरोच्छेदन के लिए खड्ग निकालते, ऐसी हीन अवस्था। किन्तु शुभारंभ मुहूर्त निकट था, उसका शुभारंभ "तोरणगढ़" से हुआ।

सुरक्षा की दृष्टि से बीजापुर द्वारा दुर्लक्षित तोरण गढ़ पर 1646 ई. में अपनी किशोरवाई सेना के साथ शिवाजी ने अचानक धावा बोल दिया। बिना किसी रक्तपात के उस गढ़ को अपने कब्जे में ले लिया और उस पर स्वराज्य का तोरण (स्वास्तिक शुभ चिन्ह) लगा दिया। अपनी राजमुद्रा में सुचित "प्रतिपदा की चन्द्ररेखा" का उदय उसी दिन हुआ, पहली बार स्वराज्य का उद्घोष 'हर हर महादेव' "तोरणदुर्ग" के मुक्त गगन में गूँज उठा। शिवाजी का बगावती खबर बीजापुर के दरबार तक पहुँची, उसे सबसे पहले पहुचाने का श्रेय मराठों को ही था सहस्त्रों वर्षों तक हिंदू राष्ट्र को पीटता, स्वातंत्र्य देवता के प्राण निचोड़ता, सब स्वातंत्र्य योद्धाओं के त्याग-बलिदानो को धूमिल करता आया एक महाभिशाप! यहाँ पर भी उसने अपने विष का प्रभाव दिखा ही दिया। शिवाजी के मन में था कि हमने विद्रोह किया है यह सच नहीं है ईश्वर ने हमे अब तक यश दिया है आगे भी स्वराज्य के मनोरथ को भी वही पूर्ण करेगें, रोहिडेश्वर के समक्ष ही हम सब प्रतिज्ञा वद्ध हुए हैं । यह राज्य निर्माण हो ऐसी ईश्वर इच्छा ही है, पिता जी को धैर्य रखने का संदेश दिया, अपने सोलह वर्ष की आयु में शिवाजी द्वारा लिखित इशप्रेरणा, आत्मविश्वास, विजिगीषु वृत्ति से भरपूर इस पत्र की एक एक पंक्ति इतिहास में अजर अमर बनकर रह गया है, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।

दैत्य संहार

अफजल खान का आत्मविश्वास धीरे-धीरे डिगने लगा अपने अनुकूल मैदानी रणक्षेत्र में दुश्मन को खींच लाने में वह असफल रहा। इधर 1655 ई. जुलाई का महीना वर्षा ऋतु प्रारम्भ हो चुकी है पश्चिमी घाट की धुँवा धार बारिस घोर अरण्य में अपार फौज! प्रतापगढ़ किले में बैठे शिवाजी को पकड़ना असंभव था! खान के दूत कृष्णाजी भास्कर का यथोचित स्वागत करने की रीति नीति महराज ने तय कर लिया था। अपेक्षानुसार खान का दूत गढ़ में आ गया उसका सम्मान पुर्बक स्वागत किया गया। विश्राम के बाद कृष्णाजी महराज के दर्शन के लिए आया, उसने उनके सामने अपना कथन प्रस्तुत किया। अफजल खान साहब "वाई" पहुंच गए हैं, खान साहब आपके तीर्थ स्वरूप पिता का अति पुराना स्नेह और सौहार्दभरा प्रेम सम्वन्ध चला आ रहा है। इसलिए खान साहब के प्रति अन्यथा धारणा मत रखिये, आपके स्वाधीन जो गढ़ हैं वह सब खान साहब आपके लिए ही छोड़  देगें एक बार आप "वाई" आइये । खान द्वारा भेजी गई शक्कर कृष्णाजी भास्कर ने वही सभी को बांट दिया।

बेटा शिवाजी तो महा डरपोक निकला! ऐसी हालत में सारी फौज के साथ जावली आने का आग्रह कर रहा है, यदि मैने जावली जाने से इनकार किया तो शिवाजी प्रतापगढ़ किले से नीचे नहीं उतरेगा। महराज ने पंत जी को बताकर भेज था कि "खान तुमसे जो भी वचन मांगेगा, कोई भी वचन मागने पर बेहिचक दे दीजियेगा। वह किसी भी हालत में जावली आकर ही रहेगा, ऐसा कीजिये।" कई बार मिलने पर फिर पुनः गोपीनाथ पंत खान से मिले! महाराज के भयभीत अवस्था का वर्णन दोहराया। तब खान बोला, "अरे भाई शिवाजी को डरने की जरूरत नहीं है उसके किले उसे लौटा दूँगा, मैं जावली जरूर आऊँगा।" जावली में खान ने डेरा डाला कि शिवाजी आएगा, पुनः पंत जी काका खान से मिलने गए, उन्होंने फिर से महराज डरे हुए हैं इसका बखान कर खान का यकीन और मजबूत किया। बातों बातों में कहा "आपसे इतनी प्रार्थना है कि आप एकांत में आकर गढ़ के पायते पर मुलाकात करें" यह सुनते ही खान चौक पड़ा। लेकिन पंत की विनम्रता काम आयी, मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी गुरुवार 10 नवंबर 1659 महाराष्ट्र के घर-घर में खंडोबा की दीपावली मनाने के दिन थे।

बुधवार 9 नवंबर का सूरज निकला किले पर रहने वाला हरेक हृदय भवानी देवी की ओर मुड़कर प्रार्थना कर रहा था "हे देवी माँ हमारे राजा की रक्षा कर!" पर महराज अत्यंत शांतचित्त थे। तानाजी मानसुरे, कान्होजी जेधे, मोरोपंत पिंगले, बाबाजी भोसले तथा अन्य सभी सरदारों को अपने-अपने हिस्से का काम सौंपा गया। रात हो गई कालरात्रि! वैरियों को कुछ भी पता न चले, इस तरह शस्त्र-सज्जित होकर जावली के घने जंगल मे छिपे रहे! खान ने दिये गए वचनों के अनुसार न चलते हुए यदि कुछ दगा बाजी की तो किले के ऊपर से रणसिंग फूंके जाएंगे, तीन बार तोप गरजेगी तुरंत खान की फौज पर टूट पड़ो उनको पूरा निस्पात करो। 10 नवंबर 1659 उषा काल हुआ, उसी दिन मध्यान में ही मुलाकात! जो भी अफजल खान के हाथों फँस गया तो कोई दूसरा फलित होना असंभव है। पंत काका ने खान के नजदीक जाकर पूछा "क्या इतनी फौज आपके साथ आ रही है?" खान ने हा में सर हिलाया, इतनी सेना देखते ही महराज दौड़कर पुनः किले में लौट जाएंगे! मुलाकात ही नहीं हो पाएगी, वे स्वयं केवल दो लोगों के साथ आएंगे। आप भी दो लोगों को ही लेकर आईयेगा। कितना डर पोक निकला शिवाजी! खान ने फौरन फौज को रोक दिया।

महराज ने आखिरी समय पंत को बुलाया यह देखकर खान चौक गया उसे शक भी हुआ! शिवाजी ने बताया कि "खानसाहब तो हमारे लिए पिता के समान हैं परंतु उनके पास खड़ा सैयद बंडा! यदि खान उसे दूर भेज दिया तो मैं आ सकता हूँ।" "महराज की दूरदर्शिता अद्भुत थी खान ने गर्दन से हा भरी, 'डरे' हुए शिवाजी की यह अंतिम अर्जी थी उसे क्यों ठुकराए? "अच्छा हट जाओ"-- खान ने सैयद बंडा को दूर भेज दिया। "तुम बीजापुर के मामूली सरदार के बेटे हो! तुम्हें झुककर चलना चाहिए, यह बात शायद तुम भूल गए हो!" "अपने किले चुप चाप हमारे हवाले कर दो तुझे आला हजरत बादशाह के सामने पेश करूँगा उसके आगे तुझे झुकना पड़ेगा, फिर तुझे बड़ी जागीर देने का इंतजाम करूँगा। आ जा सारा गरूर छोड़कर इस अफजल खान के गले लग जा।" एका-एक खान ने महराज को अपनी बाहों में कस लिया, उस सात फिट लंबे बकासुरी शरीर के सामने शिवाजी बहुत छोटे थे, उनकी लंबाई उसके सीने तक ही थी। महराज ने विद्युत वेग से अपने दाहिने हाथ से बिछुआ बाहर निकाल कर खान के पेट में घुसेड़ उसका पेट चीर दिया! "खान ने भीषण आवाज की मर गया दगा-दगा - दगा---!" सब कुछ पल भर में समाप्त हो गया वह चिल्लाया दगाबाज ने मेरा कत्ल किया उसे मारो, काटो ऐसा जोर से चिल्लाते हुए, खान शामियाने के बाहर दौड़ पड़ा।"

खान की तलवार हाथ में लिए खड़ा कृष्णाजी भास्कर ने शिवाजी की ओर झपटकर खान की तलवार से वॉर किया उस प्रहार को चकमा देते हुए शिवाजी ने कहा "मैं ब्राह्मण की हत्या नहीं करना चाहता चले जाओ!" कृष्णा जी भास्कर नहीं माना यह देख शिवाजी ने एक ही वार में उसका काम तमाम कर दिया।अंतड़ियों को अंदर धकेलते हुए खान बाहर आ गया त्वरित चीते जैसे छलांग लगाते हुए महराज ने खड्ग भवानी से उसकी गर्दन उड़ा दी। झट से उसका मुंड लेकर विद्युत गति से किले की ओर बढ़ने लगे। अफजल खान--वध की वार्ता प्रसारित होने से स्वराज्य के एक-एक किलों पर स्फूर्ति एवं आनंद की अमृत वर्षा होने लगी।

अब शाइस्ता खान की ओर

स्वराज्य की स्थापना के पश्चात शिव सुगंध चारों दिशाओं में फैलने लगी, उसी समय महराज ने प्रतापगढ़ किले पर माँ भवानी की प्राण प्रतिष्ठा की । मराठों और शाइस्ता खान में संघर्ष जारी था मराठे छापामार युद्ध में माहिर थे मुगलों के पास छिपी दो हजार की मराठों की सेना ने मुगल सेना के तम्बू-डेरे, घोड़े-ऊँट, हथियार इत्यादि लूट लिया। अब शाइस्ता खान को किस प्रकार पुणे से निकाल दिया जाता इस पर महराज विचार करने लगे। स्वराज्य में डेरा डाले अब तीन साल हो गए उस प्रचंड सेना के सामने खुले मैदान में पार पाना मुश्किल था! आखिर में उसे छलाँग लगाकर चीरना ही पड़ेगा।

अत्यंत साहसी प्राण संकट से भरा! उसका स्वरूप क्या था ? एक रात स्वयं महराज लालमहल जाएंगे और स्वयं ही शाइस्ता खान का वध करेंगे। लेकिन ये कैसा दुस्साहस लालमहल को एक लाख की सेना घेरा डेरा डाले हुए है! लालमहल अभेद्य किला था, स्वतः दादा कोणदेव और शिवाजी महाराज ने अपनी निगरानी में बनवाया था। मुहूर्त तय किया गया-- चैत्र शुक्ल अष्टमी 6अप्रैल 1663 की मध्यरात्रि! दूसरे दिन सुबह रामनवमी! नेताजी पालकर, मोरोपंत पिंगले आदि सभी को जिम्मेदारी सौंपी गई। शिवाजी अपने चार सौ साथियों के साथ बिना किसी आवाज के भूतों जैसे रसोई में घुस गए। रमजान के कारण रसोइ में तैयारी चल रही थी रसोई के काम में सभी रसोइये मग्न थे बिना किसी चीख पुकार के सब पठान रसोइये को मराठों ने ढेर कर दिया। समूचा लालमहल चित्कारों से भर गया। "शैतान मराठे घुस आए हैं! दुश्मन आया है।" लेकिन कैसे आये कितने आये कुछ नहीं पता! "अरे ये सब तो शाइस्ता खान को ढूढ़ रहे हैं तुझे नहीं!" अब खान समझ फतेह खान तथा उसकी कई पत्नियां तलवार की शिकार हुई। महराज अब सीधे जनानखाने में घुस गए उसकी आकृति देख अंदाज में तलवार चलाई खचाक की आवाज आई। भीषण चीत्कार खान मारा गया! ऐसा समझ महराज वहाँ से भाग निकले लेकिन उसकी दाहिने हाथ की तीन उंगलियां कट गई वह खिड़की के नीचे कूद गया। दूसरे दिन महराज सुरक्षित राजगढ़ किले पर पहुंच गए, उन्होंने माता जीजाबाई का वंदन करते हुए कहा-- "माँ तुम्हारे आशीर्वाद से विजयश्री लेकर आया हूँ," आज रामनवमी का दिन भगवान श्री राम का अवतरण दिवस है उनकी कृपा से ही सब कुछ हो सका है।

औरंगजेब के सामंत जयसिंह का दक्षिण मुहिम

दिल्ली में बैठे बैठे औरंगजेब तिलमिलाया हुआ था, वह स्वयं बहुत डरपोक था हिन्दुओं को हिन्दू राजाओं, सामंतों से प्रताड़ित करने का काम किया करता था जब उसने देखा अफजल खान, शाहिस्ता खान सभी असफल हो गए हैं फिर उसने जोधपुर के राजा यशवंत सिंह को भेजा उनके असफल होने पर अपने सबसे शक्तिशाली राजा जयसिंह को भेजा, उसके खास ससुर की उंगलियां कांटी एक लाख की सेना को भगा दिया आखिर ये शिवाजी किस मिट्टी का बना हुआ है। अपने दरबार में शिवाजी के समान सेनापति कौन हो सकता है ? उसकी निगाह जयसिंह के ऊपर जा टिकी! 1664ई. औरंगजेब की सैतालिसवां जन्मभूमि बड़ी धूमधाम से मना जयसिंह को दक्षिण के सेनापति के रूप में गौरव प्रदान किया लोहे को लोहे से काटने का प्रयास किया। मिर्जा राजा जयसिंह के पास 80000 घुड़सवार व अन्य सेना थी, साथ मे अपनी हज़ारों की सेना के साथ दिलेर खान भी था। शिवाजी महाराज ने राजदूत के नाते रघुनाथ पंत को जयसिंह के पास भेजा। हमारे प्राणों की सुरक्षा का वचन आप देगे तो हम आने के लिए तैयार है! जयसिंह बहुत प्रसन्न हुआ, कहा "शिवाजी को हम अपने पुत्र रामसिंह जैसा ही मानते हैं आपका कोई अनिष्ट नहीं होगा, ऐसा वचन हम आपको देते हैं।" जयसिंह का सम्मति -- पत्र, तुलसी पत्र- बेलपत्र हाथों में आते ही शिवाजी महाराज उससे मिलने के लिए पालकी में बैठकर चल पड़े।

आगरा के बंदीखाने में शाहजहां ने आखिरी सांस ली! अब औरंगजेब बेफ्रिक होकर राहत की सांस ली और फिर उसी खुशी में उसने जयसिंह को पत्र भेजा! "ठीक है शिवाजी को भेज दो," जयसिंह के लिए शिवाजी महाराज को मनाना कठिन काम था कि औरंगजेब के सामने शिवाजी सिर झुकायेगा! शिवाजी महाराज ने संभाजी, रामसिंह और अपने दस सरदारों के साथ दरबार में प्रवेश किया।

 यही है वह शिवाजी---! यही है वह औरंगजेब----! 

पहले शिवाजी महाराज- रामसिंह के आवास में ठहरे फिर कुछ दिन पश्चात उन्हें एक अतिथि कच्छ में गिरफ्तार किया गया ऐसा लगता था कि उनकी हत्या की साजिश रची जा रही है, लेकिन रामसिंह ने पहरे में राजपूत सैनिकों को लगा दिया था। अब शिवाजी महाराज को बाहर निकालना चाहिए ! और एका-एक उनकी तबियत बिगड़ने लगी, बड़ी ज़ोरों से खाँसी आना शुरू हो गया, साथ में पेट में असहनीय दर्द! तमाम वैद्य आये औषधीय चिकित्सा शुरू हो गई, बीमारी का समाचार चारों ओर चर्चा में आ गया रामसिंह को भी जानकारी हो गई और बादशाह को भी। महराज का अभिनय कौशल देखते ही बनता सभी चिंतित, एक सोलह साल का बालक महराज की सेवा सुश्रुवा कर रहा था महाराज पर उसकी जितनी भक्ति उतना ही वह चालाक भी था ! महराज उसे राजगढ़ से ही साथ लाये थे, प्रतिदिन ब्राह्मणों, सन्यासियों को दान! प्रतिदिन मिठाई के पिटारे फुलाद की जाँच पड़ताल के बाद बाहर जाने लगा। कबिन्द्र परमानंद के जाते समय महराज ने रत्न, हाथी, घोड़े इत्यादि दान कर दिया जिससे बीमारी दूर हो जाय।

17 अगस्त 1666ई. सुबह होते ही शिवाजी महाराज के मुख से भवानी का जाप अखंड चल रहा था दूसरे दिन औरंगजेब महल को बदलने की सोच ही रहा था। कि मिठाई के पिटारे से महराज के निकलते ही उनके स्थान पर 'हीरोजी' सो गया, 'मदारी' ने पैर दबाने का काम निरंतर जारी रखा "क्यों आज बहुत देर तक सोये हैं ? ऐसा पूछने पर रोनी सूरत बना ! "महराज की तबीयत बिगड़ती जा रही है।" भली अंधेरी रात हुई सोये हुए महराज धीरे से उठ गए। तकिया को लपेटकर पलँग पर सुता दिया उसके ऊपर महराज की शाल ओढा दिया। तब से आगे तीसरे महाराज सोये रहे। हीरोजी ने प्रत्येक दिन की भांति अपना वेष धारण किया दोनों चुपचाप बाहर निकल पड़े चौकीदार ने पूछा कहाँ ? हिरौजी ने बड़ी गंभीरता से कहा महराज की हालत बड़ी नाजुक है ऐसा कहकर उसने अपना रास्ता नापा और मदारी ने भी आराम से उसका पीछा किया। परंतु वे दोनों औषधि लेकर वापस लौटे नहीं।

राजगढ़ में गोसाइयों की टोली

राजगढ़ में एक बृद्धा का मातृ-- हृदय दिन- रात शिवाजी महाराज के लिए प्रतीक्षा में वेठी हुई थी, आखिर एक दिन उत्तर के गोसाइयों की टोली महाराष्ट्र की भूमि में प्रवेश किया। वह टोली सीधे राजगढ़ के पायते में 1666 ई. 20 नवंबर को पहुंच गई। गोसाइयों को राजमाता का दर्शन करना था जीजाबाई को सूचना मिली कि कोई गोसाइयों की टोली है जो राजमाता के दर्शन करना चाहती है। राजमाता को देखते ही उसमें से एक वैरागी को अश्रुधारा उमड़ पड़ी उसने सीधा राजमाता को साष्टांग प्रणाम किया। जीजाबाई आश्चर्यचकित हो गई, यह क्या विचित्र बात है? "माँ ने पुत्र को पहचान बोली! कहाँ है मेरा संभुराज ? महराज ने गंभीरता से कहा कि रास्ते आते-आते मर गया।" लेकिन औरंगजेब को यह समाचार मिल गया कि आगरा से निकल कर शिवाजी महाराज, संभुराजे और सभी साथी सहित राजगढ़ पहुंच चुके हैं।

राज्याभिषेक

 पुरुषश्रेष्ठ राजा शिवाजी --! हम सुदूर उत्तर क्षेत्र काशी से आये हैं, राजन उत्तर क्षेत्र में आज पवित्र मंदिरों का ध्वंश किया जा रहा है। मूर्तियां नष्ट भ्रष्ट की जा रही हैं, निर्बल हिंदू समाज का बलात धर्म परिवर्तन किया जा रहा है यदि यही हालत रही तो भगवान राम और कृष्ण की यह पावन भूमि नष्ट होकर खाक हो जाएगी। इसलिए उत्तरवासियों के प्रतिनिधि के रूप में हम यह भिक्षा पात्र लेकर आपके दुर्ग में आये हैं। हे धर्म रक्षक, हमें सिंहासन दो, हे नरोत्तम, धर्मदण्ड को राजदंड का बल दो। छत्रपति राजा बनो, हमे छत्र दो। तुम छत्रपति बनो काशी से आये ब्राह्मण के रूप में मानो स्वयं शिव ने आदेश दिया हो, इस आदेश को उन्होंने समर्थ गुरु रामदास जी के आशीर्वाद से फ़लीभूत किया। 6 जून 1674 - ज्येष्ठ शुदी त्रयोदशी, आनंदनाम संवत्सर--आनंद साम्राज्य का सुभारम्भ, राजप्रासाद में काशी से आये गागाभट्ट तथा कुलगुरु बालभट्ट अपनी विद्वत मंडली द्वारा गंभीर स्वरों में वेद मंत्रों का उद्घोष प्रारंभ किया गया। मुसद्दी, सेनाधिपति, देश, विदेश से आये हुए राजदूत आदि सब पंक्तिबद्ध रीति से विराजमान हुए थे। पंचामृत स्नान, सागर जलों से सिंचित, शुद्धोदक से स्नान सप्त नदियों "गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती ....." मंत्रोच्चार! शिवाजी महाराज की जय के गगन भेदी उद्घोष आसमान में गूँज उठा। भारत में एक बार फिर से हिंदु सिंहासन उभर कर आ गया है यानी "हिंदू पद पादशाही" की स्थापना। हिंदू राज्याभिषेक के दिन स्वयं श्री समर्थ रामदास अपनी गुफा से बाहर आये, समर्थ ने उद्घोषित किया।

 "देश धर्म का उद्धार हुआ, तीर्थक्षेत्र पावन हुए, आनंदवन भुवन निर्माण हुआ।" 

गीत, संगीत, वाद्य गूँज उठे। इक्षित सब साध्य हुए। आनंद वन भुवन निर्माण हुआ।"

 "राष्ट्र सर्बोपरि है सर्वप्रथम है, फिर गुरु, फिर माता-पिता, परिवार और फिर परमेश्वर का स्थान है" मानने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज ने आदर देने मे माँ जीजाबाई और समर्थ गुरु रामदास में फर्क नहीं किया।छत्रपति शिवाजी महाराज को हिंदू पद पादशाही का मर्म था-अपने धर्म के उत्थान के साथ सभी के प्रति आदर और सद्भावना। हिन्दू हृदय सम्राट होने के बावजूद उनकी राजनीति में साम्प्रदायिक और जातीय भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं था।

और अंतिम प्रस्थान..!

1680 ई. आया, पुराने पत्ते गिर चुके हैं नए नए कोपलें लेकर बसंत का उदय हुआ। उस समय महराज की आयु पचास साल! महराज बीमार हो गए, पहले किसी ने गम्भीरता से नहीं लिया स्वयं महराज ने भी ध्यान नहीं दिया। दुस्साध्य परिश्रम से शरीर जर्जर हो गया था, देह की अपूर्णीय क्षति हुई थी। अब विश्राम पूर्ण विश्राम करने की आवश्यकता थी। हनुमान जयंती की चैत्री पूर्णमासी 3 अप्रैल 1680 का दिन! रायगढ़ में महराज ने अपने साथियों को पास बुलाया, शांत स्वर में कहा-- "अब हम कैलाशपति शिवजी के दर्शन करने जाएंगे," यह अनपेक्षित बात सुनकर उन लोगों के हृदय पर वज्राघात हुआ, आखों में आँसू उमड़कर बहनें लगे! महाराज ने शांत स्वर में कहा... "दुःख करने का कोई कारण नहीं यह मृत्युलोक है, एक न एक दिन यह गठरी फेंक कर जाना ही पड़ता है। अब स्वल्प समय के लिए आप सभी बाहर जाकर बैठिये, मैं ईश्वर का स्मरण करता हूँ।" सबकी विदाई ली।

 "कितना अपूर्ब संतुलन! स्थितप्रज्ञ योगी की मनः स्थिति!"

दावा द्रुम दंड पर, चीता मृग झुण्ड पर। भूषण वितुण्ड पर, जैसे मृग राज है ।।

तेज तम अंस पर, कान्ह जिमि कंस पर। त्यों मलेच्छ बंश पर शेर शिवराज है।।

                                                                         महाकबि-------- भूषण 

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