सोनपुर मेले को समाप्त करने के बहाने भारतीय संस्कृति पर हमला -!

 

सोनपुर मेला यानी क्या-?

सोनपुर सारण जिला के पूर्व व दक्षिण दिशा में बिल्कुल एक ओर स्थित है यह अनुमंडल केंद्र है जिसे अन्य प्रांतों में तहसील मुख्यालय कहते हैं। इसका भारत प्रसिद्ध मेला के कारण और भी महत्व बढ़ जाता है, यहां पशुओं का बड़ा मेला लगता है जिसमें पशु -पक्षी, हाथी -घोड़े इत्यादि बिक्री के लिए आते हैं। मेला कार्तिक पूर्णिमा को प्रारंभ होता है जिसमें हजारों साधू सन्यासियों का हरिहरनाथ से 10 किमी दूर पहलेजा घाट तक बिस्तार लिए हुए रहता है जो अपनी आध्यात्मिकता के लिए प्रसिद्ध है, वास्तविकता यह है कि इसे पहले तपोभूमि कहते थे अंग्रेजों ने तपो को टोप्पो और भूमि को लैंड जो आज "टोपोलैण्ड" कहते हैं लेकिन वास्तव में यह तपोभूमि है जहाँ साधुओं की तपस्थली थी और है भी।

हरिहरनाथ क्षेत्र

भारतवर्ष में जब कोई शुभ कार्य किया जाता है अथवा कोई पूजा पाठ होता है तो संकल्प बोला जाता है जिसमें आध्यात्मिक दृष्टि से सारे देश को छः क्षेत्रों में बांटा गया है और आदि जगद्गुरु रामानुजाचार्य ने इसी को 108 क्षेत्रों में बांटा है, तो इस क्षेत्र का इस प्रकार का महत्व है। धार्मिक और पौराणिक मान्यता के अनुसार गज ग्राह का युध्द भी यही स्थान पर हुआ था कहते हैं कि त्रिवेणी संगम पर यह गज ग्रह का युद्ध शुरू हुआ था और यहीं हरिहरनाथ नाथ में भगवान प्रकट हुए इसलिए हरिपुर में गंडकी नदी पर एक घाट बना हुआ है कोनहारा घाट कौन हारा गज हारा या ग्राह हारा यह आज भी इसका प्रमाण उपलब्ध है। इसी कारण हरिहरनाथ में हरि और हर यानी शंकर भगवान और विष्णु दोनों का विग्रह एक साथ उपलब्ध है यह देश के तीन स्थानों पर ही है। एक स्थान जहाँ पर भगवान हरि विष्णु और भगवान शिव प्रकट हुए हरिहरनाथ में दूसरा सुदूर केरल में अय्यप्पा मंदिर जहाँ भगवान अय्यप्पा बिराजमान यहां भी हरि और हर दोनों की विग्रह साथ में है तीसरा नेपाल में स्थित मुक्तिनाथ में भी ऐसी ही मान्यता है कि हरि और हर एक साथ है, कुछ बामपंथी लोग भ्रम फैलाने का प्रयत्न करते हैं कि शैव और वैष्णव में बिबाद व लड़ाई होती रहती थी यह बिल्कुल गलत है क्योंकि ये जो मंदिर है वे तो शैव और वैष्णव सम्प्रदाय की एकता को सिद्ध करते हैं।

धार्मिक न्यास बोर्ड - बामियों का षड्यंत्र!

जब जिस देश का प्रथम प्रधानमंत्री राष्ट्र विरोधी हो जाता हो तो सब कुछ सम्भव हो जाता है जवाहरलाल नेहरू ने अपने नाम के आगे पंडित लगाकर हिंदू समाज का अग्रगणी ब्राह्मण समाज को मूर्ख बनाने का काम किया क्योंकि वे किसी भी प्रकार से भी ब्राह्मण नहीं थे, बिहार में हिन्दू समाज बहुत धार्मिक था सारे के सारे शुभ कार्य या किसी समस्या का निदान वे अपने मठ मंदिरों में खोजते थे शादी विवाह तो मंदिरों में ही होते थे यह तो इस्लामिक और अंग्रेजों के समय कुछ कारण बस विवाह अपने घरो में करने लगे लेकिन जो मंडप बनता है वह मंदिर का ही प्रतीक रहता है, कोई बिवाद होता कोई बीमार होता तो मंदिरों में जाते वहां जो साधू संत होते वे वैद्य का भी कार्य करते मान्यता इतनी थी कि सभी बिबाद वही सुलझाया जाता था, यह सब वामियो और कांगियों को अच्छा नहीं लगा षड़यंत्र करके धार्मिक न्यास बोर्ड बनाकर मंदिरों के अस्तित्व को समाप्त करने का षड़यंत्र किया। अब बिहार के सारे मंदिर जो अधिक आय वाले हैं सब पर सरकार का कब्जा है, भारतीय परंपरा में कोई भी साधू संत यदी किसी मठ मंदिर पर जाता है तो उसके रहने भोजन की व्यवस्था मंदिर करता है लेकिन जब से न्यास बोर्ड ने मंदिरों का अधिग्रहण किया है तब से महंत कर्मचारी की भूमिका में आ गया है। इसलिए सोनपुर में यदि कोई साधू संत आता है तो अन्य मंदिरों में उसकी व्यवस्था होती है लेकिन हरिहर नाथ में नहीं।

मेले को समाप्त करने की साजिश

सोनपुर मेला पशुओं का विश्व प्रसिद्ध मेला है यह लगभग दस वर्ग कीमी में फैला रहता है जहां आध्यात्मिकता इसकी ताकत है वहीं मेले से लाखों लोगों को रोजगार भी मिलता है, यह मेला एक प्रकार से भारतीय संस्कृति की धरोहर है। हमारी संस्कृति परंपरा इन्ही मेलों द्वारा पल्लवित और पोषित की जाती है, कोरोना लगभग समाप्त हो गया है सभी मेले, मंदिर खुल गए हैं और इतना ही नहीं कभी कोई मस्जिद नहीं बंद कर पायी सरकार क्योंकि कोई भी इस्लाम मतावलम्बी भारतीय संविधान को नहीं मानता चाहे वह आईएएस अधिकारी व अन्य पढ़ा लिखा हो लेकिन सारे नियम कानून व्यवस्था केवल हिन्दुओं के लिए यह एक प्रकार से ठीक भी है क्योंकि यह देश तो हिन्दुओं का ही है यहाँ के नियमों कानूनों की मर्यादा तो हिंदू समाज को ही करना है। सरकार की शत्रुता सोनपुर मेले से नहीं है वास्तविकता यह है कि वे हमारे ट्रेडीशन यानी हमारी संस्कृति व परंपरा को समाप्त करना चाहते हैं। आखिर क्यों यह भी विचारणीय है सेकुलर की भूख कहीं देशद्रोही रास्ते पर तो नहीं ले जा रही है! अब ये राष्ट्रवाद क्या है? राष्ट्र क्या है ? इसे भी समझना पड़ेगा। सम्पूर्ण विश्व की अपनी अपनी राष्ट्रीयता है अपनी अपनी परम्परा है, यदि सऊदी अरब से इस्लामिक परंपरा हटा दी जाय!यदि वहां की स्थानीय संस्कृति को समाप्त कर दी जाय तो क्या सऊदी अरब की कोई राष्ट्रीयता बचेगी तो नहीं! 2011-2012 में रोहंगिया को ब्रम्हदेश ने निकाल दिया वे सब इस्लाम के नाम पर सऊदिया की सीमा पर पहुँच गए लेकिन वहाँ समुद्री सीमा पर नेवी मौजूद थी उसने किसी इस्लाम की दुहायी नहीं मानी अरब केवल अरबियों के लिए यही है राष्ट्रीयता। अफगानिस्तान से मुस्लिम पलायान कर रहे हैं कोई भी इस्लामिक देश उन्हें शरण देने को तैयार नहीं कहाँ गया इस्लाम का प्रेम-मुहब्बत तो सबकी अपनी अपनी राष्ट्रीयता है यही कारण है। जिस प्रकार औरंगजेब की देखरेख में सारे मंदिर तोड़े जा रहे थे और हिंदू मेले बंद कराये जा रहे थे आमेर मिर्जा राजा जयसिंह की राजधानी के सभी मंदिरों को तोड़ दिया गया और सभी हिंदू मेले बंद कर दिया तब भी कोई बोलने वाला नहीं था ठीक उसी प्रकार बिहार के मुख्यमंत्री की देखरेख में हिंदू मेलों की दुर्दशा की जा रही है जिसका शिकार सोनपुर हरिहरनाथ का यह आध्यात्मिक मेला हो गया है।

समाजवादी 'हिंदू विरोधी' अथवा परिवारवादी

हरिहरनाथ मेला केवल आर्थिक न होकर आध्यात्मिक उन्नति का मेला है यह मेला लगभग 10 वर्ग किमी में लगता है, भारतीय संस्कृति परंपरा में मेले का बहुत बड़ा योगदान रहा है मेलों के माध्यम से अपनी संस्कृति का विकास और परिष्कृत करने का काम किया जाता है, हम सभी को पता है कि प्रत्येक बारहवें वर्ष कुम्भ मेला लगता है और पुरातन काल से समाज में क्या क्या कुरीति है और परिवर्तनीय है ? सभी का चिंतन मनन हमारे मनीषी करते थे उसी में से एक मेला क्षेत्र हरिहरनाथ भी है लेकिन दुर्भाग्य है कि यह बात मुख्यमंत्री को समझ में नहीं आ रही है या तो उन्होंने ''डॉ राम मनोहर लोहिया'' को पढ़ा नहीं! आखिर डॉ लोहिया ने 'भारतमाता-धरतीमाता' पुस्तक क्यों लिखा? उन्होंने 'राम कृष्ण शंकर' क्यों लिखा? क्योंकि उन्हें ध्यान में आया कि बिना भगवान राम, कृष्ण और शंकर के पूरे भारतीय समाज को एक नहीं किया जा सकता, राम, कृष्ण, शंकर ही भारत की आत्मा हैं उन्हें ध्यान में आया कि भारतमाता को बिना अराध्य माने भारतीय राष्ट्र की कल्पना नहीं हो सकता वे अपने शिष्यों को अपने अनुयायियों को यह आध्यात्मिक शिक्षा देने का प्रयत्न करना नहीं भूले लेकिन उनके अनुयायी और जो लोग अपने को लोहिया वादी कहते हैं वे ही इन आध्यात्मिक, समाज सुधारक व आर्थिक विकास को नुकसान पहुंचा रहे हैं। आज के समाजवादी या तो परिवार वादी हो गए हैं अथवा मुस्लिम वादी हो गए हैं कम से कम वे लोहिया के विचारों के तो नहीं रह गए हैं लोहिया तो समाजवाद को राष्ट्रवाद में परिणित करना चाहते थे इसी को लेकर उन्होंने राम कृष्ण शंकर और भारतमाता धरती माता पुस्तक लिखी लेकिन अपने शिष्यों को पढ़ा नहीं सके।

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