भारतीय संस्कृति, स्वाभिमान और सत्ता के केंद्र महाराणा कुम्भा

 


अद्भुत राजवंश विश्व में अनूठा भारतीय सत्ता का केंद्र 

ये वीरों की धरती है स्वाभिमानियों की धरती है कभी न हार मानने वालों की धरती है! ये क्षमा करने वालों की धरती है। ये धर्म, अहिंसा की धरती है और ये कृण्वन्तो विश्व मार्यम का संदेश देने वालों की धरती है। इसी धरती पर एक वंश को ईश्वर ने जन्म दिया जिसे सूर्यवंशी, गोहिल, गहलोत और फिर सिसौदिया वंश कहा जाता है। जिसने कभी स्वाभिमान से, राष्ट्र प्रेम से समझौता नहीं किया मैं जिसके बारे में लिखने जा रहा हूँ उन्हें भारतीय सूर्य कहा जाय तो कम नहीं ! वे हैं महाराणा कुम्भा--! कभी- कभी कुछ सेकुलरिष्ट, वामी इतिहासकार यह कहते नहीं थकते कि मुगलों में कुछ बात तो थी कि उन्होंने तीन सौ वर्षों तक शासन किया और पूरे भारत पर किया। लेकिन वास्तविकता यह है कि बाबर केवल 4 वर्ष हिमायू शासन नहीं कर सका अकबर, जहाँगीर, शाहजहां और औरंगजेब सब मिलकर सौ, सवा सौ वर्ष शासन किये होंगे। और ये केवल दिल्ली के आस पास कभी पूरे भारत पर नहीं, एक चौथाई भाग पर भी नहीं दिल्ली से आगरा बस बगल में भरतपुर जाटों का साम्राज्य जिसने औरंगजेब को केवल पराजित ही नहीं किया बल्कि सुबूत के तौर पर लालकिले का दरवाजा उखाड़ कर भरतपुर में रखा जो आज भी है हा मुगलों ने भारतीय राजाओं से समझौते किये और सम्राट के तौर पर बामियो ने प्रचारित किया। और वहीं मेवाङ चित्तौड़ के राजवंश की बात करे तो "बप्पारावल" आठवीं शताब्दी में राज्य की स्थापना करते हैं और उस राजवंश की योग्यता देखिए कि आज तक किसी के सामने झुके नहीं और विधर्मियों, देशद्रोहियों सब पर विजय पताका फहराया दिल्ली से पश्चिम अफगानिस्तान अरब तक दक्षिण में मालवा उत्तर में कश्मीर ये सभी चित्तौड़गढ़ से शासित होता था। जिसमें "महाराणा कुम्भा" अपने वंश के महान शासकों में से एक थे। कुम्भा के समय (1433..1468) चित्तौड़ भारत की राजधानी के रूप मे विकसित हो गया था। यह युग कला, सिल्प, स्थापत्य, साहित्य निर्माण से परिपूर्ण था।

रावल से राणा

उस समय "मेवाङ" के शासकों को 'रावल' कहा जाता था उन्हें 'रावल' की उपाधि दी जाती थी। महाराणा हम्मीर के समय से यहाँ के शासकों ने 'राणा' की उपाधि अंगीकार किया जो आज तक चली आ रही है। परंतु कुछ आदर देने के साथ धीरे धीरे राणा से महाराणा कहलाने लगे। हम्मीर ने मेवाङ के भाग्य को बदला, उसी समय वहां के शासकों की उपाधि भी बदली जो आज महाराणा के रूप में भारत के स्वतंत्र होने पर मेवाङ के भारत में विलय तक ही नहीं आज तक चली आ रही है। देश में किसी अन्य राजवंश को यह उपाधि प्राप्त नहीं थी, न अब किसी अन्य के लिए उपयोग होता है।

कुंभा का राज्यारोहण

कुम्भा का राज्याभिषेक कब हुआ यह विवाद का विषय है, यदि हम सभी प्रकार से विचार करते हैं तो इसे विक्रम संवत 1490 निर्धारित किया जा सकता है। जो1433 ईसवी सन होता है। महाराणा कुम्भा के समय का पहला शिलालेख पदराडां गाँव में मिला है।जो विक्रम संवत1490 का है जिससे सिद्ध होता है कि तब तक कुंभा का राज्यारोहण हो चुका था। उनका जन्म ई सं 1417 माना जाये तो इस तरह कुंभा की आयु सोलह वर्ष की मानी जा सकती है।और समाज में यही प्रचलित भी है।सिंहासनारूढ़ होने के समय कुंभा एक तेजस्वी युवक थे। उदयपुर के राजकीय पुरातत्व संग्रहालय में कुंभा का एक चित्र है, यह मेवाङ राजवंश का रहा है जिससे इसकी विष्वसनीयता पर शंका नहीं हो सकता। इस पर कुंभा का जन्म वर्ष वि. सं. 1474 अंकित है। जो ई सं. 1417 होता है1438 की चित्तौड़ की प्रसस्ति में जो स्वयं उसके समय का है, महाराणा कुम्भा का वर्णन बड़े ही गौरव के साथ किया गया है। "महाराणा कुम्भा भारतीय इतिहास के उन कर्मवीर कर्मयोगी नरपतियों में गण्य हैं जो शास्त्र और शस्त्र के उपयोग में समान दक्षता प्राप्त किया था। वे सम्राट विक्रमादित्य, समुद्रगुप्त, श्री हर्ष, शूद्रव्य भृतहरि और राजा भोज जैसे नरेंद्र साहित्यकारों की जाज्वल्यमान नक्षत्र-मालिका में उनकी दमक किसी से कम नहीं है।"

विजय अभियान

महाराणा कुम्भा सन 1433 में गद्दी पर बैठे और1468 में वे स्वर्गलोक को पधार गए, कुल पैंतीस वर्ष उन्हें जीवन मिला। लेकिन उनकी यश- गाथा के साथ चले तो इतनी उपलब्धियां हैं,  जिनकी गणना और भब्यता अपने मे उलझा देती हैं जिससे काल- गणना का उनके साथ मेल नहीं हो पाता। जिसने मेवाङ की स्वर्णिम समुन्नति प्राप्त किया उनकी होड़ सुदृढ़, चिरंजीवी, पाषाणों को आश्चर्य में परिवर्तित करने वाले इतने निर्माण कार्य उनकी गौरव वृद्धि को स्थायित्व देने को आतुर है और कला, साहित्य में ऐसी उच्चता कुम्भा द्वारा प्राप्त किया कि ये तीनों प्रवाह कुम्भा के यश-कुंभ के वास्ते पियूष की त्रिबेनी बन गए। कर्नल टॉड ने लिखा है कि "कई शताब्दियों तक मेवाड़ को जैसे शासक प्राप्त हुए हैं, उस प्रतिभा के स्फूर्तिवान राजा किसी अन्य देश को कदाचित ही कभी प्राप्त हुए हों। इस समय वह अपनी गौरव गाथा के मध्य में था और अपने धर्म शत्रुओं को अपनी सत्ता के शिखर पर बंदी बनाने का उचित विजयानंद का अनुभव कर रहा रहा था। धर्मान्ध अलाउद्दीन खिलजी को अपनी प्रतिहिंसा को कला के स्मारकों पर उतारे एक शताब्दी बीत चुकी थी। चित्तौड़ उस विनाश से उबर चुका था और उसकी सुरक्षा में केसरिया बाने में जिन्होंने बलिदान दिये थे उनके स्थान पर नए प्रतिरक्षक प्रस्फुटित हो चुके थे। उनके क्षितिज पर जो बादल उमड़े रहे थे, कुम्भा के पौत्र राणा सांगा के सिर पर फटने वाले थे। उनसे सुरक्षा के लिए जो साधनों की अभिवृद्धि आवस्यक हो गई थी। महाराणा हम्मीर की ऊर्जा और राणा लाखा के कला प्रेम दोंनो के संगम है ''राणा कुम्भा'' उन्होंने ही यह सौभाग्य प्राप्त किया। और अपने प्रयासों से ही सफलता प्राप्त की एक बार फिर घग्घर के उस तट पर मेवाङ का केसरिया फहराया जहाँ राणा समरसिंह की पराजय हुई थी।"

शिलालेखों में विजय का वर्णन 

शिलालेखों में महाराणा कुम्भा के पहले का ब्रितान्त इस प्रकार है--- "अपने कुल रूपी कानन के सिंह राणा कुम्भा ने सारंगपुर  (मालवा), नारणक, अजयमेरु, मंडोर, मण्डलकर (मांडलगढ़), बूँदी, खाटू (जयपुर जो उन दिनों आमेर), चाटसू, आदि सुदृढ़ और विषम किलों को लीला मात्र से विजयी किया। अपने भुजबल से अनेक उत्तम हाथियों को प्राप्त किया, मलेक्ष महिपाल (सुल्तान) का गरुड़ के समान दलन किया था। प्रचंड भुजदंड से जीते हुए अनेक राजा उसके चरणों में सिर झुकाते थे।प्रबल पराक्रम के साथ दिल्ली और गुजरात के राज्यों की भूमि पर आक्रमण करने के कारण वहां के सुल्तानों ने छत्र भेंट कर उन्हें "हिंदू-सुरत्राण" की उपाधि प्रदान किया था। वह सुवर्ण सत्र (दान यज्ञ) का आगार छः दर्शन शास्त्रों में कहे गए धर्म का आधार, चतुरंगिणी सेनारूपी नदियों के लिए समुद्र था और कीर्ति एवं धर्म के साथ प्रजा का पालन करने और सत्य आदि गुणों के साथ कर्म करने में रामचंद्र और युधिष्ठिर का अनुकरण करते थे और तब राजाओं का सार्वभौम सम्राट था।" इस तरह महाराणा कुम्भा का अभियान सात सालों में ही दूर दूर तक पहुँच गया यह वह समय था जब चित्तौड़ भारतवर्ष के सत्ता के केंद्र में हुआ करता था। और हिंदू राजाओं का शिरोमणि अभासित करता है और कहीं सुरत्राण मिलता है जो हिन्दुओं को सुल्तान बताता है। सुरत्राण के रूप में देवताओं के राजा इंद्र के लिए उपयोग में आता था, कुम्भा का सूर्य सबसे पहले पूर्व की ओर उदित हुआ, उधर सबसे निकट के पड़ोसी बूंदी राज्य के हांडा शासक अपने को मेवाङ का संरक्षक मानते थे।और मेवाड़ के सामंतो की पंक्ति में इनका स्थान रहता था।

हिंदूराज गजनायक 

चित्तौड़ के निकट पड़ने वाला मांडलगढ़ इस तरह कुम्भा का पहला निशाना बन गया। हाड़ावों के इस गढ़ को बहुत आसानी से कुम्भा ने विजित कर लिया और यह कुंभा की पहली विजय थी।इस उत्साह ने कुम्भा को जहाजपुर कूच के लिए उत्साहित किया लेकिन भीषण संघर्ष के बाद भी कुम्भा ने विजय प्राप्त किया। अब मांडलगढ़, जहाजपुर, बिजौलिया, अमारगढ़ और बमबावद मेवाड़ में पुनः शामिल कर लिया गया। उन दिनों आमेर राज्य की सीमा बहुत कम थी कायमखानी और नागौर के सुल्तान बार बार उस पर आक्रमण किया करते थे, महाराणा कुम्भा ने इस पर आक्रमण कर कायमखानियों को भगा दिया और राजपूतों का फिर से अधिपत्य हो गया। अब चित्तौड़गढ़ विशाल साम्राज्य हो गया था और भारतवर्ष के सत्ता का केंद्र भी।"तत्कालीन वर्णनों में आया है कि दिल्ली से लेकर पश्चिम समुद्र तक के सभी राजा कुम्भा की सेवा में रहते थे," कुम्भा भारत का सबसे सशक्त एवं साधन संपन्न शासक था।कुम्भा मेवाड़ का अधिपति था कुम्भा को रायराय, रणेराय महाराजाधिराज सकालराज शिरोमणि हिंदूराज गजनायक कहा जाने लगा।और भारत के महान शासकों में कुम्भा का नाम सदा के लिए सुरक्षित हो गया।

मालवा के सुल्तान को कैद किया

'वीर विनोद' में लिखा है कि मालवा के सुल्तान महमूद पर जब महाराणा कुम्भा ने हमला किया तो मेवाड़ की सेना में एक लाख घुड़सवार और 1400 हाथी थे। "जब दोनों फौजों का मुकाबला हुआ भयाक्रांत हो महमूद भागकर माण्डू के किले में पनाह ली।" इस युद्ध के संबंध में कुम्भलगढ़ प्रस्सति में लिखा है कि "कुम्भकर्ण ने सारंगपुर में असंख मुसलमान स्त्रियों को कैद किया, महमूद का महामद नष्ट किया, उस नगर को जलाया और ऋषि अगस्त के समान अपने खड्गरूपी चुल्लू से मालवा समुद्र को पी गया।" उसकी सेना तितर बितर हो गई महमूद को महाराणा ने बंदी बनाकर चित्तौड़ ले आये छः महीने कैद रखने के पश्चात बिना कुछ दंड लिए छोड़ दिया गया। "आज भी चित्तौड़गढ़ पर कीर्तिस्तंभ मौजूद है जिसे इस युद्ध विजय की यादगार में 1448 में बनाया गया था" अबुल फजल इस विजय का उल्लेख करते समय लिखा है कि अपने शत्रु से कुछ भी न लेकर इसके विपरीत उसे भेंट देकर स्वतंत्र कर देने के लिए महाराणा कुम्भा की बहुत प्रशंसा की है।

सुचारू शासक

महाराणा कुम्भा के समय मेवाड़ की परिधि गांवों की संख्या बहुत अधिक हो गई थी वैसे मेवाड़ में दस हजार गांवों की संख्या होना प्रसिद्ध है। "दस सहस मेवाड़ को धनी" कुंभा के पिता मोकल को कहा गया है ये गांव मेवाड़ की मुख्य भूमि के थे, कुम्भा के समय मेवाड़ के बाहर भी बड़ा भूभाग उसके अधीन हो गया। उस बिस्तृत राज्य को कुम्भा के समय में "साम्राज्य" कहा जाता था। कुम्भा ने इस प्रकार स्थानीय राजपूतों राजाओं को मुस्लिम आतंक और आक्रामक से मुक्त किया, उनकी आदर की दृष्टि मुस्लिम सल्तनतों की जगह मेवाड़ की नवोदित शक्ति की ओर आकर्षित करने लगी, यह उस समय की परिस्थितियों में समस्त देश की ब्यवस्था की दृष्टि से अभूतपूर्व परिवर्तन था। वर्णन मिलता है कि कुम्भा के समय में मेवाड़ की सेना में एक लाख अश्वारोही और 1400 हाथी थे, पैदल सैनिकों की संख्या नहीं मिलती, इनके साथ भील आदि जंगलों में जीवन बिताने वाले वनवासी बड़ी संख्या में सैनिक सेवा में रहते थे। "कुम्भा शरीर से हिष्ट पुष्ट और राजनीति तथा युद्ध विद्या में बड़ा कुशल था अपने वीरता से उन्होंने दिल्ली और गुजरात के सुल्तानों का बड़ा प्रदेश अपने अधिकारों में ले लिया, जिस पर उन्हें छत्र भेटकर "हिंदू सुरत्राण" की उपाधि प्रदान किया अर्थात उन्हें हिंदू बादशाह स्वीकार किया। कई बार मांडू, गुजरात, नागौर इत्यादि सम्लित सैन्य शक्ति को पराजित किया और राजपूताने के अधिकांश एवं मांडू, गुजरात और दिल्ली के राज्यों के कुछ अंश छीनकर मेवाड़ राज्य को साम्राज्य बना दिया।

चित्तौड़गढ़

"अमरकाव्य" में है.. "संवत 1505 के माघ मास में शुक्ल दशमी गुरुपुष्य योग में राणा कुम्भा ने यश प्रचार के लिए द्युतिमान गगनचुंबी देव प्रतिमाओं से सुशोभित कीर्तिस्तंभ का निर्माण करवाया। 122 फिट ऊंचा यह निर्माण कुम्भा का कीर्ति कलश है और उनकी उदारता के अनुरूप इसमे सभी देवी देवताओं को स्थान प्राप्त है। जेम्स टॉड ने कीर्तिस्तंभ को मालवा और गुजरात की सम्लित सेनाओं पर विजय के उपलक्ष्य में बना बताया है। "इसकी तुलना भारत में केवल दिल्ली की कुतुबमीनार (विष्णुस्तम्भ) से की जा सकती है जो इससे ऊँची होते हुए भी उत्कृष्टता में इससे कहीं निम्नतर है। वे यह भी कहते हैं कि पुराणों में जो है वह सब वहां प्रत्यक्ष है।" कीर्तिस्तंभ का विस्तृत वर्णन करते हुए टॉड अपने पूर्ववर्ती अध्येताओं के उद्धरण दिये हैं: "हिंदू पौराणिक मान्यताओं का सचित्र कोश" दूसरे कीर्तिस्तंभ के अभिलेख से उद्धरण दिए गए हैं: "पृथ्वी को कम्पायन करते हुए गुर्जर खण्ड और।मालवा के अधिपतियों ने जो दोनों सुल्तान थे अपनी समुद्र जैसी विशाल सेनाओं के साथ मेददार पर आक्रमण किया! अपने शत्रुओं के सेनाओं के बीच कुम्भा- सिंह के समान सुनसान जंगल में ज्योति के समान।" जेम्स टॉड  कुम्भा की निर्माण-प्रतिभा से हतप्रभ हो गया है: "और यह तो चित्तौड़ में महाराणा कुम्भा के भव्य निर्माण में केवल एक है।" एक एक करके उसने कुम्भा के चित्तौड़ में और कुम्भलगढ़ में बनवाए गए मंदिर, महल और जलाशय गिनाये हैं। "इतिहास में यह दुर्ग अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है जहाँ असंख्य राजपूत वीरों ने अपने धर्म और देश की रक्षा के लिए अनेक बार असिधारा रूपी तीर्थ में स्नान किया और जहाँ राजपूत वीरांगनाओं ने सतीत्व रक्षा के लिए धधकती हुई जौहर की अग्नि में कई अवसरों पर अपने प्रिय बाल बच्चों सहित प्रवेश कर जो उच्च आदर्श स्थापित किया वह चिरस्मरणीय रहेगा। प्रत्येक स्वदेश प्रेमी हिंदू संतान के लिए क्षत्रिय रुधिर से सींची हुई यहाँ की भूमि के रजकण भी इस भी तीर्थ रेणु के तुल्य ही पवित्र है।" कुम्भा के पहले चित्तौड़ चित्रकूट कहलाता था उनके निर्माण कार्यों से यह विचित्रकूट बन गया।

कुम्भलगढ़--!

स्वयं कुम्भा के नाम से जाना जाने वाले कुंभलगढ़ आरंभ में कुम्भलमेर कहलाता था, जो नाम यहां से निकाले गए सिक्कों पर अंकित है। 'युक्तिकल्पद्रुम' ग्रंथ में यह उल्लेख मिलता है कि इस उल्लेख को दृष्टि में रखकर चित्तौड़ के दुर्ग एवं कुम्भलगढ़ के दुर्ग का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि चित्तौड़ का महादुर्ग जहाँ अपने सम्पूर्ण स्वरूप में कृतिम दुर्ग की कोटि का दुर्ग है वहाँ कुंभलगढ़ के दुर्ग में प्राकृतिक एवं कृतिम दोनोँ प्रकार के दुर्गों के लक्षण विद्यमान हैं। चित्तौड़गढ़ के साथ साथ कुंभलगढ़ मेवाड़ के महाराणाओं का आवास और चित्तौड़ से कहीं अधिक सुरक्षित स्थल रहा है। इस दुर्ग का निर्माण कार्य 1458ई. में सम्पूर्ण हुआ। चौबीस मिलों में फैली यह प्राचीर चारों ओर से दुर्ग को घेरे हुए हैं। यह ऊपर से15-20 फिट चौड़ी है, चार घुड़सवार एक साथ इस पर दौड़ सकते हैं। यह किला अपने निर्माण और विस्तार में यह प्राचीर चीन की प्रसिद्ध दीवार से टक्कर लेता है। अमरकाव्य में है: "संवत 1495 में कुम्भलमेरु दुर्ग का निर्माण प्रारंभ करवाया, कुम्भलमेरु दुर्ग चैत्र शुक्ल पक्ष में पूर्ण हुआ। बीस वर्ष होने पर (संवत 1495+20 संवत 1515 में)  शत्रुओं के लिए दुर्गम दुर्ग कुम्भलमेरु महाराणा कुम्भा का निवास। "महाराणा कुम्भा ने निरंतर मुस्लिम शासकों से युद्धरत रहते हुए भी भारतीय संगीत के प्राचीनतम एवं पवित्रतम वैदिक कालीन रूप को यज्ञादि अनुष्ठानों के माध्यम से सुरक्षित रखा। कुंभलगढ़ की यज्ञवेदी का इस दृष्टि से संगीत विषयक महत्व और भी बढ़ जाता है।"

भगवान एकलिंग जी--!

एकलिंगजी महादेव मेवाड़ के महाराणाओं के इष्टदेव हैं। मंदिर का जीर्णोद्धार महाराणा मोकल ने कराया था लेकिन पूरा जीर्णोद्धार व अन्य निर्माण कार्य महाराणा कुम्भा ने किया, मेवाड़ पर लगातार इस्लामिक हमलों में भी नुकसान हुआ होगा क्योंकि इस बात का स्पष्ट उल्लेख कई स्थानों पर मिलता है कि एकलिंग का निर्माण कुंभा ने कराया। कुंभलगढ़ प्रसस्ति में भी वर्णन मिलता है। "एकलिंग मन्दिर जो खंडित हो गया था नया बनाकर उसने मंडप, तोरण, स्वर्ण ध्वज और कई कलशों से अलंकृत किया तथा उक्त मंदिर के पूर्व में कुम्भमण्डप नामक स्थान का निर्माण कराया। "जीर्णोद्धार के बाद कुम्भा ने मंदिर के पूजन इत्यादि ब्यय हेतु चार गाँव भेंट किया।" कुंभा उनके पुत्र और रायमल के समय जो जीर्णोद्धार हुए उनके साथ मंदिर के तीन ओर खाई तथा ऊँचा कोट और बुर्ज बनाये गए, जिससे मंदिर के बाहर से किले जैसे दिखने लगा।

साहित्यिक कुंभा

'एकलिंग माहात्म्य' में वर्णन है मिलता कि "कुंभा वेद, स्मृति, उपनिषद, मिमांसा, व्याकरण, राजनीति और साहित्य में निपुण थे।" उन्होंने 'संगीत राज' 'संगीत मीमांसा' एवं 'सूंड प्रबंध' नामक ग्रंथों की रचना की। "वे कवियों का शिरोमणि, वीणा बजाने में अतिनिपुन और नाट्यकला के बहुत अच्छा ज्ञाता थे उन्होंने 'संगीत रत्नाकर' की भी टीका की ओर भिन्न भिन्न रागों तथा तालों के साथ गायी जाने वाली अनेक देवताओं की स्तुतियाँ बनाई।" कुंभा की सर्वाधिक अभिलाषा थी कि उनका विद्वानों में उच्च स्थान माना जाए, कुंभा को सर्वज्ञ भी कहा गया है और 'प्रज्ञान-स्फूर्ति-केसरी' भी। कुंभा के समय की सबसे पहले ग्रंथ प्रशस्ति वि. स.1491 की है और सबसे पहला शिलालेख वि. स. 1490 का है। "सुरसुन्दरी संग्रहित कथा" में कुंभा को महाराजाधिराज प्रतापाक्रांत सकलादिक चक्रवाल राजन्य राणा श्री कुंभकर्ण कहा गया है। 

पूर्ण पुरूष कुंभा

सूझबूझ साहस स्वाभिमान और साधनों का सुनयोजन, पराकाष्ठा की सैनिक चेष्टा और चतुरता से महाराणा कुम्भा ने यह सारा प्रबंध किया। अपने समय के वे सम्राट थे और उनके समय मेवाड़ साम्राज्य ही नहीं बना बल्कि भारत की सत्ता का केंद्र बन गया। पड़ोस में मालवा और गुजरात थे, दोनोँ इस्लामिक सल्तनतें थी, राजस्थान के भीतर नागौर, अजमेर मुस्लिम प्रभाव में थे इन्हे राजस्थान से अधिक मुस्लिम रियासतों के निकट माना जाता था, इन्हें पराजित कर 1441 से 1466 तक चला तीनों ओर से कुंभा ने निष्कंटकता कायम किया। कुंभा ने समय की प्रशस्ति में दिल्ली से लेकर पश्चिम समुद्र तक के राजाओं का कुंभा की सेवा में रहना वर्णित है। दुर्ग-सैनिक आवश्यकताओं के अंग थे और यह कहकर जो श्रेय कुंभा को दिया जाता है कि उन्होंने मेवाड़ के 84 में से 32 किलों का निर्माण किया, इनकी संख्या ही उनका चातुर्य एवं कौशल दर्शाता है। कुंभा परम वैष्णव थे और यह कीर्तिस्तंभ उन्होंने अपने इष्टदेव विष्णु के जनार्दन रूप को समर्पित किया है। और जनार्दन रूप में वे ब्रम्हा, विष्णु और महेश तीनों हैं। इस रूप में वे असुरों और मलेक्षों से रक्षा करते हैं।

और वे स्वर्ग पधारे

अमरकाव्य में वर्णन है कि उनके गुरू ने अपने शिष्य द्वारा शंदेश भेजा-- उसने राणा से कहा एकांत में कुछ कहना है! कुम्भा ने उसका बहुत आदर भाव किया, दोनों में विचार विमर्श हुआ! "गुरू ने कहा है कि तुम्हें याद है या नहीं, तुम्हें बहुत समय हो गया", राणा ने कहा, "प्रभो सब याद है गुरु की कृपा से सद्भोगो से युक्त राज्य मैन कर लिया है। अब मैं शीघ्र आ रहा हूँ।" हे प्रभो तपस्वी! आप पधारो यह सुनकर वह तपस्वी अपने आश्रम को चला गया। "34 वर्ष 3 मास 3 दिन शासन करके ऊदा द्वारा मरवाया गया महाराणा कुम्भा स्वर्ग चले गए।" जो वर्णित है उसमे कहा गया है कि महाराणा कुम्भा पूजा पर बैठे थे तभी उनका ही पुत्र उदा ने पीछे से उनका गला धड़ से अलग कर निंदा का पात्र बन गया और महाराणा के कर्मो ने उन्हें स्वर्ग में महान पद पर बैठा दिया, उन्हें इंद्र के समान सम्मान और वे इंद्र जैसे हो गए !


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